प्रणवाक्षर
प्रणवाक्षर शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— प्रणव + अक्षर। इसका संबंध भारतीय दर्शन, वेद और उपनिषदों में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। सामान्यतः “ॐ” (ओम्) को ही प्रणवाक्षर कहा जाता है। 1. प्रणवाक्षर का अर्थ प्रणवाक्षर वह पवित्र ध्वनि या अक्षर है जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड का मूल नाद माना जाता है। भारतीय धर्मग्रंथों में “ॐ” को प्रणवाक्षर कहा गया है। प्रणव का अर्थ है – परम पवित्र ध्वनि या ईश्वर का नाम। अक्षर का अर्थ है – जो कभी नष्ट न हो। अतः प्रणवाक्षर वह अविनाशी ध्वनि है जो सृष्टि के मूल में स्थित है। 2. प्रणवाक्षर का स्वरूप प्रणवाक्षर “ॐ” तीन ध्वनियों से मिलकर बना है: अ (A) – सृष्टि या उत्पत्ति का प्रतीक उ (U) – पालन या संरक्षण का प्रतीक म (M) – संहार या अंत का प्रतीक इन तीनों ध्वनियों के मिलन से ॐ बनता है, जो सृष्टि के तीनों कार्यों का प्रतिनिधित्व करता है। 3. धार्मिक और दार्शनिक महत्व ईश्वर का प्रतीक – भारतीय दर्शन में ॐ को परमात्मा का प्रतीक माना गया है। सृष्टि का मूल नाद – यह माना जाता है कि सृष्टि की शुरुआत इसी ध्वनि से हुई। वेदों का सार – वेदों में ॐ को समस्त मंत्रों का मूल बताय...