NKP “भूगोल विषय के विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन।”

 प्रथम अध्याय - समस्या एवं उसका आविर्भाव


1.1 प्रस्तावना

पर्यावरण के असन्तुलन के कारण प्राकृतिक स्वरूप में होने वाले अकस्मात ऐसे परिवर्तन जो मानव को विपत्ति में डाल देते है तथा जिनसे व्यापक स्तर पर जन-धन की हानि होती है। इनसे बचने के लिए विभिन्न प्रकार के उपाय व प्रबन्धन करता है, उसे आपदा प्रबन्धन कहते है। मानव द्वारा किये गये प्रबन्धन होते है।

प्राकृतिक आपदाये मानव जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। आपदा घटने के उपरान्त सर्वत्र विनाश, दुर्दशा तथा संत्रास का दृश्य उत्पन्न हो जाता हैं। मानव अपनी तीक्ष्ण बुद्धि के बल पर तकनिकी साधनों एवं विज्ञान की सहायता से मानों सम्पूर्ण भूमण्डल पर अपना प्रभुत्व जमा लिया हैं। आदिकालीन मानव ने प्रकृति के साथ सौहार्दता एवं प्रेम का व्यवहार ही किया, क्योंकि तब वह प्राकृतिक परिवेश मे ही अपना जीवनयापन करता था परन्तु वर्तमान में मानव आबादी का विस्तार होने के साथ-साथ, शहरीकरण, औधोगिकरण एवं ऐसे ही क्रियाकलाप चरम स्थिति पर पहुचने लगे और इसी से आपदाओं का जन्म हुआ ।

प्राकृतिक आपदाओं के सामने मानव की विवशता सदियों से बनी हुई हैं प्राकृतिक आपदाओं को जन्म देने वाले प्रक्रम मानव समाज पर इतना प्रभाव छोडते हैं कि प्रकोप व विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं। जैसे विवर्तनिक घटना के कारण भूकम्प एवं ज्वालामुखी का उत्पन्न होना, दीर्घ अवधि तक सूखे की स्थिति का बनना, बाढ़ का आना, वायुमण्डलीय तुफान तथा हरिकेन, टारनेडो, टाइफून आदि।

इन चरम घटनाओ के कारण अन्य सम्बन्धित विनाशकारी घटनाये जन्म लेती है, जिनका प्रतिकूल प्रभाव भी मानव जीवन पर परिलक्षित होता है।

कोरोना वायरस से फैली बीमारी को महामारी इसलिए कहा गया क्योंकि यह बीमारी संपूर्ण विश्व में फैल गई थी। इस महामारी का प्रसार संपूर्ण दुनिया में एक वायरस के द्वारा हुआ। इस महामारी का प्रारंभ दिसंबर 2019 में चीन के वुहान शहर से माना जाता है। इस महामारी का प्रसार एक नए किस्म के कोरोना वायरस के संक्रमण से प्रारंभ हुआ।

जब चीन में अधिकांश लोगों को निमोनिया होने लगा और निमोनिया के लक्षण दिखाई नहीं दे रहे थे, तब चीन के वैज्ञानिकों ने इस पर शोध किया एवं कोरोना वायरस की नई नस्ल बताई । जिसकी प्रारंभिक पहचान 2019-N CoV के रूप में की गई। दिसंबर 2019 में विश्व के समक्ष यह महामारी उजागर हुई तथा 14 मार्च 2020 तक विश्व में कोरोना से 5800 व्यक्तियों की मौत हो गई। यह महामारी पहले संपूर्ण चीन में फैली। 30 जनवरी 2020 के दिन विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोनावायरस के फैलाव को सामाजिक स्वास्थ्य इमरजेंसी घोषित कर दिया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ी।  11 मार्च 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित किया।

हमारे देश में प्राचीन समय में गुरुकुल एवं ऋषि मुनियों की संस्कृति थी। उस समय हमारे ऋषि-मुनियों ने आज से हजारों वर्ष पूर्व कहा था कि "प्रकृति हमारी मां है। यह सभी वस्तुएं अपने बच्चों को अर्पण कर देती है। मानव एवं प्रकृति का प्रगाढ़ संबंध है और वह एक दूसरे के प्रति प्रेम एवं संवेदनाओं के असीम बंधन में बंधे हुए हैं। अतः मानव एवं पर्यावरण के मध्य घनिष्ठ संबंध है।" प्राचीन काल में मनुष्य पूर्णतया प्रकृति पर निर्भर था जैसे-जैसे तकनीकी का विकास हुआ मानव ने तकनीकी की सहायता से पर्यावरण पर अपना अधिकार जमाना प्रारंभ किया। 

वर्तमान समय में जन मानस को यह जानकारी देने की आवश्यकता है कि पर्यावरण संरक्षण क्यों आवश्यक है एवं प्राकृतिक आपदा क्यों आती है तथा कोरोना महामारी का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? 

पर्यावरण अध्ययन के लिए विद्यालय एवं महाविद्यालय प्रत्येक स्तर पर पर्यावरण शिक्षा को अनिवार्य रूप से जोड़ा गया है। यहां तक कि शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में भी पर्यावरण शिक्षा को सम्मिलित किया गया है। पर्यावरण शिक्षा के माध्यम से शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी एवं पर्यावरण संरक्षण  के प्रति जागरूकता प्रदान की जाती है।

1.2 प्रस्तुत अनुसन्धान का महत्व


अनुसंधान किसी भी क्षेत्र में नए ज्ञान की प्राप्ति, समस्याओं की पहचान और उनके समाधान के लिए एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यह न केवल नए तथ्यों और जानकारी को उजागर करता है, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए दिशा भी प्रदान करता है। जब हम बच्चों, खासकर उच्च प्राथमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों की बात करते हैं, तो उनके बीच जागरूकता का स्तर और उसकी दिशा निर्धारित करने के लिए अनुसंधान और अध्ययन का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह अनुसंधान विद्यार्थियों की समझ को विस्तार से जानने में मदद करेगा और यह पहचानने में सहायता करेगा कि वे पर्यावरणीय संकटों, स्वास्थ्य संकटों और उनके समाधान के प्रति कितने जागरूक हैं।

भूगोल, एक ऐसा विषय है जो छात्रों को पृथ्वी और उसके पर्यावरण, मौसम, जलवायु, भौतिक संरचनाओं, मानव और पर्यावरण के बीच संबंध और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के बारे में जानकारी प्रदान करता है। यह विषय विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है जो अपनी समझ को धरती और इसके पर्यावरणीय परिवर्तनों से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। भूगोल के माध्यम से विद्यार्थी प्राकृतिक आपदाओं, जलवायु परिवर्तन, भूस्खलन, भूकंप, बाढ़, तूफान और अन्य आपदाओं के बारे में सिखते हैं और वे इसके प्रभावों को समझने में सक्षम होते हैं।

इसके अलावा, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण जैसे वैश्विक मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने में भूगोल विषय का योगदान महत्वपूर्ण है। इस विषय के अध्ययन से बच्चों में इन समस्याओं के समाधान के प्रति संवेदनशीलता और समझ विकसित होती है। विद्यार्थियों के बीच जागरूकता का स्तर जानने के लिए इस तरह का अनुसंधान एक अच्छा उपाय साबित हो सकता है।

प्राकृतिक आपदाओं जैसे- बाढ़, भूकंप और तूफान का पृथ्वी पर गहरा प्रभाव पड़ता है। बच्चों को इन आपदाओं से जुड़े खतरों, उनसे निपटने के उपायों और उनके प्रभावों को समझाना बहुत महत्वपूर्ण है। इस अनुसंधान के माध्यम से यह अध्ययन किया जा सकता है कि भूगोल विषय के विद्यार्थी कितने अच्छे से प्राकृतिक आपदाओं के कारणों, प्रकारों और बचाव उपायों को समझते हैं। क्या वे जानते हैं कि आपदाओं के दौरान क्या करना चाहिए? क्या वे आपदा प्रबंधन और सुरक्षा उपायों के बारे में जागरूक हैं?

इस अध्ययन से यह भी स्पष्ट हो सकता है कि शिक्षा प्रणाली में इस विषय को कितनी गंभीरता से पढ़ाया जा रहा है और छात्रों को इसके बारे में जागरूक करने के लिए कौन से कदम उठाए जा रहे हैं?

कोरोना महामारी ने वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य संकट पैदा किया। यह संकट न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है बल्कि मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ऐसे में बच्चों के लिए यह समझना बेहद महत्वपूर्ण है कि महामारी क्या होती है? यह कैसे फैलती है? और इसके बचाव के उपाय क्या हैं? भूगोल के माध्यम से छात्रों को महामारी के प्रसार के कारणों, इसके प्रभाव और समाज पर इसके असर के बारे में शिक्षा दी जा सकती है।

इस अनुसंधान में यह देखा जा सकता है कि क्या उच्च प्राथमिक विद्यालयों के विद्यार्थी कोरोना महामारी के संबंध में उचित जानकारी रखते हैं? क्या वे महामारी के दौरान अपनी सुरक्षा के उपायों को जानते हैं? जैसे- कि मास्क पहनना, हाथ धोना, और सामाजिक दूरी बनाए रखना? क्या वे यह समझते हैं कि महामारी के प्रसार को रोकने में उनके व्यक्तिगत प्रयासों का कितना महत्व है?

आज के समय में पर्यावरण संकट एक गंभीर मुद्दा बन चुका है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, वनस्पति नाश और जल संकट जैसी समस्याएं न केवल भविष्य के लिए खतरे का कारण हैं बल्कि अब यह समस्याएं हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। उच्च प्राथमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। इस अध्ययन के द्वारा यह समझा जा सकता है कि क्या बच्चे पर्यावरण संरक्षण के उपायों को समझते हैं? क्या वे जलवायु परिवर्तन के कारणों और इसके प्रभावों के बारे में जानते हैं?

इसके अलावा यह भी देखा जा सकता है कि क्या छात्र वृक्षारोपण, जल संरक्षण, ऊर्जा बचत और प्रदूषण नियंत्रण जैसी गतिविधियों में भाग लेते हैं। इस प्रकार के अनुसंधान से यह स्पष्ट हो सकता है कि बच्चों में पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति कितनी जागरूकता है और स्कूलों में इसे लेकर किस प्रकार की शिक्षा दी जा रही है।

इस तरह के अनुसंधान के महत्व को समझना आवश्यक है। जब हम बच्चों के बीच जागरूकता के स्तर का मूल्यांकन करते हैं तो हम यह जान सकते हैं कि उनकी शिक्षा प्रणाली में कौन से सुधार किए जाने की आवश्यकता है। इस प्रकार के अध्ययन से हम यह भी समझ सकते हैं कि वर्तमान पाठ्यक्रम और शैक्षिक गतिविधियाँ बच्चों को पर्यावरणीय, स्वास्थ्य और प्राकृतिक आपदाओं के मुद्दों के बारे में कितनी प्रभावी जानकारी प्रदान कर रही हैं।

अनुसंधान के द्वारा यह भी पता लगाया जा सकता है कि कौन से शिक्षक या स्कूल इस प्रकार की जागरूकता को बढ़ावा देने में प्रभावी हैं और कौन से क्षेत्रों में और सुधार की आवश्यकता है? यह अध्ययन शिक्षा नीति निर्माताओं, राजकीय संगठनों और स्कूल प्रशासन को विद्यार्थियों में जागरूकता फैलाने के लिए बेहतर रणनीतियाँ बनाने में मदद कर सकता है।

यह एक महत्वपूर्ण और आवश्यक अनुसंधान है जो न केवल बच्चों की जागरूकता की स्थिति का मूल्यांकन करता है बल्कि यह भी पहचानता है कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था और पाठ्यक्रम में किस प्रकार के सुधार की आवश्यकता है। इस अनुसंधान के माध्यम से बच्चों के बीच इन महत्वपूर्ण मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए सही दिशा-निर्देश तैयार किए जा सकते हैं ताकि भविष्य में हमारे समाज को इन वैश्विक समस्याओं से निपटने के लिए सशक्त और तैयार किया जा सके।  


1.3 समस्या कथन

वर्तमान समय में प्राकृतिक आपदाएं, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण जैसे वैश्विक मुद्दे बढ़ रहे हैं और इनका प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर पड़ रहा है, विशेष रूप से बच्चों और युवाओं पर। हालांकि इन मुद्दों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं फिर भी यह स्पष्ट नहीं है कि विद्यालयों के विद्यार्थी प्राकृतिक आपदाएं, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण के बारे में कितना जानते हैं और उनका इन मुद्दों के प्रति दृष्टिकोण क्या है? अतः अनुसंधान की वर्तमान समस्या का कथन इस प्रकार है:-

“भूगोल विषय के विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन।”


1.4 अनुसन्धान के उद्देश्य

अनुसंधान के उद्देश्य किसी भी शोध कार्य के मुख्य लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हैं। ये उद्देश्य यह बताने में मदद करते हैं कि उसे किस दिशा में काम करना है और शोध का मुख्य उद्देश्य क्या है? शोध के उद्देश्य शोध में संकलित किए जाने वाले डेटा उसकी प्रक्रिया और परिणामों को आकार देते हैं। प्रस्तुत अनुसंधान के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

1. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का निम्न चरों के आधार पर अध्ययन करना।

2. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का प्राकृतिक आपदाओं संबंधी जानकारी का अध्ययन करना।

3. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का कोरोना महामारी संबंधी जानकारी का अध्ययन करना।

4. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का पर्यावरण संरक्षण संबंधी जानकारी का अध्ययन करना।

5. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का प्राकृतिक आपदा के प्रति जागरूकता का अध्ययन करना।

6. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता का अध्ययन करना।

7. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन।

8. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का राजकीय एवं निजी विद्यालय के आधार पर तुलनात्मक अध्ययन करना।

9. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का राजकीय एवं निजी विद्यालय के आधार पर प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता का तुलनात्मक अध्ययन करना।

10. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का राजकीय एवं निजी विद्यालय के आधार पर कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता का तुलनात्मक अध्ययन करना।

11. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का राजकीय एवं निजी विद्यालय के आधार पर पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का तुलनात्मक अध्ययन करना।

1.5 परिकल्पना


परिकल्पना किसी शोध के प्रारंभ में एक अनुमानित विचार या सिद्धांत होता है, जिसे बाद में शोध और डेटा संग्रहण द्वारा परीक्षण किया जाता है। परिकल्पना शोधकर्ता के लिए एक दिशा और मार्गदर्शन प्रदान करती है ताकि वह यह जान सके कि वह किस प्रकार के परिणाम की अपेक्षा कर सकता है और वह किस दिशा में अपनी जांच को आगे बढ़ाए? परिकल्पना सत्य या असत्य साबित हो सकती है और यह शोध के निष्कर्षों पर आधारित होती है। प्रस्तुत अनुसंधान कि परिकल्पना निम्नलिखित हैं-


1. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता में कोई सार्थक अन्तर नहीं होता हैं।

2. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता में कोई सार्थक अन्तर नहीं होता हैं।

3. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता में कोई सार्थक अन्तर नहीं होता हैं।

1.6 परिसीमन

प्रस्तुत शोध मे समय एवं साधनों को ध्यान मे रखते हुए निम्नलिखित सीमाएं हैं-

राज्य ;  राजस्थान

जिले ; जोधपुर, पाली, बाडमेर, सिरोही, जैसलमेर, जालौर 

विद्यालय ;  राजकीय व निजी विद्यालय

विद्यालय स्तर ;  उच्च माध्यमिक

कक्षा स्तर                :  उच्च माध्यमिक

विषय ;  भूगोल

विद्यार्थी ;  छात्र- छात्रा दोनों 




1.7 न्यादर्श

इस अध्ययन के लिए निम्नलिखित प्रकार से न्यादर्श का चयन किया गया-

सारणी-1.1

राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों के न्यादर्श

क्र.स. जिलें राजकीय निजी कुल

1 जोधपुर 100 100 200

2 पाली 100 100 200

3 बाड़मेर 100 100 200

4 सिरोही 100 100 200

5 जैसलमेर 100 100 200

6 जालौर 100 100 200

कुल 600 600 1200


1.8 तकनीकी शब्दों की व्याख्या

प्राकृतिक आपदा 

प्राकृतिक आपदाएं जैसे- बाढ़, भूकंप, तूफान, भूस्खलन, सुनामी आदि वह घटनाएं हैं जो प्रकृति के कारण अचानक घटित होती हैं और मानव जीवन, संपत्ति तथा पर्यावरण को व्यापक नुकसान पहुंचाती हैं। इन आपदाओं का असर न केवल हमारे जीवन पर होता है बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव डालती है। हालांकि हम प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह से रोक नहीं सकते लेकिन इनके प्रति जागरूकता फैलाकर और सतर्कता बढ़ाकर हम इनके प्रभाव को कम कर सकते हैं। इस शोधकार्य में हम प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के महत्व इससे जुड़े उपायों और इसके प्रचार-प्रसार के तरीकों पर चर्चा करेंगे।

1. प्राकृतिक आपदाएं और उनका प्रभाव

प्राकृतिक आपदाएं दुनिया भर में हर साल बड़ी संख्या में होती हैं और इनका असर जन-जीवन पर व्यापक होता है। उदाहरण के लिए-

• भूकंप: भूकंप की अचानक घटना से न केवल भौतिक संरचनाओं में भारी तबाही होती है बल्कि यह जीवन को भी संकट में डाल देती है।

• बाढ़: अत्यधिक बारिश या नदी में पानी के स्तर में वृद्धि के कारण बाढ़ आती है जिससे कई गांव और शहर पानी में डूब जाते हैं घरों और फसलों को नुकसान होता है।

• तूफान और साइक्लोन: ये तूफान बड़े पैमाने पर तटीय इलाकों में विनाश का कारण बनते हैं। इनकी उच्च हवाएं और बारिश इमारतों को ध्वस्त कर देती हैं और पेड़ उखड़ जाते हैं।

• सुनामी: समुद्र के नीचे आने वाले भूकंप के कारण समुद्र के पानी में अत्यधिक हलचल होती है जिससे सुनामी का खतरा उत्पन्न होता है। यह तटीय इलाकों में भारी तबाही मचाता है।

• भूस्खलन: भारी बारिश के कारण पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन हो सकता है जिससे सड़कें, पुल और मकान नष्ट हो सकते हैं।

इन घटनाओं का मानव जीवन, संपत्ति, खेती-बाड़ी और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ता है। इसलिए इन आपदाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना और सुरक्षा उपायों को समझना बेहद जरूरी है।

2. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता का महत्व

प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम जागरूकता फैलाना है। जागरूकता का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि लोग आपदाओं के बारे में जानें बल्कि यह भी है कि वे आपदाओं के होने पर क्या कदम उठाए ? इसका ज्ञान हो। जागरूकता से निम्नलिखित फायदे होते हैं:

• प्रभावी तैयारी: यदि लोग आपदाओं के बारे में सही जानकारी रखते हैं तो वे आपदा के दौरान खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए तैयार रहेंगे।

• सही निर्णय लेने की क्षमता: जागरूक लोग आपदाओं के दौरान सही निर्णय ले सकते हैं, जैसे कि सुरक्षित स्थानों पर शरण लेना जरूरी सामान जुटाना आदि।

• नुकसान को कम करना: आपदाओं के प्रति जागरूकता से नुकसान को कम किया जा सकता है। यदि लोग पहले से तैयार रहते हैं तो जीवन और संपत्ति का संरक्षण संभव हो पाता है।

• मनोबल बढ़ाना: आपदा के समय जागरूकता और बचाव के उपायों के बारे में जानने से लोगों का मनोबल बढ़ता है और वे नकारात्मक परिस्थितियों का सामना बेहतर तरीके से कर सकते हैं।

3. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के प्रचार-प्रसार के तरीके

अ. शिक्षा और प्रशिक्षण

प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए लोगों को शिक्षा और प्रशिक्षण देना अत्यंत महत्वपूर्ण है। विद्यालयों, कॉलेजों और सामुदायिक केंद्रों पर आपदा प्रबंधन की शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि लोग पहले से तैयार रहें। इसके लिए विशेष पाठ्यक्रम और कार्यशालाएं आयोजित की जा सकती हैं जिसमें आपदाओं के समय क्या करें, कैसे बचाव करें, और किस तरह से प्राथमिक उपचार दिया जाए? इसकी जानकारी दी जाए।

ब. मीडिया का प्रभाव

मीडिया, खासकर टेलीविजन, रेडियो और सोशल मीडिया का उपयोग प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए किया जा सकता है। जब आपदा आती है तो मीडिया के माध्यम से लोगों को जानकारी देने, उपायों के बारे में बताने और आपदा के समय की स्थिति को स्पष्ट करने में मदद मिलती है। विभिन्न राजकीय और गैर राजकीय संगठनों द्वारा मीडिया पर जागरूकता अभियानों का आयोजन किया जा सकता है।


स. राजकीय योजनाएं और नीतियां

सरकार ने कई योजनाएं और नीतियां बनाई हैं जिनके द्वारा प्राकृतिक आपदाओं से संबंधित जागरूकता फैलाने का प्रयास किया जा रहा है जैसे- कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा विभिन्न दिशानिर्देश, फोरम और जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं, इसके अतिरिक्त राज्य और स्थानीय स्तर पर भी आपदा प्रबंधन टीमों का गठन किया जाता है जो आपदा के समय राहत कार्यों में मदद करती हैं।

द. टेक्नोलॉजी का उपयोग

आधुनिक तकनीक, जैसे मोबाइल ऐप्स, वेब पोर्टल्स और जीपीएस (GPS), के माध्यम से भी लोगों को प्राकृतिक आपदाओं के बारे में समय रहते सूचना दी जा सकती है। इसके अलावा, रियल टाइम मौसम अपडेट, भूकंप की चेतावनी, बाढ़ के लिए खतरे की जानकारी और आपदा राहत की जानकारी इन प्लेटफॉर्मों पर उपलब्ध हो सकती है।

य. समुदाय आधारित जागरूकता अभियान

समुदाय के स्तर पर जागरूकता फैलाना भी बहुत महत्वपूर्ण है। स्थानीय समुदायों में आपदा बचाव प्रशिक्षण, समुदाय आधारित कार्यशालाएं और चेतावनी प्रणाली की स्थापना की जा सकती है। जब समुदाय एकजुट होकर काम करता है तो आपदाओं का सामना करना ज्यादा आसान हो सकता है।

प्राकृतिक आपदाएं हमारी जीवनशैली को प्रभावित कर सकती हैं लेकिन इनके प्रति जागरूकता बढ़ाकर हम इन आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम कर सकते हैं। जागरूकता से लोगों में सुरक्षा उपायों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है और वे आपदाओं से बचाव के लिए आवश्यक कदम उठाते हैं। इसके लिए सरकार, मीडिया, शिक्षा संस्थान और समाज के प्रत्येक व्यक्ति को मिलकर प्रयास करना होगा ताकि हम प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए तैयार हो सकें। "ज्ञान शक्ति है" — यदि हम प्राकृतिक आपदाओं के बारे में जागरूक होंगे तो हम उन्हें अधिक प्रभावी तरीके से रोक और नियंत्रित कर सकते हैं।

कोरोना महामारी 

कोरोना महामारी (COVID-19) ने 21वीं सदी में मानवता को एक गंभीर चुनौती दी है। यह महामारी 2019 के अंत में चीन के वुहान शहर से उत्पन्न हुई और कुछ ही समय में पूरी दुनिया में फैल गई। भारत में भी इसने अपनी गंभीरता का एहसास कराते हुए स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और समाज के हर पहलू को प्रभावित किया। कोरोना वायरस के प्रति जागरूकता बढ़ाना इस महामारी से लड़ने का सबसे प्रभावी उपाय है। इस शोध में हम कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के महत्व, इसके प्रचार-प्रसार के तरीकों और इसके प्रभाव को समझेंगे।

1. कोरोना महामारी का प्रभाव

कोरोना महामारी ने दुनिया भर में लाखों लोगों की जान ली और बहुतों को जीवन भर के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से प्रभावित किया। महामारी के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी दबाव पड़ा, अस्पतालों में बेड्स की कमी हुई और मेडिकल उपकरणों की आपूर्ति प्रभावित हुई। भारत में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों ने देशभर में लॉकडाउन की स्थिति उत्पन्न की, जिससे अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई। लाखों लोग बेरोजगार हो गए और छोटे व्यवसायों को भारी नुकसान हुआ। इसके अतिरिक्त मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं जैसे कि चिंता, अवसाद और तनाव भी बढ़ गए।

2. कोरोना वायरस के लक्षण और प्रसार का तरीका

कोरोना वायरस के लक्षणों में बुखार, खांसी, गले में खराश, सांस लेने में तकलीफ, थकान और गंध या स्वाद का गायब होना शामिल हैं। यह वायरस मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति के कफ, छींक और सांस के जरिए हवा में फैलता है इसके अलावा, संक्रमित सतहों को छूने से भी वायरस फैल सकता है। कोरोना वायरस का संक्रमण त्वरित रूप से फैलने के कारण इसके प्रसार को रोकने के लिए समाज में जागरूकता का होना अत्यंत आवश्यक है।

3. जागरूकता के महत्व

कोरोना महामारी के दौरान जागरूकता का उद्देश्य लोगों को सही जानकारी देना था ताकि वे सुरक्षित रह सकें। कोरोना वायरस के बारे में जानकारी, उसके प्रसार के तरीके और बचाव के उपायों को जानकर लोग खुद को और दूसरों को सुरक्षित रख सकते हैं। यदि लोग मास्क पहनने, हाथ धोने, सामाजिक दूरी बनाए रखने और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच करवाने जैसी सामान्य सावधानियों को अपनाएं तो कोरोना वायरस के प्रसार को रोका जा सकता है।

4. कोरोना के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उपाय

अ. राजकीय अभियान और मीडिया का योगदान

सरकार ने कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए विभिन्न जागरूकता अभियान चलाए। 'आत्मनिर्भर भारत', 'दो गज की दूरी', 'मास्क है जरूरी' जैसे अभियानों के माध्यम से लोगों को सही दिशा में मार्गदर्शन किया गया। मीडिया, सोशल मीडिया और रेडियो जैसे चैनल्स ने भी कोरोना के लक्षण, बचाव और उपचार के बारे में व्यापक जानकारी दी।

ब. स्वास्थ्य कर्मियों की भूमिका

स्वास्थ्य कर्मी, जैसे डॉक्टर और नर्स कोरोना के खिलाफ मोर्चे पर अग्रणी थे। उन्होंने न केवल संक्रमित व्यक्तियों का इलाज किया बल्कि आम लोगों को भी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया। उन्होंने लोगों को लॉकडाउन के दौरान सुरक्षा नियमों का पालन करने की प्रेरणा दी और मानसिक रूप से सहारा देने के प्रयास किए।



स. प्रौद्योगिकी और डिजिटल माध्यमों का उपयोग

कोरोना महामारी के समय में इंटरनेट और मोबाइल ऐप्स ने जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डिजिटल प्लेटफार्मों के माध्यम से कोरोना से जुड़ी जानकारी साझा की गई। राजकीय वेबसाइटों और ऐप्स जैसे आरोग्य सेतु ने लोगों को उनके स्वास्थ्य और कोरोना संक्रमण के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी।

5. कोरोना महामारी से जुड़े मिथक और भ्रांतियां

कोरोना वायरस के बारे में कई मिथक और भ्रांतियां भी फैली। लोगों ने यह विश्वास किया कि कोरोना केवल बुजुर्गों को ही प्रभावित करता है जबकि यह किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है। कुछ लोगों ने यह भी मान लिया कि कोरोना का इलाज घरेलू नुस्खों से हो सकता है जबकि यह वायरस केवल मेडिकल उपायों और इलाज से ही ठीक होता है। ऐसी भ्रांतियों को दूर करना और सही जानकारी देना भी जागरूकता के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

6. कोरोना के खिलाफ टीकाकरण

टीकाकरण कोरोना से लड़ने का सबसे प्रभावी तरीका साबित हुआ है। भारत में कोरोना के खिलाफ टीकाकरण अभियान की शुरुआत जनवरी 2021 में हुई। लाखों लोगों को टीका लगाने के बाद महामारी पर नियंत्रण पाया गया। लोगों को टीके के बारे में जानकारी देना और उन्हें विश्वास दिलाना कि यह सुरक्षित है जागरूकता के मुख्य पहलू रहे है।

कोरोना महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि जागरूकता और सही जानकारी के बिना हम किसी भी महामारी से नहीं लड़ सकते। कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में जागरूकता सबसे अहम हथियार है। सरकार, मीडिया, स्वास्थ्य कर्मी और नागरिक समाज सभी को मिलकर इसके खिलाफ जागरूकता फैलानी चाहिए ताकि हम सभी इस महामारी को जल्द से जल्द मात दे सकें साथ ही यह जरूरी है कि हम भविष्य में ऐसी किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहें और स्वास्थ्य संबंधी नियमों का पालन करें।

कोरोना महामारी ने हमें यह सिखाया है कि एकजुटता और सावधानी से हम किसी भी आपातकालीन स्थिति से उबर सकते हैं।

पर्यावरण संरक्षण 

हमारा पर्यावरण हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है और इसकी सुरक्षा और संरक्षण हमारी जिम्मेदारी है। प्राकृतिक संसाधन जैसे जल, हवा, मृदा, वनस्पति, और जीव-जंतु हमारे अस्तित्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। पिछले कुछ दशकों में बढ़ते प्रदूषण, वनस्पति नाश, जलवायु परिवर्तन और अन्य पर्यावरणीय संकटों ने यह साबित कर दिया है कि यदि हम पर्यावरण की रक्षा नहीं करेंगे तो हमारे अस्तित्व को खतरा हो सकता है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना अत्यंत आवश्यक है। इस लेख में हम पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के महत्व, इसके प्रचार-प्रसार के उपायों और इसके प्रभावों पर विस्तृत चर्चा करेंगे।

1. पर्यावरण संकट और इसके प्रभाव

मानव गतिविधियों, जैसे- औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, अत्यधिक जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। कुछ प्रमुख पर्यावरणीय समस्याएं निम्नलिखित हैं:

• प्रदूषण: जल, वायु और मृदा का प्रदूषण पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। वायु प्रदूषण के कारण कई बीमारियों का जन्म हो रहा है जैसे- अस्थमा, श्वसन संबंधी विकार और हृदय रोग। जल प्रदूषण का प्रभाव समुद्रों, नदियों और झीलों के इकोसिस्टम पर पड़ता है जो जलजीवों के जीवन के लिए खतरा है। मृदा प्रदूषण भी कृषि और जैव विविधता के लिए हानिकारक है।

• जलवायु परिवर्तन: जलवायु परिवर्तन की समस्या पूरी दुनिया में महसूस की जा रही है। अत्यधिक गर्मी, बर्फबारी में वृद्धि, समुद्र स्तर में वृद्धि, और अनियमित मानसून इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। जलवायु परिवर्तन से प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि हो रही है, जैसे सूखा, बाढ़, और तूफान।

• वनों की कटाई: वनों की अंधाधुंध कटाई से जैव विविधता पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। इससे न केवल हवा और जलवायु पर प्रभाव पड़ता है बल्कि कई वन्य प्रजातियाँ भी विलुप्त हो रही हैं।

• प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन: पृथ्वी पर उपलब्ध संसाधन सीमित हैं लेकिन उनकी अत्यधिक खपत और अनियंत्रित दोहन से इन संसाधनों का संतुलन बिगड़ रहा है इसका परिणाम जल संकट, खनिज संसाधनों की कमी और कृषि योग्य भूमि की हानि के रूप में सामने आ रहा है।

2. पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का महत्व

पर्यावरण संरक्षण का उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना, प्रदूषण को कम करना और जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करना है। इसके प्रति जागरूकता का महत्व कई पहलुओं में निहित है:

• प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण: यदि लोग प्राकृतिक संसाधनों की अहमियत को समझें तो वे इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल करेंगे जिससे इनका अत्यधिक दोहन रुक सकेगा।

• स्वास्थ्य में सुधार: प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियों की दर को कम किया जा सकता है यदि लोग पर्यावरण की रक्षा के उपायों को अपनाएं। साफ हवा, पानी और मृदा मानव स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं।

• जलवायु परिवर्तन का मुकाबला: जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए हर व्यक्ति को कार्बन उत्सर्जन को घटाने के उपायों को अपनाना होगा जैसे- कि ऊर्जा बचत, हरित परिवहन और वृक्षारोपण।

• सामाजिक और आर्थिक लाभ: पर्यावरण संरक्षण से न केवल प्राकृतिक संसाधनों का संतुलन रहेगा बल्कि यह दीर्घकालिक विकास के लिए भी लाभकारी होगा। जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण को नियंत्रित करने से कृषि उत्पादन बढ़ सकता है और इससे रोजगार के अवसर भी उत्पन्न हो सकते हैं।

3. पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के उपाय

अ. शिक्षा और प्रशिक्षण

पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए शिक्षा सबसे प्रभावी उपाय है। स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकता है। इसके माध्यम से छात्रों को पर्यावरणीय संकटों और उनके समाधान के बारे में जानकारी दी जा सकती है इसके अलावा विभिन्न कार्यशालाएं, सेमिनार और अभियान आयोजित करके भी समाज को पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में बताया जा सकता है।

आ. मीडिया का योगदान

मीडिया का पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान है। टेलीविजन, रेडियो, और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी जानकारी फैलाना जरूरी है। विज्ञापनों, डॉक्यूमेंट्रीज़ और पब्लिक सर्विस कैंपेन के माध्यम से लोगों को पर्यावरणीय समस्याओं और उनके समाधान के बारे में बताया जा सकता है।

इ. राजकीय योजनाएं और नीतियां

सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण के लिए कई योजनाएं और नीतियां बनाई गई हैं जैसे- स्वच्छ भारत अभियान, वृक्षारोपण अभियान, जल संरक्षण योजनाएं, और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए राजकीय प्रोत्साहन। इन योजनाओं का प्रभावी कार्यान्वयन और उनके बारे में जागरूकता फैलाना अत्यंत आवश्यक है।


ई. सामाजिक अभियानों और गैर राजकीय संगठनों (NGOs) का योगदान

गैर राजकीय संगठन (NGOs) और सामुदायिक समूह पर्यावरण संरक्षण के लिए कई कार्य कर रहे हैं। इन समूहों द्वारा वृक्षारोपण अभियान, जल संरक्षण योजनाएं और प्रदूषण नियंत्रण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। समाज के हर वर्ग को पर्यावरण की रक्षा में शामिल करने के लिए ऐसे अभियानों को बढ़ावा देना चाहिए।

उ. प्रौद्योगिकी और विज्ञान का उपयोग

आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग पर्यावरण संरक्षण में भी किया जा सकता है। जैसे- सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और बायोमास जैसी नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल बढ़ाकर कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। इसके अलावा स्मार्ट वेस्ट मैनेजमेंट, जल पुनर्चक्रण और प्रदूषण नियंत्रण तकनीकों का उपयोग भी पर्यावरण की रक्षा में किया जा सकता है।

पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना आज की आवश्यकता बन चुकी है। यदि हम पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए गंभीर कदम नहीं उठाते हैं तो आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन कठिन हो जायेगा है। पर्यावरण संरक्षण न केवल प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करता है बल्कि यह मानवता की स्थायी भलाई के लिए भी आवश्यक है। सभी स्तरों पर सरकार, समाज और व्यक्तियों को मिलकर पर्यावरण संरक्षण के उपायों को अपनाना होगा। हमें अपने कार्यों में अधिक जिम्मेदारी और सतर्कता दिखानी होगी ताकि हम अपने पर्यावरण को बचा सकें और भविष्य में आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ और सुरक्षित पर्यावरण प्रदान कर सकें।

1.9 शोध में अपनाई गई विधि

सर्वेक्षण विधि (Survey Method) सामाजिक और शैक्षिक अनुसंधान में एक प्रमुख शोध विधि है जो बड़े समूहों या जनसंख्या के बारे में जानकारी एकत्र करने के लिए उपयोग की जाती है। यह विधि उस समय विशेष रूप से प्रभावी होती है जब शोधकर्ता को किसी विशेष विषय या समस्या के बारे में लोगों के दृष्टिकोण, ज्ञान, रवैया या व्यवहार को जानने की आवश्यकता होती है। इस अध्ययन में तथ्य की जानकारी एकत्र करने के लिए सर्वेक्षण विधि का उपयोग किया हैं।

सर्वेक्षण विधि का कार्यक्षेत्र और इसके तत्व

इस विधि में विभिन्न कारकों, जैसे क्षेत्र का संग्रह, माप, वर्गीकरण, तुलना, मूल्यांकन और सामान्यीकरण आदि, शामिल होते हैं। इस अध्ययन में इन सभी तत्वों का उपयोग किया जाएगा, ताकि विद्यार्थियों के बीच इन विषयों के प्रति जागरूकता का एक गहन और विस्तृत विश्लेषण किया जा सके।

1. क्षेत्र का संग्रह 

सर्वेक्षण विधि में सबसे पहले यह महत्वपूर्ण होता है कि डेटा को एकत्रित करने के लिए सही क्षेत्र का चयन किया जाए। इस अध्ययन में उच्च माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों को लक्षित किया जाएगा और उनके बीच प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन किया जाएगा।

डेटा संग्रहण के लिए प्रश्नावली (questionnaire) या साक्षात्कार (interviews) का उपयोग किया जाएगा। प्रश्नावली में सीधे और सरल प्रश्न होंगे ताकि विद्यार्थियों से उनकी समझ और जागरूकता के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सके। प्रश्नावली में मल्टीपल चॉइस, फ्री-फॉर्म और रेटिंग स्केल वाले प्रश्नों का संयोजन होगा ताकि विभिन्न दृष्टिकोणों और प्रतिक्रियाओं को कैप्चर किया जा सके।

2. कारक और तुलना (Factors and Comparison)

इस अध्ययन में विभिन्न कारकों की पहचान की जाएगी जो विद्यार्थियों की जागरूकता पर प्रभाव डालते हैं। इनमें उनके विद्यालय की शैक्षिक नीति, शिक्षक का योगदान, पाठ्यक्रम का प्रभाव, और सामाजिक-सांस्कृतिक कारक शामिल हो सकते हैं। इसके बाद इन कारकों का तुलनात्मक विश्लेषण किया जाएगा ताकि यह समझा जा सके कि किस कारक का विद्यार्थियों की जागरूकता पर अधिक प्रभाव पड़ता है।

3. माप और वर्गीकरण (Measurement and Classification)

सर्वेक्षण विधि में जानकारी को मापने और वर्गीकृत करने का कार्य भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। डेटा को संग्रहित करने के बाद उसे मापने के लिए सांख्यिकीय विधियों का उपयोग किया जाएगा। इस प्रकार विद्यार्थियों के ज्ञान का स्तर और उनकी जागरूकता का विश्लेषण किया जाएगा।

4. मूल्यांकन (Evaluation)

सर्वेक्षण में एक महत्वपूर्ण कदम डेटा का मूल्यांकन करना होता है। विद्यार्थियों के द्वारा दिए गए उत्तरों का विश्लेषण किया जाएगा ताकि यह देखा जा सके कि क्या वे इन वैश्विक मुद्दों के बारे में पर्याप्त रूप से जागरूक हैं? मूल्यांकन में सांख्यिकीय तकनीकों का उपयोग किया जाएगा, जैसे- प्रतिशत, औसत, बहुलक और अन्य आंकड़े, जो डेटा की स्पष्टता और समझ में मदद करेंगे।

5. सामान्यीकरण (Generalization)

इस अध्ययन का उद्देश्य केवल एक विशेष विद्यालय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके परिणामों को उच्च माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों के समग्र समूह में सामान्यीकृत किया जाएगा। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि विद्यार्थियों के बीच इन मुद्दों पर जागरूकता का स्तर क्या है? और क्या ये परिणाम अन्य विद्यालयों में भी लागू हो सकते हैं? सामान्यीकरण की प्रक्रिया में यह देखा जाएगा कि क्या एक निश्चित प्रकार की शैक्षिक विधि या कार्यक्रम पूरे क्षेत्र में समान प्रभाव डालते हैं?

6. सर्वेक्षण विधि का कार्यान्वयन

सर्वेक्षण विधि में डेटा संग्रह के बाद उसे व्यवस्थित रूप से तालिकाओं में प्रस्तुत किया जाएगा। तालिका और ग्राफ़ के रूप में आंकड़ों को दर्शाया जाएगा ताकि उन्हें आसानी से समझा जा सके। इसके बाद इन आंकड़ों का विश्लेषण किया जाएगा और उन पर आधारित निष्कर्ष निकाले गये हैं।

इस अनुसंधान कार्य में अपनायी गई सर्वेक्षण विधि विद्यार्थियों के बीच जागरूकता के स्तर का समग्र विश्लेषण करने के लिए उपयुक्त है। 

1.10 उपकरण


प्रत्येक प्रकार शोध के लिए नवीन दत्त संकलित करने के लिए अथवा नवीन क्षेत्र का उपयोग करते हुए कतिपय उपकरणों की आवश्यता होती हैं इन्ही को उपकरण कहते है। 

जॉन डब्ल्यु वेस्ट:- ‘‘एक बढ़ई के संदूक में औजारों की भांति प्रत्येक अनुसंधान उपकरण विशिष्ट की पूर्ति हेंतु किसी विशिष्ठ परिस्थितियों में प्रयुक्त होता हैं।’’

किसी भी अनुसंधान की पूर्णता एवं विश्वसनीयता उसमें काम लिये गये उपकरणों पर निर्भर करती है उपकरण दो प्रकार के होते है -

1. प्रमापीकृत उपकरण  2. . अप्रमापीकृत उपकरण

इस शोध में निम्नलिखित प्रमापीकृत एवं स्वनिर्मित उपकरणों का प्रयोग किया गया हैं-

अ. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी -  स्वनिर्मित परीक्षण

प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के मापन हेतु स्वनिर्मित उपकरण का प्रयोग विद्यार्थियों के प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता का मापन करने के लिए एक मानकीकृत माप है जो कि भारतीय परिस्थितियों और संस्कृति के अनुकूल है। यह मापनी 15 से 18 आयु के विद्यार्थीयों में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के स्तर का मापन करने में सक्षम है। यह परीक्षण हिन्दी भाषा में दिया गया है। जिसमें 58 पद है जो कि दैनिक जीवन की विभिन्न व्यावहारिक परिस्थितियों से संबंधित है इस परीक्षण के प्राप्तांकों का अधिकतम प्रसार 174 अंकों तक है तथा न्यूनतम 35 अंक तक है। अधिकतम अंक प्राप्त करने का तात्पर्य है कि बालक में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता अधिक है और निम्नतम अंक प्राप्त करने का तात्पर्य है कि बालक में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता कम है।

ब. कोरोना महामारी जागरूकता प्रमापनी - स्वनिर्मित परीक्षण

कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के मापन हेतु स्वनिर्मित उपकरण का प्रयोग विद्यार्थियों के कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता का मापन करने के लिए एक मानकीकृत माप है जो कि भारतीय परिस्थितियों और संस्कृति के अनुकूल है। यह मापनी 15 से 18 आयु के विद्यार्थीयों में कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के स्तर का मापन करने में सक्षम है। यह परीक्षण हिन्दी भाषा में दिया गया है। जिसमें 57 पद है इस परीक्षण के प्राप्तांकों का अधिकतम प्रसार 171 अंकों तक है तथा न्यूनतम 35 अंक तक है। 

स. पर्यावरण जागरूकता योग्यता प्रमापनी - प्रमापीकृत परीक्षण

पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के मापन हेतु प्रवीण कुमार झा द्वारा निर्मित उपकरण Environmental Awareness Ability Measure (EAAM) का प्रयोग किया है। उपकरण का प्रयोग विद्यार्थियों के पर्यावरण के प्रति जागरूकता का मापन करने के लिए एक मानकीकृत माप है। जो कि भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल है। यह मापनी 14 से 21 आयु के विद्यार्थीयों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता के स्तर का मापन करने में सक्षम है। इस मापनी के अन्तर्गत 51 प्रश्न दिये गये है। इस परीक्षण के प्राप्तांकों का अधिकतम प्रसार 102 अंकों तक है तथा न्यूनतम 00 अंक तक है। 





1.11 सांख्यिकी तकनीक


किसी भी शोध में दत्त संकलन मात्र से शोधकार्य का महत्व नही हो जाता जब तक की दत्त संकलन का विश्लेषण उपयुक्त सांख्यिकी विधियों द्वारा न किया जाये। एकत्रित सूचनाओं एवं संकलित तथ्यों का विश्लेषण कर व्याख्या की जाती हैं तभी वह शोध उद्धेश्य पूर्ण व उपयोगी होती हैं।

प्रस्तुत अनुसंधान में भूगोल विषय के विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के अध्ययन के परीक्षण से प्राप्त आकडों के विश्लेषण अर्थापन हेतु निम्नलिखित सांख्यिकी विधियों का प्रयोग किया गया हैं-

1. मध्यमान 

2. प्रमाप विचलन 

3. ‘टी’ परीक्षण

1. मध्यमान: - यह समान्तर माध्य या औसत होता है जो कि मूल प्राप्ताकों द्वारा ज्ञात किया जाता हैं। मध्यमान की गणना निम्न सूत्र द्वारा की गई हैं-

  

X̅      = मध्यमान (MEAN)

A.M. = कल्पित मध्यमान (Assumed mean)

Σfd    = कल्पित मध्यमान से विचलन का आवृतियों से गुणनफल का योग

C.I.   = वर्गान्तर का आकार (Class Interval)

परीक्षण से प्राप्त आकडों का मध्यमान उपरोक्त सूत्र से ज्ञात किया गया हैं।





2. प्रमाप विचलन: -

प्रस्तुत अनुसंधान में प्रमाप विचलन की गणना से मूल प्राप्तांको की दूरी या विचलन को ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया गया है प्रमाप विचलन ज्ञात करने का सूत्र निम्नलिखित है -

  

σ = प्रमाप विचलन 

N = विद्यार्थियों की संख्या

CI = वर्गान्तर का आकार

Fd = कल्पित माध्य से आवृतियों का विचलन x आवृतियों का योग

Fd 2= विचलन का वर्ग x आवृतियों का योग

3. ‘t’ परीक्षण:-

प्रस्तुत अनुसंधान में अंको के मध्यमान के मध्य अन्तर की सार्थकता की जाँच करने हेतु ‘t’ परीक्षण का उपयोग किया गया है। जिसका सूत्र निम्नलिखित है-

  

‘t’ = टी मान

M1= प्रथम समूह का मध्यमान

M2= द्वितीय समूह का मध्यमान

SD1= प्रथम समूह का मानक विचलन

SD2= द्वितीय समूह का मानक विचलन

N1= प्रथम समूह के विद्यार्थियों की संख्या

N2= द्वितीय समूह के विद्यार्थियों की संख्या

1.12 शोधकार्य में अध्यायों की योजना

1 प्रथम अध्याय- इस अध्याय में प्रस्तावना, समस्या कथन समस्या का औचित्य, अध्ययन में प्रयुक्त तकनीकी शब्दों की व्याख्या, परिकल्पनाए, समस्या का परिसीमन, न्यादर्श, अध्ययन विधि, उपकरणों, सांख्यिकी तकनीक अध्यायों की रुपरेखा पर प्रकाश डाला गया हैं।

2 द्वितीय अध्याय- इस अध्याय में समस्या से संबंधित पहले हुए अनुसंधानों का  उल्लेख किया जायेगा। इस अध्याय में संबंधित साहित्य का अर्थ, प्रकार का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया हैं।

3 तृतीय अध्याय- इस अध्याय में अनुसंधान में प्रयुक्त विधि, उपकरण, न्यादर्श का उल्लेख किया जायगा। इस अध्याय में अध्ययन के लिए न्यादर्श की परीसीमाएँ, उद्देश्य लाभ, सीमाओं आदि का विवेचन करने के बाद न्यादर्श का विवरण दिया गया हैं।

4 चतुर्थ अध्याय- इस अध्याय में आकड़ों का विश्लेषण व व्याख्या प्रस्तुत की गयी हैं।

5 पंचम अध्याय- यह अध्याय शोध प्रबन्ध का अन्तिम अध्याय हैं। इस अध्याय में आकडों के विश्लेषण व व्याख्या के आधार पर परिणाम एवं निष्कर्षो का विवरण दिया जायेगा तथा शोध समस्या के भविष्य में किये जाने वाले भावी नवीन अनुसंधानों के लिए सुझाव दिये गये हैं।

1.13 उपसंहार

प्रस्तुत शोध के इस प्रथम अध्याय में इस पूरे शोध का चित्र व रुपरेखा प्रस्तुत की गई हैं। शोधकर्ता ने इस अध्याय में शोधकार्य का परिसीमन, प्रमुख तकनीकी शब्दों की व्याख्या, अध्ययन में अपनायी गयी विधि, अध्ययन में प्रयुक्त उपकरण सांख्यिकी तकनीक को सम्मिलित किया गया हैं।  

  द्वितीय अध्याय में अनुसंधान समस्या से संबंधित साहित्य का उल्लेख किया गया हैं।   













द्वितीय अध्याय - सम्बन्धित साहित्य का पुनरावलोकन 


2.1 प्रस्तावना

अनुसंधान का उद्देश्य किसी विशेष क्षेत्र में नए ज्ञान का सृजन करना, मौजूदा सिद्धांतों और विचारों की जांच करना और नए दृष्टिकोणों की खोज करना होता है। शोध प्रक्रिया में साहित्य का पुनरावलोकन (Literature Review) एक महत्वपूर्ण चरण होता है। यह शोधकर्ता को संबंधित क्षेत्र में पहले से उपलब्ध शोध और सिद्धांतों से परिचित कराता है। इसके द्वारा न केवल शोध के पिछले कार्यों को समझा जाता है बल्कि यह भी स्पष्ट होता है कि नए शोध की आवश्यकता कहां है? इस प्रक्रिया से शोधकर्ता यह निर्धारित कर सकता है कि उसे किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए?

अनुसंधान का एक महत्वपूर्ण और प्रारंभिक चरण साहित्य का पुनरावलोकन (Literature Review) होता है। यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से शोधकर्ता पहले से किए गए शोध, सिद्धांतों, अवधारणाओं और दृष्टिकोणों का अध्ययन करता है। पुनरावलोकन के माध्यम से शोधकर्ता यह जान पाता है कि किसी विशेष विषय या क्षेत्र में पहले क्या कार्य हुआ है? क्या समस्याएँ उठाई गई हैं? और किन पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया गया? साहित्य का पुनरावलोकन न केवल वर्तमान ज्ञान को सुसंगठित करता है बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि नए अनुसंधान की दिशा क्या हो सकती है?

साहित्य का पुनरावलोकन 

साहित्य का पुनरावलोकन वह प्रणालीबद्ध और संक्षिप्त समीक्षा होती है जो संबंधित क्षेत्र में प्रकाशित शोध पत्रों, किताबों, रिपोर्टों, जर्नल्स और अन्य शैक्षिक स्रोतों को एकत्रित करके की जाती है। इसका उद्देश्य यह समझना होता है कि एक विशिष्ट विषय पर अब तक क्या काम हुआ है? भविष्य में किस दिशा में शोध की संभावना हो सकती है? यह शोध कार्य का एक अविभाज्य हिस्सा होता है जो शोधकर्ता को अपने अध्ययन के लिए आवश्यक जानकारी, अवधारणाएँ, सिद्धांत और विधियाँ प्रदान करता है।

साहित्य के पुनरावलोकन का महत्व:

ज्ञान का संकलन और अवलोकन: साहित्य का पुनरावलोकन शोधकर्ता को पहले से किए गए शोधों से परिचित कराता है। यह समग्र रूप से उस क्षेत्र के समग्र ज्ञान को समझने में मदद करता है।

• शोध के उद्देश्य और प्रश्नों की पहचान: 

पुनरावलोकन से शोधकर्ता यह जान सकता है कि किस प्रकार के शोध प्रश्नों को पहले उठाया गया है? क्या कुछ नए प्रश्न अभी तक ध्यान में नहीं आए हैं? इससे वह अपने शोध के उद्देश्यों को स्पष्ट और व्यवस्थित कर सकता है।

• शोध के अंतराल की पहचान: 

पुनरावलोकन के दौरान शोधकर्ता यह पहचान सकता है कि पहले किए गए शोधों में क्या कमियाँ रही हैं? या किस क्षेत्र में कम काम हुआ है? इससे शोधकर्ता को नए दृष्टिकोण या नई दिशा में अनुसंधान करने का अवसर मिलता है।

• सिद्धांत और अवधारणाओं का मूल्यांकन: 

साहित्य पुनरावलोकन के माध्यम से शोधकर्ता यह समझ सकता है कि विभिन्न विद्वान किस प्रकार के सिद्धांतों और मॉडल्स का उपयोग कर रहे हैं और क्या वे सिद्धांत वर्तमान समय में प्रासंगिक हैं या नहीं?



• अनुसंधान विधियाँ: 

साहित्य के पुनरावलोकन से यह भी पता चलता है कि किन शोध विधियों और पद्धतियों का प्रयोग पहले के शोधों में किया गया था। इससे शोधकर्ता को यह समझने में मदद मिलती है कि उसकी शोध के लिए कौन सी विधि उपयुक्त हो सकती है?

• वैज्ञानिक समुदाय में बहस और विवाद: 

पुनरावलोकन से शोधकर्ता विभिन्न विद्वानों के विचारों, दृष्टिकोणों और उनसे जुड़ी बहसों को समझ सकता है। यह उसे यह जानने में मदद करता है कि किसी मुद्दे पर विभिन्न विचारधाराएँ क्या हैं?

पुनरावलोकन के उद्देश्य:

साहित्य का पुनरावलोकन शोध की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य पूरा करता है-

1 शोध की दिशा और लक्ष्यों का निर्धारण: यह पुनरावलोकन शोध के उद्देश्यों को स्पष्ट करता है और शोध के दायरे को परिभाषित करता है।

2 नई समझ और सिद्धांतों की पहचान: साहित्य के पुनरावलोकन से शोधकर्ता यह पहचान सकता है कि किन नए या संशोधित सिद्धांतों और विचारों की आवश्यकता हो सकती है?

3 शोध में नवीनता: यह शोधकर्ता को यह संकेत देता है कि किस क्षेत्र में अभी भी नए शोध की आवश्यकता है? ताकि वह कुछ नया, महत्वपूर्ण और उपयुक्त योगदान दे सके।

4 स्रोतों का चयन: साहित्य के पुनरावलोकन की शुरुआत विभिन्न प्रकार के स्रोतों के चयन से होती है जैसे- शैक्षिक जर्नल्स, किताबें, शोध रिपोर्ट्स, सम्मेलनों के पेपर, वेब स्रोत आदि।

5 स्रोतों का वर्गीकरण: पुनरावलोकन में चयनित स्रोतों को वर्गीकृत किया जाता है। यह वर्गीकरण विषय, दृष्टिकोण, समय या शोध पद्धतियों के आधार पर किया जा सकता है।


6 समीक्षा और विश्लेषण: प्रत्येक स्रोत का गहनता से अध्ययन किया जाता है। शोधकर्ता यह देखता है कि किस स्रोत में क्या योगदान दिया गया है? उसे वर्तमान संदर्भ में किस तरह से देखा जा सकता है?

7 सारांश और निष्कर्ष: पुनरावलोकन के अंत में शोधकर्ता यह सारांशित करता है कि अब तक के शोध में क्या महत्वपूर्ण बातें निकलकर आई हैं? आगे के शोध के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

साहित्य पुनरावलोकन के प्रकार:

1 परंपरागत पुनरावलोकन: इसमें शोधकर्ता विभिन्न स्रोतों का सामान्य अध्ययन करता है और उन्हें एक समग्र रूप से प्रस्तुत करता है। यह अधिकतर वर्णनात्मक होता है।

2 व्यवस्थित पुनरावलोकन: इसमें शोधकर्ता एक विशिष्ट शोध प्रश्न या विषय के चारों ओर पूरी तरह से व्यवस्थित और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से अध्ययन करता है। इसे अक्सर मेटा-विश्लेषण भी कहा जाता है जिसमें प्राप्त जानकारी का सांख्यिकीय विश्लेषण किया जाता है।

3 सिंथेटिक पुनरावलोकन: इसमें विभिन्न स्रोतों से प्राप्त डेटा को मिलाकर एक नया दृष्टिकोण तैयार किया जाता है। यह किसी विशेष सिद्धांत, मॉडल या अवधारणा को परिभाषित करने की दिशा में किया जाता है।

साहित्य के पुनरावलोकन में सावधानियाँ:

1 पूर्वाग्रह से बचें: शोधकर्ता को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह साहित्य पुनरावलोकन में किसी एक दृष्टिकोण या स्रोत को अधिक महत्व न दे बल्कि सभी स्रोतों का निष्पक्ष मूल्यांकन करे।

2 स्रोतों का चयन सावधानीपूर्वक करें: केवल प्रासंगिक और उच्च गुणवत्ता वाले स्रोतों का चयन करना चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए कि शोध परिष्कृत और अद्यतन है स्रोतों को ताजगी और विश्वसनीयता के आधार पर चुना जाए।

3 संक्षिप्तता बनाए रखें: साहित्य पुनरावलोकन को संक्षिप्त और उद्देश्यपूर्ण बनाना चाहिए। शोधकर्ता को यह ध्यान रखना चाहिए कि अवलोकन न केवल व्यापक हो, बल्कि वह उसके शोध के उद्देश्य से भी संबंधित हो।

साहित्य का पुनरावलोकन अनुसंधान प्रक्रिया का एक अत्यंत आवश्यक हिस्सा है, जो शोधकर्ता को अपने अध्ययन के क्षेत्र में व्यापक और गहरा ज्ञान प्राप्त करने में मदद करता है। यह न केवल पुराने शोधों का मूल्यांकन करने में सहायक होता है बल्कि शोधकर्ता को नए विचार, पद्धतियाँ और दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा भी देता है। सही तरीके से किया गया साहित्य पुनरावलोकन शोध के लिए एक मजबूत आधार तैयार करता है और शोधकर्ता को अपने अनुसंधान के लिए एक स्पष्ट दिशा प्रदान करता है।


2.2 भारत मे किये गये अनुसंधान से सम्बन्धित साहित्य का पुनरावलोकन

2.2.1 प्राकृतिक आपदाओं से सम्बन्धित साहित्य का पुनरावलोकन

1. जोशी, ए., और तिवारी, आर (2017) "भारत में आपदा जागरूकता पर शिक्षा का प्रभाव", पुणे विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में शिक्षा के माध्यम से प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता का फैलाव।

निष्कर्ष: शिक्षा के प्रभाव से छात्रों और उनके परिवारों में आपदाओं से संबंधित जागरूकता बढ़ी लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रभाव कम था।


2. वर्मा, पी., और गुप्ता, एम. (2017) "भारत में आपदा जागरूकता कार्यक्रम और उनकी प्रभावशीलता" मुंबई विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में आपदा जागरूकता कार्यक्रमों की प्रभावशीलता का विश्लेषण।

निष्कर्ष: आपदा जागरूकता कार्यक्रमों ने जन जागरूकता बढ़ाई लेकिन वास्तविक आपदा स्थिति में प्रतिक्रिया में कमी थी।

3. गुप्ता, एस., और रानी, के. (2017) "भारतीय महिलाओं में आपदा की तैयारी और जागरूकता" जयपुर विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में महिलाओं में आपदा तैयारी और जागरूकता का विश्लेषण।

निष्कर्ष: महिलाओं में आपदा जागरूकता बढ़ी लेकिन आपदाओं से बचाव के उपायों को लेकर व्यवहार में परिवर्तन की आवश्यकता है।

4. कुमार, पी., और जोशी, आर. (2018) "भारत में भूकंप के बारे में सार्वजनिक धारणा और जागरूकता" लखनऊ विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में भूकंप के प्रति जनता की जागरूकता और उनके जोखिम मूल्यांकन का अध्ययन।

निष्कर्ष: भूकंप के प्रति जागरूकता में सुधार हुआ है लेकिन भूकंपीय क्षेत्रों में लोगो की तैयारी में कमी है।

5. शर्मा, एस., और ठाकुर, आर (2018) "ग्रामीण भारत में आपदा जोखिम न्यूनीकरण और सामुदायिक जागरूकता" चंडीगढ़ विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: ग्रामीण भारत में आपदा जोखिम में कमी लाने के लिए समुदाय की जागरूकता का विश्लेषण।

निष्कर्ष: ग्रामीण समुदायों में आपदा जोखिम कम करने के उपायों के बारे में जागरूकता बढ़ी लेकिन स्थानीय संसाधनों की कमी बनी रही।

6. शर्मा, आर., और पटेल, पी. (2018) "भारत के लोगों में आपदा जागरूकता और तैयारी", दिल्ली विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति लोगों में जागरूकता और तैयारी की स्थिति का अध्ययन।

निष्कर्ष: आपदाओं के प्रति जागरूकता में वृद्धि हुई है लेकिन आपातकालीन प्रबंधन की तैयारी में कमी बनी हुई है।

7. सिन्हा, पी., और शर्मा, एम. (2018) "भारत में बाढ़ प्रबंधन और तैयारी के बारे में जागरूकता" कोलकाता विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में बाढ़ प्रबंधन और आपदा प्रतिक्रिया में जागरूकता की स्थिति का अध्ययन।

निष्कर्ष: बाढ़ प्रबंधन की तैयारियों में जागरूकता बढ़ी लेकिन कुछ क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की कमी बनी हुई है।

8. मिश्रा, के., और सिंह, एन (2019) "भारत में आपदा जागरूकता पर जलवायु परिवर्तन और इसका प्रभाव" जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति भारत में जागरूकता पर इसके प्रभाव का अध्ययन।

निष्कर्ष: जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता बढ़ी है लेकिन इसके प्रभावों को रोकने के लिए तैयारी में कमियां हैं।

9. सिंह, ए., और कुमार, एम (2019) "भारत में आपदा जागरूकता में मीडिया की भूमिका", बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में मीडिया द्वारा प्राकृतिक आपदाओं के बारे में जन जागरूकता फैलाने की भूमिका।

निष्कर्ष: मीडिया ने आपदाओं के प्रति जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन यह प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित था।

10. रेड्डी, वी., और चौधरी, आर. (2019) "भारत में शहरीकरण और प्राकृतिक आपदा जागरूकता" बैंगलोर विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: शहरीकरण और इसके प्रभाव के तहत भारत में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता का अध्ययन।

निष्कर्ष: शहरीकरण के कारण आपदाओं के प्रति जागरूकता बढ़ी है लेकिन शहरी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की चुनौतियां भी बढ़ी हैं।

11. मेहता, डी., और शाह, पी (2019). "भारत में आपदा जागरूकता पर प्रौद्योगिकी का प्रभाव" राजस्थान विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में तकनीकी उपकरणों और सोशल मीडिया के माध्यम से आपदा जागरूकता पर प्रभाव का अध्ययन।

निष्कर्ष: तकनीकी उपकरणों और सोशल मीडिया ने आपदा जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में।

12. वर्मा, एस., और रेड्डी, ए (2020) "भारत में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति सामुदायिक जागरूकता और प्रतिक्रिया" हैदराबाद विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति समुदाय की जागरूकता और प्रतिक्रिया की स्थिति का विश्लेषण।

निष्कर्ष: समुदायों ने आपदाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाई है लेकिन तत्काल प्रतिक्रिया और बचाव कार्यों में कमी रही।

13. पटेल, ए., और मेहता, एस. (2020) "भारत में आपदा जागरूकता को बढ़ावा देने में सरकार की भूमिका" अहमदाबाद विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में आपदा जागरूकता को बढ़ावा देने में सरकार की भूमिका का अध्ययन।

निष्कर्ष: सरकार ने जागरूकता बढ़ाने के लिए कई पहल कीं लेकिन इसे अधिक व्यापक बनाने की आवश्यकता है।

14. कुमार, आर., और यादव, एस. (2020) "भारत में आपदा प्रबंधन और जन जागरूकता" राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान, भारत।

उद्देश्य: भारत में आपदा प्रबंधन के प्रभाव और सार्वजनिक जागरूकता का विश्लेषण।

निष्कर्ष: सार्वजनिक जागरूकता में सुधार हुआ लेकिन आपदा प्रबंधन की योजनाओं में व्यापक बदलाव की आवश्यकता है।

15. सिंह, पी., और नायर, आर. (2020) "भारत में आपदा जागरूकता और राहत में गैर सरकारी संगठनों की भूमिका"

उद्देश्य: भारत में आपदा जागरूकता और राहत कार्यों में गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका का अध्ययन।

निष्कर्ष: NGOs ने आपदा जागरूकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन राहत कार्यों में बेहतर समन्वय की आवश्यकता है।

16. यादव, आर., और खन्ना, एम (2020) "भारत में आपदा जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियाँ और जागरूकता" अहमदाबाद विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में आपदा जोखिम में कमी लाने के लिए रणनीतियों और जागरूकता की स्थिति का विश्लेषण।

निष्कर्ष: विभिन्न रणनीतियों के बावजूद, आपदा जोखिम में कमी लाने के प्रयासों में प्रभावी समन्वय की कमी थी।

प्राकृतिक आपदाओं से संबंधित साहित्य के पुनरावलोकन से यह स्पष्ट होता है कि आपदाओं के प्रभावों को समझने और उनसे निपटने के लिए कई शोधों ने विभिन्न दृष्टिकोणों से अध्ययन किया है। इन शोधों में मुख्य रूप से आपदा प्रबंधन, स्थानीय अनुकूलन उपाय, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और समुदाय आधारित पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है। कुछ शोधों ने तो आपदाओं के बाद के पुनर्निर्माण और राहत कार्यों पर भी महत्वपूर्ण निष्कर्ष दिए हैं। सभी अध्ययन यह संकेत करते हैं कि आपदाओं से बचाव के लिए सूचित और संगठित योजनाएँ, जागरूकता कार्यक्रम और प्रभावी नीतियाँ आवश्यक हैं।

2.2.2 कोरोना महामारी से सम्बन्धित साहित्य का पुनरावलोकन

भारत में COVID-19 के दौरान जागरूकता और उसके प्रभावों से संबंधित शोध कार्यों को प्रस्तुत करता है। इन शोधों में महामारी के प्रति सार्वजनिक जागरूकता, सरकारी नीतियों की प्रभावशीलता और समाज के विभिन्न वर्गों में जागरूकता फैलाने के उपायों पर विचार किया गया है।

1. शर्मा, आर., व कुमार, एस. (2020) "COVID-19 जागरूकता और भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव", यूनिवर्सिटी ऑफ दिल्ली, भारत।

उद्देश्य: भारत में COVID-19 के प्रति जागरूकता के प्रभाव का अध्ययन।

निष्कर्ष: जागरूकता अभियानों ने महामारी के प्रसार को नियंत्रित करने में मदद की लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में जानकारी की कमी थी।

2. पटेल, एम., और सिंह, पी. (2020) "ग्रामीण भारत में कोविड-19 जागरूकता में सोशल मीडिया की भूमिका" गुजरात विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: ग्रामीण भारत में सोशल मीडिया के माध्यम से COVID-19 के प्रति जागरूकता फैलाने का अध्ययन।

निष्कर्ष: सोशल मीडिया ने महामारी के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की लेकिन कुछ हिस्सों में डिजिटल साक्षरता की कमी रही।

3. जोशी, ए., और कुमार, वी (2020)"भारत में सरकारी स्वास्थ्य अभियान और कोविड-19 जागरूकता" मुंबई विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में सरकारी स्वास्थ्य अभियानों का COVID-19 जागरूकता पर प्रभाव।

निष्कर्ष: सरकारी अभियान जैसे 'आयुष मंत्रालय' और 'मास्क पहनने की पहल' ने नागरिकों में जागरूकता बढ़ाई।

4. शर्मा, आर., और अग्रवाल, टी. (2020)"शहरी और ग्रामीण भारत में COVID-19 जागरूकता अभियानों का प्रभाव" जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: शहरी और ग्रामीण भारत में COVID-19 जागरूकता अभियानों का तुलनात्मक अध्ययन।

निष्कर्ष: शहरी इलाकों में जागरूकता अभियानों की प्रभावशीलता अधिक थी जबकि ग्रामीण इलाकों में सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ थीं।

5. गुप्ता, डी., और वर्मा, एस (2020) "भारत में कोविड-19 सुरक्षा उपायों की सार्वजनिक धारणा" बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में COVID-19 के सुरक्षा उपायों पर जनता की धारणा का विश्लेषण।

निष्कर्ष: अधिकांश लोगों ने सुरक्षा उपायों का पालन किया लेकिन कुछ में वायरस के प्रति अवास्तविक धारणा भी पाई गई।

6. मेहता, ए., और पटेल, आर. (2020) "भारत में कोविड-19 जागरूकता में स्वास्थ्य देखभाल कर्मियों की भूमिका" अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली, भारत।

उद्देश्य: स्वास्थ्यकर्मियों का COVID-19 के प्रति जागरूकता फैलाने में योगदान।

निष्कर्ष: स्वास्थ्यकर्मियों ने कोविड-19 के प्रति सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

7. कपूर, पी., और शाह, ए. (2020)"भारतीय युवाओं में कोविड-19 जागरूकता: एक अध्ययन" पुणे विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारतीय युवाओं में COVID-19 के प्रति जागरूकता और उनके व्यवहार का अध्ययन।

निष्कर्ष: भारतीय युवाओं में अधिक जागरूकता थी और अधिकांश लोग सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन करते थे।

8. मिश्रा, एस., और जैन, ए. (2020) "भारत में प्रवासी श्रमिकों के बीच कोविड-19 की धारणाएँ" टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, भारत।

उद्देश्य: भारत में प्रवासी श्रमिकों के बीच COVID-19 के प्रति जागरूकता और उनके अनुभव।

निष्कर्ष: प्रवासी श्रमिकों के बीच महामारी के बारे में जानकारी की कमी थी और उन्हें जागरूकता अभियान की आवश्यकता थी।

9. कुमार, पी., और सिंह, ए. (2020) "ग्रामीण भारत में कोविड-19 स्वास्थ्य प्रोटोकॉल के बारे में जागरूकता और उसे अपनाना" राजस्थान विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: ग्रामीण भारत में COVID-19 स्वास्थ्य प्रोटोकॉल को लेकर जागरूकता और पालन का अध्ययन।

निष्कर्ष: ग्रामीण क्षेत्रों में COVID-19 प्रोटोकॉल का पालन सीमित था लेकिन शिक्षा और सरकारी हस्तक्षेप से सुधार हुआ।

10. वर्मा, एस., और भटनागर, पी. (2020) "भारत के स्कूलों में कोविड-19 जागरूकता कार्यक्रमों की प्रभावशीलता" दिल्ली विश्वविद्यालय , भारत।

उद्देश्य: स्कूलों में COVID-19 जागरूकता कार्यक्रमों की प्रभावशीलता का अध्ययन।

निष्कर्ष: स्कूलों में आयोजित जागरूकता कार्यक्रमों ने छात्रों और उनके परिवारों में COVID-19 के प्रति जागरूकता बढ़ाई।

11. जोशी, आर., और शर्मा, एन. (2020) "भारत में कोविड-19 और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता" बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: COVID-19 और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता का अध्ययन।

निष्कर्ष: मानसिक स्वास्थ्य पर महामारी के नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए जागरूकता अभियानों की आवश्यकता थी।

12. वर्मा, एस., और अग्रवाल, एस. (2020) "प्रभावः भारत में महिला स्वास्थ्य पर कोविड-19 जागरूकता अभियान की समीक्षा" लखनऊ विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य पर COVID-19 जागरूकता अभियानों के प्रभाव का विश्लेषण।

निष्कर्ष: महिलाओं में COVID-19 के प्रति जागरूकता बढ़ी लेकिन कुछ क्षेत्रों में शिक्षा की कमी थी।

13. सिंह, आर., और चौधरी, एस. (2020) "कोविड-19 जागरूकता और भारत में महामारी को नियंत्रित करने में इसकी भूमिका" दिल्ली विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: COVID-19 जागरूकता और महामारी को नियंत्रित करने में इसके प्रभाव का अध्ययन।

निष्कर्ष: जन जागरूकता अभियानों ने महामारी के प्रसार को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

14. तिवारी, ए., और कुमार, एस. (2020) "भारतीय मलिन बस्तियों में कोविड-19 जागरूकता" मुंबई विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारतीय झुग्गी-झोपड़ी क्षेत्रों में COVID-19 के प्रति जागरूकता का विश्लेषण।

निष्कर्ष: झुग्गी क्षेत्रों में जागरूकता की कमी थी लेकिन सामुदायिक प्रयासों ने मदद की।

15. मेहता, पी., और ठाकुर, आर. (2020) "भारत में कोविड-19 जागरूकता और स्वास्थ्य व्यवहार में बदलाव" गुजरात विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: COVID-19 के प्रति स्वास्थ्य व्यवहारों में बदलाव का अध्ययन।

निष्कर्ष: जागरूकता अभियानों ने सामाजिक दूरी और स्वच्छता जैसे व्यवहारों में सकारात्मक बदलाव लाया।

16. मिश्रा, आर., और सिंह, ए. (2020) "बच्चों पर कोविड-19 जागरूकता का प्रभाव भारत में स्वास्थ्य व्यवहार" बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में बच्चों के स्वास्थ्य व्यवहार पर COVID-19 जागरूकता के प्रभाव का विश्लेषण।

निष्कर्ष: बच्चों में स्वच्छता और मास्क पहनने की आदतें बढ़ीं लेकिन कुछ क्षेत्रों में सूचना का अभाव था।

17. देसाई, आर., और शाह, एच. (2020) "भारत में बुजुर्गों के बीच कोविड-19 जागरूकता" अहमदाबाद विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में वृद्ध व्यक्तियों में COVID-19 के प्रति जागरूकता का विश्लेषण।

निष्कर्ष: वृद्ध व्यक्तियों में जागरूकता की कमी थी लेकिन स्वास्थ्यकर्मियों और स्थानीय प्रशासन ने सहायता प्रदान की।

18. वर्मा, पी., और अग्रवाल, एम. (2020) "कोविड-19 के दौरान भारत में सामाजिक दूरी के प्रति जागरूकता" राजस्थान विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में COVID-19 के दौरान सामाजिक दूरी के प्रति जागरूकता का विश्लेषण।

निष्कर्ष: शहरी क्षेत्रों में सामाजिक दूरी का पालन अधिक था जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह चुनौतीपूर्ण था।

19. कुमार, एस., और गुप्ता, ए. (2020) "कोविड-19 के दौरान भारत में सामाजिक दूरी के प्रति जागरूकता" भारत में स्वास्थ्य कर्मियों पर कोविड-19 जागरूकता" एम्स, नई दिल्ली, भारत।

उद्देश्य: भारतीय स्वास्थ्यकर्मियों में COVID-19 के प्रति जागरूकता का प्रभाव।

निष्कर्ष: स्वास्थ्यकर्मियों के बीच जागरूकता और सुरक्षा उपकरणों की आवश्यकता थी।

20. रेड्डी, एस., और पटेल, जे. (2020) "भारतीय मीडिया में कोविड-19 जागरूकता अभियान" हैदराबाद विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारतीय मीडिया में COVID-19 जागरूकता अभियानों का प्रभाव।

निष्कर्ष: मीडिया अभियानों ने महामारी के प्रति जागरूकता बढ़ाई लेकिन फेक न्यूज का भी प्रसार हुआ।

भारत में COVID-19 के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए किए गए शोधों में देखा गया कि मीडिया, सोशल मीडिया, सरकारी उपायों और स्वास्थ्यकर्मियों की सक्रिय भूमिका रही। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने में चुनौतियाँ थीं, खासकर डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण। हालांकि, समय के साथ जागरूकता अभियानों ने सकारात्मक प्रभाव डाला, लेकिन कुछ क्षेत्रों में जानकारी की असमानता और फेक न्यूज भी समस्याएं बनी रही।

 2.2.3 पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता से सम्बन्धित साहित्य का पुनरावलोकन

भारत में पर्यावरण संरक्षण से संबंधित जागरूकता पर किए गए प्रमुख शोध कार्यों को प्रस्तुत करता है। शोधों में पर्यावरणीय मुद्दों पर सामाजिक, शैक्षिक और मीडिया आधारित दृष्टिकोणों पर ध्यान केंद्रित किया गया है जिनमें जलवायु परिवर्तन, जल प्रदूषण, अपशिष्ट प्रबंधन, ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरणीय शिक्षा पर फोकस किया गया है। नीचे 20 प्रमुख शोध पत्रों का विवरण दिया गया है:

1. कुमार, पी., और वर्मा, आर. (2017) "भारत में पर्यावरण जागरूकता पर मीडिया का प्रभाव" मुंबई विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में मीडिया के माध्यम से पर्यावरणीय जागरूकता का प्रसार।

निष्कर्ष: मीडिया के प्रभाव से पर्यावरणीय मुद्दों पर जन जागरूकता बढ़ी लेकिन फेक न्यूज और गलत जानकारी भी प्रचलित हो गई।

2. पटेल, एन., और कुमार, टी. (2017) "भारत में पर्यावरण जागरूकता और जल संरक्षण" मुंबई विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में जल संरक्षण के प्रति जागरूकता का विश्लेषण।

निष्कर्ष: जल संकट के प्रति जागरूकता बढ़ी लेकिन जल संरक्षण की आदतें व्यापक रूप से प्रचलित नहीं हुईं।

3. अग्रवाल, एस., और भट्टाचार्य, आर. (2017) "भारत में पर्यावरण जागरूकता और इसका आर्थिक प्रभाव" कोलकाता विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में पर्यावरणीय जागरूकता का आर्थिक प्रभाव।

निष्कर्ष: पर्यावरणीय जागरूकता का आर्थिक विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है, लेकिन इस बदलाव को पूर्ण रूप से लागू करने में समय लगता है।

4. शर्मा, आर., और गुप्ता, एम. (2018) "भारत में पर्यावरण जागरूकता और इसका सतत विकास पर प्रभाव" दिल्ली विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में पर्यावरणीय जागरूकता और सतत विकास पर इसके प्रभाव का विश्लेषण।

निष्कर्ष: भारत में पर्यावरणीय जागरूकता में वृद्धि हुई है लेकिन नीति निर्माण और सार्वजनिक व्यवहार में परिवर्तन में कमी देखी गई।

5. मिश्रा, के., और सिंह, एन. (2018) "भारत में युवाओं में पर्यावरण जागरूकता" जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारतीय युवाओं में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का विश्लेषण।

निष्कर्ष: भारतीय युवा पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर अधिक जागरूक हैं, लेकिन उन्हें व्यवहार में परिवर्तन के लिए अधिक प्रेरणा की आवश्यकता है।

6. सिन्हा, पी., और शर्मा, आर. (2018) "भारतीय शहरों में अपशिष्ट प्रबंधन के बारे में जागरूकता और अभ्यास" दिल्ली विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारतीय शहरी क्षेत्रों में अपशिष्ट प्रबंधन के प्रति जागरूकता और उसकी आदतों का अध्ययन।

निष्कर्ष: शहरी क्षेत्रों में अपशिष्ट प्रबंधन में सुधार हुआ लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रचलन सीमित था।

7. पाटिल, ए., और जोशी, आर. (2018) "शहरीकरण और भारत में पर्यावरण जागरूकता पर इसका प्रभाव" पुणे विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: शहरीकरण और पर्यावरणीय जागरूकता पर उसके प्रभाव का अध्ययन।

निष्कर्ष: शहरीकरण से पर्यावरणीय मुद्दों पर जागरूकता में वृद्धि हुई लेकिन इसका असर भी पर्यावरणीय दबाव के रूप में पड़ा।

8. मेहता, आर., और वर्मा, एस. (2018) "भारत में अक्षय ऊर्जा के बारे में जागरूकता" राजस्थान विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में नवीकरणीय ऊर्जा के प्रति जागरूकता और उसके प्रभाव का अध्ययन।

निष्कर्ष: नवीकरणीय ऊर्जा के प्रति जागरूकता बढ़ी लेकिन इसके कार्यान्वयन के लिए जरूरी तकनीकी और आर्थिक चुनौतियाँ बनीं।

9. चावला, पी., और कपूर, एम. (2019) "भारत में पर्यावरण जागरूकता अभियानों का प्रभाव" चंडीगढ़ विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में पर्यावरण जागरूकता अभियानों के प्रभाव का मूल्यांकन।

निष्कर्ष: जागरूकता अभियानों ने समाज में पर्यावरणीय सुधार की दिशा में योगदान दिया है लेकिन निरंतर प्रयास की आवश्यकता है।

10. सिंह, एस., और जोशी, ए. (2019) "भारत में पर्यावरण जागरूकता में शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका" बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: शैक्षिक संस्थानों की भूमिका और भारत में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता में उनका योगदान।

निष्कर्ष: शैक्षिक संस्थानों ने पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रभाव सीमित है।

11. वर्मा, एस., और रेड्डी, आर. (2019) "ग्रामीण भारत में पर्यावरण संरक्षण जागरूकता और अभ्यास" हैदराबाद विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: ग्रामीण भारत में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता और उसके पालन की स्थिति।

निष्कर्ष: ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता बढ़ी है लेकिन पर्यावरणीय सुधारों को लागू करने में आर्थिक और सामाजिक समस्याएं आ रही हैं।

12. भारद्वाज, ए., और कपूर, एम. (2019) "भारत में पर्यावरण जागरूकता में गैर सरकारी संगठनों की भूमिका" टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, भारत।

उद्देश्य: भारत में पर्यावरणीय जागरूकता फैलाने में गैर सरकारी संगठनों (NGOs) की भूमिका।

निष्कर्ष: NGOs ने पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, खासकर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में।

13. गुप्ता, एम., और शर्मा, वी. (2019) "लिंग और भारत में पर्यावरण जागरूकता" जयपुर विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारतीय महिलाओं में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन।

निष्कर्ष: महिलाएं पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति अधिक जागरूक हैं और सुधार के लिए पहल करती हैं।

14. देसाई, आर., और ठाकुर, एस. (2020) "भारत में वायु प्रदूषण और पर्यावरण जागरूकता की सार्वजनिक धारणा" अहमदाबाद विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में वायु प्रदूषण के प्रति जन जागरूकता और उसके प्रभाव का अध्ययन।

निष्कर्ष: नागरिकों में वायु प्रदूषण को लेकर जागरूकता बढ़ी लेकिन इसके समाधान के लिए ठोस कदमों की कमी महसूस हुई।

15. कुमार, वी., और पटेल, ए. (2020) "भारत में जलवायु परिवर्तन जागरूकता और अनुकूलन" राजस्थान विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता और इसके अनुकूलन उपायों का विश्लेषण।

निष्कर्ष: जलवायु परिवर्तन पर जागरूकता बढ़ी लेकिन इसके प्रभावों से निपटने के लिए सरकारी उपायों की कमी थी।

16. वर्मा, ए., और तिवारी, एस. (2020) "भारतीय विद्यालयों में पर्यावरण संरक्षण जागरूकता" लखनऊ विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारतीय स्कूलों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के प्रयास।

निष्कर्ष: स्कूलों में पर्यावरण संरक्षण शिक्षा ने छात्रों और उनके परिवारों में जागरूकता बढ़ाई।

17. रेड्डी, के., और कुमार, एस. (2020) "भारत में सतत विकास लक्ष्य और पर्यावरण जागरूकता" राष्ट्रीय पर्यावरण अध्ययन संस्थान, भारत।

उद्देश्य: भारत में सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) और पर्यावरणीय जागरूकता का विश्लेषण।

निष्कर्ष: SDGs को लेकर जागरूकता बढ़ी लेकिन उनके कार्यान्वयन में चुनौतियाँ बनीं।

18. चौधरी, डी., और रानी, के. (2020) "भारत में पर्यावरण जागरूकता पर हरित पहल का प्रभाव" बैंगलोर विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में हरित पहलों के प्रभाव का पर्यावरणीय जागरूकता पर विश्लेषण।

निष्कर्ष: हरित पहलों से पर्यावरणीय जागरूकता में सकारात्मक प्रभाव पड़ा लेकिन अधिक व्यापक प्रचार की आवश्यकता है।

19. शर्मा, पी., और जोशी, आर. (2020) "भारत में पर्यावरण जागरूकता में धार्मिक संस्थानों की भूमिका" वाराणसी, भारत।

उद्देश्य: भारत में धार्मिक संस्थाओं की पर्यावरणीय जागरूकता फैलाने में भूमिका।

निष्कर्ष: धार्मिक संस्थाओं ने पर्यावरण संरक्षण में प्रभावी भूमिका निभाई, विशेष रूप से ग्रामीण समुदायों में।

20. राठी, एम., और शर्मा, पी. (2020) "भारत में पर्यावरण जागरूकता पर कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी का प्रभाव" गुड़गांव विश्वविद्यालय, भारत।

उद्देश्य: भारत में कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (CSR) और पर्यावरणीय जागरूकता पर इसके प्रभाव का अध्ययन।

निष्कर्ष: CSR पहलों ने पर्यावरणीय जागरूकता को बढ़ावा दिया खासकर कंपनियों के सहयोग से सार्वजनिक जागरूकता अभियान बढ़े।

यह पुनरावलोकन भारत में पर्यावरण संरक्षण से संबंधित जागरूकता पर विभिन्न दृष्टिकोणों से किए गए अनुसंधान कार्यों का सारांश प्रस्तुत करता है जो पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर जागरूकता और व्यावहारिक बदलाव लाने के लिए लगातार काम कर रहे हैं।




2.3 विदेशो मे किये अनुसंधान से सम्बन्धित साहित्य का अध्ययन

2.3.1 विदेशो मे किये गये प्राकृतिक आपदाओं से सम्बन्धित साहित्य का पुनरावलोकन

प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता, उनके प्रबंधन और इन आपदाओं से निपटने के उपायों पर आधारित हैं। इन शोधों में विभिन्न देशों और विश्वविद्यालयों से संबंधित शोधकर्ताओं द्वारा किए गए कार्यों का विवरण है।

1. सातो, आर., और तनाका, के. (2019) "समुदाय-आधारित आपदा जोखिम न्यूनीकरण: जापान में एक केस स्टडी" क्योटो विश्वविद्यालय, जापान।

उद्देश्य: जापान में समुदाय आधारित आपदा जोखिम घटाने (DRR) कार्यक्रमों का अध्ययन।

निष्कर्ष: सामुदायिक दृष्टिकोण ने स्थानीय लोगों में आपदाओं के प्रति जागरूकता और उन्हें संभालने की क्षमता बढ़ाई।

2. मुलर, टी., और फिशर, एस. (2019) "यूरोप में बाढ़ के लिए जागरूकता और तैयारी: एक केस स्टडी" बर्लिन विश्वविद्यालय, जर्मनी।

उद्देश्य: यूरोप में बाढ़ों के प्रति जागरूकता और तैयारी की स्थिति का अध्ययन।

निष्कर्ष: बाढ़ों के प्रति जागरूकता के लिए शिक्षा और स्थानीय सरकारों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

3. गुयेन, टी., और पार्क, वाई. (2019) "दक्षिण पूर्व एशिया के तटीय क्षेत्रों में सुनामी के लिए तैयारी और जागरूकता" नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर, सिंगापुर।

उद्देश्य: दक्षिण-पूर्व एशिया के तटीय क्षेत्रों में सुनामी के प्रति जागरूकता और तैयारी का अध्ययन।

निष्कर्ष: तटीय क्षेत्रों में सुनामी के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रभावी योजनाओं और शिक्षा की आवश्यकता है।

4. शर्मा, एस., और थापा, एस. (2019) "विकासशील देशों में प्राकृतिक आपदा तैयारी: नेपाल में भूकंप जागरूकता का एक अध्ययन" त्रिभुवन विश्वविद्यालय, नेपाल।

उद्देश्य: नेपाल में भूकंप के प्रति जागरूकता और तैयारी का अध्ययन।

निष्कर्ष: भूकंप जागरूकता बढ़ाने के लिए शिक्षा और सूचना अभियानों की आवश्यकता है, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में।

5. मार्टिनेज, एल., और गार्सिया, आर. (2020) "ग्रामीण क्षेत्रों में आपदा जागरूकता: कैरिबियन में तूफान की तैयारी का एक अध्ययन" प्यूर्टो रिको विश्वविद्यालय, प्यूर्टो रिको।

उद्देश्य: कैरेबियाई देशों में ग्रामीण क्षेत्रों में तूफान के प्रति जागरूकता और तैयारी का अध्ययन।

निष्कर्ष: ग्रामीण इलाकों में तूफान के लिए जागरूकता और तैयारी की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन शहरी इलाकों में अधिक सुधार की आवश्यकता है।

6. स्मिथ, जे., और पटेल, डी. (2020) "प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सोशल मीडिया और सार्वजनिक जागरूकता: एक तुलनात्मक अध्ययन" यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड, यूके।

उद्देश्य: प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सोशल मीडिया के प्रभाव का अध्ययन।

निष्कर्ष: सोशल मीडिया ने आपदा के दौरान सूचना के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन इसका उपयोग कहीं अधिक प्रभावी हो सकता है।

7. विलियम्स, ए., और टर्नर, एम. (2020) "प्राकृतिक आपदाओं के लिए सार्वजनिक जागरूकता और तैयारी: एक वैश्विक समीक्षा" हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, यूएसए।

उद्देश्य: वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक आपदाओं के प्रति सार्वजनिक जागरूकता और तैयारी की स्थिति का अध्ययन।

निष्कर्ष: आपदाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए शैक्षिक और सूचना अभियानों की आवश्यकता है। लेकिन, जागरूकता और तैयारी में भिन्नताएँ हैं।

8. जॉनसन, एल., और थॉमस, आर. (2020) "आपदा जोखिम में कमी और सार्वजनिक जागरूकता: संयुक्त राज्य अमेरिका से एक अध्ययन" स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी, यूएसए।

उद्देश्य: अमेरिका में आपदा जोखिम घटाने (DRR) के प्रति सार्वजनिक जागरूकता का विश्लेषण।

निष्कर्ष: DRR कार्यक्रमों के तहत शिक्षा और जागरूकता अभियानों ने अमेरिकी जनता को आपदाओं से बचाव के लिए तैयार किया।

9. सिल्वा, ए., और गोम्स, एल. (2020) "प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सार्वजनिक जागरूकता पर मीडिया का प्रभाव: मोजाम्बिक में चक्रवात ईदाई का एक केस स्टडी" यूनिवर्सिटी ऑफ मोजाम्बिक, मोजाम्बिक

उद्देश्य: मोजाम्बिक में चक्रवात इडाई के दौरान मीडिया की भूमिका और सार्वजनिक जागरूकता पर उसका प्रभाव।

निष्कर्ष: मीडिया ने आपदा के दौरान सूचना फैलाने और जनता को जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

10. ओकाफोर, एस., और मोयो, एल. (2020) "अफ्रीका में आपदा जागरूकता बढ़ाने में गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका" यूनिवर्सिटी ऑफ नैरोबी, केन्या।

उद्देश्य: अफ्रीका में आपदा जागरूकता बढ़ाने में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की भूमिका।

निष्कर्ष: NGOs द्वारा किए गए जागरूकता अभियान और प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने समुदायों को आपदाओं से बचाव के लिए तैयार किया।

11. ओल्सन, जी., और मुलर, बी. (2020) "सार्वजनिक जागरूकता और जलवायु परिवर्तन से संबंधित आपदाएँ: यूरोप में एक अध्ययन" कोपेनहेगन विश्वविद्यालय, डेनमार्क।

उद्देश्य: यूरोप में जलवायु परिवर्तन से संबंधित आपदाओं के प्रति सार्वजनिक जागरूकता।

निष्कर्ष: जलवायु परिवर्तन से संबंधित आपदाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए मीडिया और सरकारी अभियान महत्वपूर्ण हैं।

12. गार्सिया, एम., और पिनेडा, एफ. (2020) "दक्षिणी यूरोप में जंगल की आग के बारे में सार्वजनिक जागरूकता का आकलन" मैड्रिड विश्वविद्यालय, स्पेन।

उद्देश्य: दक्षिणी यूरोप में जंगल की आग के प्रति सार्वजनिक जागरूकता का मूल्यांकन।

निष्कर्ष: जंगल की आग के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए सशक्त सार्वजनिक सूचना अभियान की आवश्यकता है।

13. झांग, एल., और जॉनसन, आर. (2020) "प्राकृतिक आपदा शिक्षा और जोखिम संचार: कनाडा में एक अध्ययन" टोरंटो विश्वविद्यालय, कनाडा।

उद्देश्य: कनाडा में प्राकृतिक आपदाओं के लिए शिक्षा और जोखिम संचार के प्रभाव का अध्ययन।

निष्कर्ष: जोखिम संचार ने कनाडा में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति सार्वजनिक जागरूकता और तैयारी को बढ़ाया।

14. जॉनसन, पी., और ली, एच. (2021) "प्राकृतिक आपदा तैयारी में सरकारी नीतियों की भूमिका" कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, यूएसए।

उद्देश्य: प्राकृतिक आपदाओं के लिए सरकारी नीतियों और उनके प्रभाव का विश्लेषण।

निष्कर्ष: प्रभावी सरकारी नीतियाँ और कार्यक्रमों से प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता और तैयारियों में सुधार हुआ है।

15. अहमद, एफ., और खान, एम. (2021) "प्राकृतिक आपदा जागरूकता और दक्षिण एशिया में लचीलेपन पर इसका प्रभाव" ढाका विश्वविद्यालय, बांग्लादेश।

उद्देश्य: दक्षिण एशिया में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता और समाज की लचीलापन पर अध्ययन।

निष्कर्ष: क्षेत्रीय स्तर पर जागरूकता के कारण प्राकृतिक आपदाओं के प्रति लचीलापन में वृद्धि देखी गई।

16. यिलमाज़, एच., और डेमिर, सी. (2021) "प्राकृतिक आपदाएँ और सार्वजनिक जागरूकता: भूकंप का विश्लेषण तुर्की में तैयारी" मध्य पूर्व तकनीकी विश्वविद्यालय, तुर्की।

उद्देश्य: तुर्की में भूकंप के प्रति सार्वजनिक जागरूकता और तैयारी का अध्ययन।

निष्कर्ष: भूकंप के लिए जागरूकता बढ़ाने के लिए शिक्षा, मीडिया, और सरकारी पहल की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

17. थॉम्पसन, एम., और ब्राउन, जे. (2021) "स्कूल-आधारित आपदा शिक्षा कार्यक्रमों की प्रभावशीलता: ऑस्ट्रेलिया से एक अध्ययन" मेलबर्न विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रेलिया।

उद्देश्य: ऑस्ट्रेलिया में स्कूल आधारित आपदा शिक्षा कार्यक्रमों की प्रभावशीलता का अध्ययन।

निष्कर्ष: स्कूल आधारित कार्यक्रमों ने बच्चों और उनके परिवारों में आपदा के प्रति जागरूकता को बढ़ाया है।

18. रामिरेज़, डी., और गोमेज़, आर. (2021) "लैटिन अमेरिका में प्राकृतिक आपदाओं में सामुदायिक जागरूकता और स्वयंसेवा" ब्यूनस आयर्स विश्वविद्यालय, अर्जेंटीना।

उद्देश्य: लैटिन अमेरिका में प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सामुदायिक जागरूकता और स्वयंसेवी कार्यक्रमों का अध्ययन।

निष्कर्ष: सामुदायिक जागरूकता और स्वयंसेवी कार्यों ने आपदाओं से निपटने की प्रभावशीलता को बढ़ाया है।

19. टर्नर, पी., और जैक्सन, के. (2021) "प्राकृतिक आपदा जागरूकता और प्रौद्योगिकी की भूमिका: संयुक्त राज्य अमेरिका में बाढ़ का एक अध्ययन" शिकागो विश्वविद्यालय, यूएसए।

उद्देश्य: अमेरिका में बाढ़ों के प्रति जागरूकता और प्रौद्योगिकी का प्रभाव।

निष्कर्ष: प्रौद्योगिकी ने बाढ़ों के लिए जागरूकता में वृद्धि की है और सूचना के प्रसार में मदद की है।

यह पुनरावलोकन विभिन्न देशों में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता और तैयारियों के बारे में किए गए अध्ययनों को दर्शाता है। इन शोधों में दिखाया गया है कि जागरूकता बढ़ाने के लिए विभिन्न माध्यमों (जैसे शैक्षिक कार्यक्रम, मीडिया अभियानों, और सरकारी नीतियों) का प्रयोग किया गया है। प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में सार्वजनिक जागरूकता की महत्वपूर्ण भूमिका है, और इसके लिए वैश्विक स्तर पर कई पहल की गई हैं।

2.3.2 विदेशो मे किये गये कोरोना महामारी से सम्बन्धित साहित्य का पुनरावलोकन

यहां कोरोना महामारी से संबंधित विभिन्न देशों और विश्वविद्यालयों से संबंधित शोधकर्ताओं ने महामारी के दौरान जागरूकता, इसके प्रभाव और संबंधित उपायों का अध्ययन किया है। इन शोधों में COVID-19 के प्रभावी प्रबंधन, महामारी से निपटने के उपायों और समाज में जागरूकता बढ़ाने के तरीके पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

1. विलियम्स, एस., और थॉमस, एल. (2020) "संयुक्त राज्य अमेरिका में सार्वजनिक जागरूकता और कोविड-19 दिशानिर्देशों का अनुपालन" हार्वर्ड विश्वविद्यालय, यूएसए।

उद्देश्य: अमेरिका में COVID-19 के दौरान सार्वजनिक जागरूकता और सरकारी दिशा-निर्देशों के पालन की स्थिति का अध्ययन।

निष्कर्ष: जागरूकता अभियानों ने लोगों में दिशा-निर्देशों का पालन बढ़ाया लेकिन असमान जागरूकता के कारण कुछ क्षेत्रों में समस्या बनी रही।

2. जैक्सन, ए., और थॉम्पसन, जे. (2020) "यूके में सार्वजनिक स्वास्थ्य संचार और कोविड-19: एक सर्वेक्षण" ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय, यूके।

उद्देश्य: COVID-19 के प्रति जन जागरूकता और सार्वजनिक स्वास्थ्य संचार के प्रभाव का अध्ययन।

निष्कर्ष: स्पष्ट और नियमित सार्वजनिक स्वास्थ्य संचार ने जन जागरूकता और सुरक्षा उपायों के पालन में वृद्धि की।

3. सिल्वा, डी., और लोपेज़, एम. (2020) "ब्राजील में कोविड-19 जागरूकता के लिए सरकारी उपायों की प्रभावशीलता" साओ पाउलो विश्वविद्यालय, ब्राजील।

उद्देश्य: ब्राजील में COVID-19 के प्रति सरकारी जागरूकता अभियानों और उपायों की प्रभावशीलता का विश्लेषण।

निष्कर्ष: सरकारी अभियान और स्थानीय प्रशासन की गतिविधियों ने जन जागरूकता बढ़ाई लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में चुनौतियाँ बनी रहीं।

4. अहमद, एच., और अली, एस. (2020) "मिस्र में कोविड-19 जागरूकता और स्वास्थ्य सेवा कर्मियों की भूमिका" काहिरा विश्वविद्यालय, मिस्र।

उद्देश्य: मिस्र में स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका और COVID-19 के प्रति सार्वजनिक जागरूकता पर उनके प्रभाव का अध्ययन।

निष्कर्ष: स्वास्थ्यकर्मियों की सलाह और जागरूकता अभियानों ने समाज में कोविड-19 की गंभीरता को स्पष्ट किया।

5. रॉसी, एल., और मैनसिनी, एफ. (2020) "कोविड-19 जागरूकता और मनोवैज्ञानिक प्रभाव इटली में समाज पर" रोम विश्वविद्यालय, इटली।

उद्देश्य: इटली में COVID-19 के बारे में जागरूकता और मानसिक स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव का विश्लेषण।

निष्कर्ष: कोविड-19 के बारे में जागरूकता ने मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डाला लेकिन तनाव और चिंता बढ़ी।

6. ओकाफोर, जे., और एनडलोवु, टी. (2020)"सोशल मीडिया और कोविड-19 जागरूकता: उप-सहारा अफ्रीका में एक केस स्टडी" नैरोबी विश्वविद्यालय, केन्या।

उद्देश्य: उप-सहारा अफ्रीका में COVID-19 जागरूकता के लिए सोशल मीडिया के प्रभाव का विश्लेषण।

निष्कर्ष: सोशल मीडिया ने COVID-19 के बारे में जागरूकता बढ़ाई, लेकिन अफवाहों और गलत जानकारी का प्रसार भी बढ़ा।

7. किम, जे., और पार्क, एस. (2020) "दक्षिण कोरिया में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर कोविड-19 जागरूकता अभियानों का प्रभाव" सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी, दक्षिण कोरिया।

उद्देश्य: दक्षिण कोरिया में COVID-19 के प्रति जागरूकता अभियानों का स्वास्थ्य पर प्रभाव।

निष्कर्ष: दक्षिण कोरिया में सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों ने संक्रमण दर को नियंत्रित किया और सोशल डिस्टेंसिंग की आदत को बढ़ावा दिया।

8. थॉम्पसन, डी., और ब्राउन, टी. (2020) "ऑस्ट्रेलिया में कोविड-19 प्रसार को कम करने में सार्वजनिक जागरूकता की भूमिका" मेलबर्न विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रेलिया।

उद्देश्य: ऑस्ट्रेलिया में COVID-19 के प्रसार को रोकने में जागरूकता अभियानों की भूमिका।

निष्कर्ष: जागरूकता अभियानों ने COVID-19 के प्रसार को कम किया और सामाजिक दूरी का पालन सुनिश्चित किया।

9. श्मिट, आर., और मुलर, एफ. (2020) "जर्मनी में सरकारी उपाय और कोविड-19 जागरूकता" बर्लिन विश्वविद्यालय, जर्मनी।

उद्देश्य: जर्मनी में COVID-19 जागरूकता अभियानों और सरकारी नीतियों का प्रभाव।

निष्कर्ष: सरकारी उपायों और जन जागरूकता अभियानों ने नागरिकों के स्वास्थ्य व्यवहार को प्रभावी रूप से प्रभावित किया।

10. बोथा, पी., और मोयो, टी. (2020) "दक्षिण अफ्रीका में कोविड-19 जागरूकता और व्यवहार परिवर्तन" केप टाउन विश्वविद्यालय, दक्षिण अफ्रीका।

उद्देश्य: दक्षिण अफ्रीका में COVID-19 के प्रति सार्वजनिक जागरूकता और व्यवहारिक परिवर्तन।

निष्कर्ष: जागरूकता अभियानों के माध्यम से व्यवहार में सकारात्मक बदलाव आया लेकिन कुछ समूहों में चुनौती बनी रही।

11. ली, सी., और झांग, क्यू. (2020) "कनाडा में कोविड-19 जागरूकता में शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका" टोरंटो विश्वविद्यालय, कनाडा।

उद्देश्य: कनाडा में शैक्षिक संस्थानों की भूमिका और COVID-19 जागरूकता अभियानों के प्रभाव का अध्ययन।

निष्कर्ष: शैक्षिक संस्थानों ने छात्रों और समुदाय में जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

12. रोड्रिग्ज, एफ., और गार्सिया, एच. (2020) "लैटिन अमेरिका में कोविड-19 जागरूकता: एक तुलनात्मक अध्ययन" ब्यूनस आयर्स विश्वविद्यालय, अर्जेंटीना।

उद्देश्य: लैटिन अमेरिका के विभिन्न देशों में COVID-19 के प्रति जागरूकता की तुलना।

निष्कर्ष: जागरूकता अभियानों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग और स्थानीय संदर्भ की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

13. मुलर, पी., और जोहानसन, के. (2020) "यूरोप में कोविड-19 जागरूकता और व्यवहार स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव" कोपेनहेगन विश्वविद्यालय, डेनमार्क।

उद्देश्य: यूरोप में COVID-19 जागरूकता और मानसिक स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव का विश्लेषण।

निष्कर्ष: मानसिक स्वास्थ्य पर महामारी के असर को कम करने के लिए जागरूकता अभियानों की जरूरत पड़ी।

14. अल-मसरी, एफ., और हामेद, एच. (2020) "मध्य पूर्व में कोविड-19 जागरूकता और जोखिम धारणा" जॉर्डन विश्वविद्यालय, जॉर्डन।

उद्देश्य: मध्य पूर्व में COVID-19 के प्रति जोखिम की धारणा और जागरूकता।

निष्कर्ष: जागरूकता अभियानों ने जोखिम की धारणा को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया लेकिन कुछ देशों में जानकारी की कमी थी।

15. टैन, जे., और गुयेन, पी. (2020) "दक्षिण-पूर्व एशिया में कोविड-19 जागरूकता अभियानों का प्रभाव" नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर, सिंगापुर।

उद्देश्य: दक्षिण-पूर्व एशिया में COVID-19 के प्रति जागरूकता अभियानों का प्रभाव।

निष्कर्ष: क्षेत्रीय अभियान और सरकारी नीतियों ने लोगों के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाया।

16. सुजुकी, के., और यामामोटो, टी. (2021) "जापान में सार्वजनिक व्यवहार पर कोविड-19 जागरूकता अभियानों का प्रभाव" टोक्यो विश्वविद्यालय, जापान।

उद्देश्य: जापान में COVID-19 जागरूकता अभियानों का जनता के व्यवहार पर प्रभाव।

निष्कर्ष: प्रभावी जागरूकता अभियानों ने जनता को सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क पहनने के प्रति प्रेरित किया।

17. जॉनसन, आर., और बेल, एम. (2021) "कनाडा में कोविड-19 के बारे में जनता की जागरूकता का आकलन" टोरंटो विश्वविद्यालय, कनाडा।

उद्देश्य: कनाडा में COVID-19 के प्रति जन जागरूकता का मूल्यांकन।

निष्कर्ष: नागरिकों में कोविड-19 के प्रति जागरूकता थी लेकिन कुछ क्षेत्रों में व्यक्तिगत सुरक्षा उपायों का पालन कम था।

18. क्लार्क, एल., और विल्सन, एच. (2021) "संयुक्त राज्य अमेरिका में कोविड-19 टीकों के प्रति सार्वजनिक जागरूकता और दृष्टिकोण" कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, यूएसए।

उद्देश्य: COVID-19 वैक्सीनेशन के प्रति अमेरिकी जनता के दृष्टिकोण और जागरूकता का अध्ययन।

निष्कर्ष: जागरूकता अभियानों ने वैक्सीनेशन को बढ़ावा दिया हालांकि कुछ लोगों में वैक्सीनेशन के प्रति संकोच था।

यह पुनरावलोकन दर्शाता है कि दुनिया भर के विभिन्न देशों में COVID-19 के प्रति जागरूकता अभियानों की प्रभावशीलता, प्रभाव और उपायों की आवश्यकता थी। शोधो में यह दिखाया गया है कि सोशल मीडिया, शैक्षिक संस्थान, सरकार और स्वास्थ्यकर्मी जन जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं लेकिन साथ ही यह भी पता चलता है कि गलत जानकारी और जागरूकता की असमानता जैसे मुद्दे भी सामने आए।

2.3.3 विदेशो मे किये गये पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता से सम्बन्धित साहित्य का पुनरावलोकन

1. विलियम्स, एल., और ग्रीन, ई. (2019) "स्थिरता जागरूकता को बढ़ावा देने में पर्यावरण शिक्षा की भूमिका" यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड, यूके।

उद्देश्य: पर्यावरणीय शिक्षा के प्रभाव का अध्ययन, विशेष रूप से विद्यार्थियों में स्थिरता के प्रति जागरूकता।

निष्कर्ष: शिक्षा कार्यक्रमों से विद्यार्थियों में पर्यावरणीय मुद्दों और स्थिरता के प्रति जागरूकता में वृद्धि हुई।

2. कार्टर, एम., और गुयेन, जे. (2019) "संयुक्त राज्य अमेरिका में पर्यावरण जागरूकता और रीसाइक्लिंग अभ्यास" यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, यूएसए।

उद्देश्य: अमेरिका में पर्यावरणीय जागरूकता और पुनर्चक्रण प्रथाओं का विश्लेषण।

निष्कर्ष: पर्यावरणीय जागरूकता में वृद्धि से पुनर्चक्रण प्रथाओं में सुधार हुआ है लेकिन अभी भी चुनौतियाँ मौजूद हैं।

3. जॉनसन, आर., और पटेल, ए. (2019) "कनाडा में कॉर्पोरेट पर्यावरण जिम्मेदारी और सार्वजनिक जागरूकता" यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो, कनाडा।

उद्देश्य: कनाडा में कंपनियों द्वारा की गई पर्यावरणीय जिम्मेदारी और इसके सार्वजनिक जागरूकता पर प्रभाव।

निष्कर्ष: कंपनियों द्वारा पर्यावरणीय पहल ने जन जागरूकता को बढ़ाया है विशेषकर कार्बन फुटप्रिंट और पुनर्चक्रण के संबंध में।

4. स्मिथ, जे., और क्लार्क, एम. (2020) "पर्यावरण के मुद्दों के बारे में सार्वजनिक जागरूकता: एक क्रॉस-कंट्री अध्ययन" हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, यूएसए।

उद्देश्य: विभिन्न देशों में पर्यावरणीय मुद्दों पर सार्वजनिक जागरूकता का अध्ययन।

निष्कर्ष: देशों के बीच जागरूकता स्तर में भिन्नताएँ हैं और मीडिया और शिक्षा ने इस जागरूकता को प्रभावित किया।

5. मुलर, टी., और फिशर, एच. (2020) "पर्यावरण जागरूकता और हरित उपभोक्ता व्यवहार: एक यूरोपीय परिप्रेक्ष्य" यूनिवर्सिटी ऑफ बर्लिन, जर्मनी।

उद्देश्य: यूरोप में पर्यावरणीय जागरूकता और हरे उपभोक्तावाद का अध्ययन।

निष्कर्ष: उपभोक्ताओं की बढ़ती पर्यावरणीय जागरूकता ने हरे उत्पादों और सेवाओं के चयन में वृद्धि की है।

6. एंडरसन, के., और थॉमस, एल. (2020) "पर्यावरण जागरूकता के लिए सामुदायिक जुड़ाव शहरी क्षेत्रों में" मेलबर्न विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रेलिया।

उद्देश्य: शहरी क्षेत्रों में सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से पर्यावरणीय जागरूकता बढ़ाने की रणनीतियों का अध्ययन।

निष्कर्ष: सामुदायिक कार्यक्रमों ने शहरी क्षेत्रों में पर्यावरणीय जागरूकता और सक्रियता को बढ़ावा दिया।

7. यामाडा, के., और सुजुकी, एच. (2020) "जापान में सार्वजनिक जागरूकता पर पर्यावरण अभियानों का प्रभाव" क्योटो विश्वविद्यालय, जापान।

उद्देश्य: जापान में पर्यावरणीय अभियानों के प्रभाव का विश्लेषण।

निष्कर्ष: प्रभावी अभियानों ने सार्वजनिक जागरूकता में सुधार किया है विशेषकर प्लास्टिक प्रदूषण के प्रति।

8. पेडरसन, ए., और नीलसन, बी. (2020) "युवा और पर्यावरण जागरूकता: स्कैंडिनेवियाई देशों में एक अध्ययन" ओस्लो विश्वविद्यालय, नॉर्वे।

उद्देश्य: स्कैंडिनेवियाई देशों में युवा पीढ़ी के बीच पर्यावरणीय जागरूकता का अध्ययन।

निष्कर्ष: युवाओं में पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति जागरूकता बहुत अधिक है और उन्होंने कई सतत परियोजनाओं में भाग लिया है।

9. अल-खालिद, एफ., और नासर, एस. (2020) "मध्य पूर्व में पर्यावरण जागरूकता और जल संरक्षण" अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ बेरूत, लेबनान।

उद्देश्य: मध्य पूर्व में जल संरक्षण पर पर्यावरणीय जागरूकता का प्रभाव।

निष्कर्ष: जल संकट के प्रति जागरूकता में वृद्धि से जल संरक्षण प्रथाओं में सुधार हुआ है।

10. गोंजालेज, एम., और रिवेरा, एफ. (2020) "लैटिन अमेरिका में पर्यावरण जागरूकता और सतत विकास" ब्यूनस आयर्स विश्वविद्यालय, अर्जेंटीना।

उद्देश्य: लैटिन अमेरिका में सतत विकास और पर्यावरणीय जागरूकता की स्थिति।

निष्कर्ष: सतत विकास के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है।

11. ली, जे., और झांग, वाई. (2020) "चीन में सार्वजनिक जागरूकता पर पर्यावरण नीतियों का प्रभाव" पेकिंग विश्वविद्यालय, चीन।

उद्देश्य: चीन में सरकारी पर्यावरणीय नीतियों का जन जागरूकता पर प्रभाव।

निष्कर्ष: सरकारी नीतियाँ और अभियानों ने जन जागरूकता को बढ़ावा दिया है, लेकिन इसका प्रभाव दीर्घकालिक नहीं है।

12. सोसा, वी., और लोपेज़, ए. (2020) "विकासशील देशों में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पर्यावरण जागरूकता का प्रभाव" साओ पाउलो विश्वविद्यालय, ब्राजील।

उद्देश्य: विकासशील देशों में पर्यावरणीय जागरूकता का सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभाव।

निष्कर्ष: पर्यावरणीय जागरूकता बढ़ाने से सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार हुआ है विशेषकर जल और वायु प्रदूषण के क्षेत्र में।

13. टेलर, आर., और डेविस, पी. (2021) "युवाओं में पर्यावरण जागरूकता पर सोशल मीडिया का प्रभाव" स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय, यूएसए।

उद्देश्य: सोशल मीडिया अभियानों का युवा पीढ़ी पर पर्यावरणीय जागरूकता पर प्रभाव।

निष्कर्ष: सोशल मीडिया ने युवाओं में पर्यावरणीय मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाई है लेकिन इसकी स्थायिता और प्रभावशीलता अभी भी संदिग्ध है।

14. ली, एस., और किम, जे. (2021) "कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व और पर्यावरण जागरूकता: बहुराष्ट्रीय निगमों का एक केस स्टडी" सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी, दक्षिण कोरिया।

उद्देश्य: बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किए गए पर्यावरणीय जिम्मेदारी और जागरूकता कार्यों का अध्ययन।

निष्कर्ष: कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (CSR) के तहत पर्यावरणीय जागरूकता में बढ़ोतरी देखी गई।

15. जेन्सेन, सी., और होल्म, टी. (2021) "यूरोपीय संघ में पर्यावरण जागरूकता पर सरकारी नीतियों का प्रभाव" कोपेनहेगन विश्वविद्यालय, डेनमार्क।

उद्देश्य: यूरोपीय संघ में सरकार की नीतियों का पर्यावरणीय जागरूकता पर प्रभाव।

निष्कर्ष: नीतियों के माध्यम से पर्यावरणीय जागरूकता बढ़ी है लेकिन इसके कार्यान्वयन में सुधार की आवश्यकता है।

16. फर्नांडीज, एल., और ओर्टेगा, एम. (2021) "पर्यावरण जागरूकता को बढ़ावा देने में स्कूलों की भूमिका: एक वैश्विक समीक्षा" बार्सिलोना विश्वविद्यालय, स्पेन।

उद्देश्य: विभिन्न देशों में स्कूलों द्वारा पर्यावरणीय जागरूकता को बढ़ावा देने के उपायों का अध्ययन।

निष्कर्ष: स्कूलों ने पर्यावरणीय शिक्षा के माध्यम से बच्चों में जागरूकता को प्रभावी रूप से बढ़ाया है।

17. ओकाफोर, ई., और ओकेचुकु, ओ. (2021) "पर्यावरण जागरूकता और जलवायु परिवर्तन अफ्रीका में" केप टाउन विश्वविद्यालय, दक्षिण अफ्रीका।

उद्देश्य: अफ्रीका में जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूकता बढ़ाने की चुनौतियों का विश्लेषण।

निष्कर्ष: जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए शिक्षा और सूचना प्रसार की आवश्यकता है।

18. जैक्सन, आर., और मूर, टी. (2021) "पर्यावरण जागरूकता में गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) की भूमिका" लंदन विश्वविद्यालय, यूके।

उद्देश्य: पर्यावरणीय जागरूकता बढ़ाने में एनजीओ की भूमिका का विश्लेषण।

निष्कर्ष: एनजीओ द्वारा किए गए अभियान और कार्यों ने बड़े पैमाने पर जागरूकता में वृद्धि की है।

19. बेक, सी., और मर्टेंस, एल. (2021) "पर्यावरण जागरूकता और यूरोपीय संघ में परिपत्र अर्थव्यवस्था" एम्स्टर्डम विश्वविद्यालय, नीदरलैंड।

उद्देश्य: यूरोपीय संघ में सर्कुलर अर्थव्यवस्था और पर्यावरणीय जागरूकता का अध्ययन।

निष्कर्ष: सर्कुलर अर्थव्यवस्था ने यूरोपीय देशों में पुनर्चक्रण और संसाधन संरक्षण को बढ़ावा दिया।

विदेशों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए कई अध्ययनों ने विभिन्न दृष्टिकोणों से कार्य किया है जैसे- शिक्षा, सरकारी नीतियाँ, सामाजिक अभियान और कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (CSR)। ये शोध यह दर्शाते हैं कि जागरूकता को बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार के उपायों की आवश्यकता है और इसके लिए हर क्षेत्र में संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता है।

2.4 प्रस्तुत अनुसन्धान का औचित्य

प्राकृतिक आपदाएँ, महामारियाँ और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषय समाज, प्रदेश और राष्ट्र के स्तर पर अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। इन समस्याओं का प्रबंधन और प्रभावी जागरूकता सामाजिक, प्रादेशिक और वैश्विक दृष्टिकोण से बेहद आवश्यक है। किसी भी समस्या का आकार प्रारंभ में छोटा होता है लेकिन समय के साथ वह अव्यवस्था का रूप ले सकती है और अत्यधिक विकराल हो सकती है। शोधकर्ता ने इस मुद्दे को समझते हुए इसे एक व्यवस्थित ढांचे में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया।

प्राकृतिक आपदाओं और महामारियों का प्रभाव वैश्विक स्तर पर स्पष्ट रूप से देखा गया है जैसे- कोरोना महामारी, पर्यावरण संकट और अन्य आपदाएँ, जिनके प्रबंधन और बचाव के उपायों में जागरूकता और शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

शोधकर्ता ने जब प्राकृतिक आपदाओं और कोरोना महामारी के प्रभाव को समाचार पत्रों, टेलीविज़न और अन्य मीडिया के माध्यम से देखा तो यह विचार उत्पन्न हुआ कि-

1. शिक्षकों, विद्यार्थियों और समाज के व्यक्तियों का क्या दायित्व है जब हम आपदाओं और महामारी के प्रबंधन के प्रति जागरूकता की बात करते हैं?

2. आपदाओं और महामारी से पीड़ितों की सहायता में हमारी क्या भूमिका होनी चाहिए? क्या हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है और हम किस प्रकार से पीड़ितों की मदद कर सकते हैं?

3. आपदाओं और महामारी के प्रबंधन में सरकार की क्या भूमिका होनी चाहिए? क्या सरकारी नीतियाँ और उपाय पर्याप्त हैं या उनमें सुधार की आवश्यकता है?

4. एक नागरिक का क्या दायित्व और कर्तव्य होना चाहिए जब प्राकृतिक आपदाएँ और महामारी जैसी स्थिति उत्पन्न होती है?

5. शिक्षा और विद्यार्थियों की भूमिका: क्या हमारी शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों में आपदाओं और महामारी के प्रबंधन के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने में प्रभावी रही है?

इन सवालों का समाधान प्राप्त करने के लिए शोधकर्ता ने "भूगोल विषय के उच्च माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन" विषय को चुना है जो न केवल इस समस्या का निदान करेगा बल्कि शिक्षा प्रणाली और सामाजिक जागरूकता में सुधार के लिए भी दिशा प्रदान करेगा।

2.4.1 विद्यार्थियों के दृष्टिकोण से

आज की दुनिया में प्राकृतिक आपदाएँ, महामारियाँ और पर्यावरण संकट ऐसी समस्याएँ बन चुकी हैं जिनका सामना हम सभी को करना पड़ रहा है। इन समस्याओं का सामना करने के लिए एक जिम्मेदार और जागरूक नागरिक का होना अत्यंत आवश्यक है। विद्यार्थियों में इन मुद्दों के प्रति जागरूकता विकसित करना न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करता है बल्कि यह समग्र समाज की भलाई में भी योगदान करता है। विद्यार्थियों के दृष्टिकोण में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता से संबंधित शिक्षा उन्हें बेहतर नागरिक बनाने में मदद कर सकती है।

1. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता

प्राकृतिक आपदाएँ जैसे- बाढ़, भूकंप, सूखा, तूफान और ज्वालामुखी विस्फोट मानवता के लिए हमेशा से एक गंभीर चुनौती रही हैं। इन आपदाओं के परिणामस्वरूप न केवल जीवन और संपत्ति का नुकसान होता है बल्कि इनका पर्यावरण पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। विद्यार्थियों में इन आपदाओं के कारणों, प्रभावों और उनसे निपटने के उपायों के प्रति जागरूकता पैदा करना अत्यंत आवश्यक है।

जब विद्यार्थियों को प्राकृतिक आपदाओं के बारे में जानकारी दी जाती है तो वे न केवल इन आपदाओं के कारणों और प्रभावों को समझ पाते हैं, बल्कि वे आपदा प्रबंधन और बचाव कार्यों के बारे में भी जागरूक होते हैं। उदाहरण के लिए- भूकंप या बाढ़ जैसी आपदाओं के समय क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए? किस प्रकार की तैयारियों की आवश्यकता होती है और आपदा के समय कौन से तात्कालिक कदम उठाने चाहिए? इस पर चर्चा की जाती है। इस प्रकार की शिक्षा विद्यार्थियों में समाज के प्रति जिम्मेदारी और नागरिक कर्तव्यों का बोध उत्पन्न करती है जिससे वे संकट के समय बेहतर तरीके से प्रतिक्रिया कर सकते हैं।

2. कोरोना महामारी और स्वास्थ्य सुरक्षा की जागरूकता

कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को चौंका दिया और यह सिद्ध कर दिया कि किसी भी महामारी का वैश्विक स्तर पर कितने बड़े पैमाने पर प्रभाव हो सकता है। इस महामारी के दौरान हम सभी ने देखा कि किस प्रकार स्वच्छता, मास्क पहनने, हाथ धोने और सामाजिक दूरी बनाए रखने जैसी आदतें हमारे जीवन की रक्षा के लिए जरूरी हैं। यह जरूरी है कि विद्यार्थियों को इस प्रकार की जागरूकता प्रदान की जाए ताकि वे महामारी जैसे संकटों से निपटने के लिए तैयार हो सकें।

कोरोना महामारी के दौरान सरकार द्वारा दिए गए निर्देशों और स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों के महत्व को विद्यार्थियों ने अनुभव किया। यदि उन्हें बचपन से ही इन उपायों के बारे में बताया जाए तो वे न केवल अपनी रक्षा कर सकते हैं बल्कि अपने परिवार, समुदाय और समाज की सुरक्षा में भी योगदान कर सकते हैं। स्कूलों में इस प्रकार की शिक्षा देने से विद्यार्थियों में सामूहिक जिम्मेदारी और सहकार्य की भावना विकसित होती है जिससे समाज में एक सकारात्मक बदलाव आता है।

3. पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता और भूमिका

पर्यावरण संकट आज हमारे समक्ष सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, वनस्पति और जीवों की विलुप्ति, जल संकट और अन्य पर्यावरणीय संकटों ने पूरी पृथ्वी को खतरे में डाल दिया है। इन समस्याओं से निपटने के लिए हमें पर्यावरणीय शिक्षा की आवश्यकता है ताकि हम पर्यावरण को बचाने के उपायों के प्रति जागरूक हो सकें।

विद्यार्थियों में पर्यावरण संरक्षण की जागरूकता बढ़ाना बेहद आवश्यक है क्योंकि वे भविष्य के नेता हैं और उनका प्रभाव समाज पर गहरा पड़ता है। यदि विद्यार्थी आज से ही प्रदूषण कम करने, वृक्षारोपण करने, जल और ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग करने और अन्य पर्यावरणीय उपायों के बारे में सीखते हैं तो वे न केवल अपने जीवन में इन आदतों को अपनाएंगे बल्कि वे अपने परिवार और समुदाय को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे। यह शिक्षा उन्हें यह समझने में मदद करती है कि पृथ्वी और पर्यावरण हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं और इनका संरक्षण हम सभी की जिम्मेदारी है।


4. शिक्षा प्रणाली और विद्यार्थियों का उत्तरदायित्व

शिक्षा प्रणाली की भूमिका इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है। यदि विद्यालयों और कॉलेजों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण के बारे में शिक्षा दी जाए तो विद्यार्थियों में इन समस्याओं को लेकर समझदारी और संवेदनशीलता का विकास हो सकता है। विद्यालयों में कार्यशालाओं, सेमिनारों और पाठ्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों को इन मुद्दों के बारे में जानकारी दी जा सकती है।

जब विद्यार्थियों को इन मुद्दों पर जागरूक किया जाता है तो वे केवल शैक्षिक दृष्टिकोण से ही नहीं बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में भी अपने कर्तव्यों को समझते हैं। वे इस बात को समझते हैं कि उनका कार्य केवल अपनी शिक्षा तक सीमित नहीं है बल्कि समाज की भलाई के लिए योगदान देना भी उनकी जिम्मेदारी है।

5. समाज और राष्ट्र के लिए योगदान

विद्यार्थियों में जागरूकता का विकास न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन के लिए लाभकारी है बल्कि इससे समाज और राष्ट्र की दिशा में भी सकारात्मक बदलाव आता है। यदि विद्यार्थियों को इन मुद्दों के बारे में सही जानकारी दी जाती है तो वे न केवल अपनी जान की सुरक्षा कर सकते हैं बल्कि वे दूसरों की मदद करने के लिए भी प्रेरित होते हैं। 

इस प्रकार, विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का विकास न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करता है बल्कि यह समाज और राष्ट्र की भलाई में भी योगदान करता है। एक जिम्मेदार और जागरूक नागरिक का निर्माण करने के लिए हमें इस दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। यह जागरूकता उन्हें न केवल आज की समस्याओं से निपटने के लिए तैयार करेगी बल्कि भविष्य में आने वाले संकटों का सामना करने में भी सक्षम बनाएगी।

2.4.2 अध्यापकों के दृष्टिकोण से

प्राकृतिक आपदाएँ, महामारियाँ और पर्यावरण संकट न केवल भारत बल्कि समग्र विश्व के लिए महत्वपूर्ण समस्याएँ बन चुकी हैं। इन संकटों का सामना करने के लिए विद्यार्थियों में जागरूकता और जिम्मेदारी का होना अत्यंत आवश्यक है। विद्यार्थियों को शैक्षिक संस्थानों में इन मुद्दों के प्रति संवेदनशील और जागरूक बनाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य हो सकता है लेकिन अध्यापकों का इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान होता है। इस शोध में अध्यापकों के दृष्टिकोण से विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता कैसे उत्पन्न की जा सकती है? और इसके लिए अध्यापक किस प्रकार की भूमिका निभाते हैं?

1. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता

प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भूकंप, बाढ़, सूखा, तूफान और ज्वालामुखी विस्फोट पृथ्वी पर जीवन के लिए लगातार खतरा उत्पन्न करती रही हैं। इन आपदाओं से बचाव और प्रबंधन की क्षमता को बढ़ाने के लिए विद्यार्थियों को समय रहते जागरूक करना बहुत जरूरी है। अध्यापकों की भूमिका यहाँ बहुत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि वे बच्चों को प्राकृतिक आपदाओं के कारणों, प्रभावों और उनसे निपटने के उपायों के बारे में शिक्षित कर सकते हैं।

अध्यापक प्राकृतिक आपदाओं पर पाठ्यक्रम में दिए गए पाठो के माध्यम से विद्यार्थियों को यह समझा सकते हैं कि इन आपदाओं के समय क्या कदम उठाए जाते हैं और क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए? उन्हें यह भी सिखाया जा सकता है कि एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में वे संकट के समय क्या भूमिका निभा सकते हैं? 



2. कोरोना महामारी के समय की शिक्षा

कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया में संकट पैदा किया और हमें यह सिखाया कि वैश्विक स्तर पर किसी महामारी का प्रभाव कितनी जल्दी फैल सकता है। अध्यापकों का यह दायित्व बनता है कि वे विद्यार्थियों को इस महामारी से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी दें जैसे- संक्रमण के लक्षण, रोकथाम के उपाय और स्वास्थ्य सुरक्षा नियमों का पालन कैसे किया जाए। मास्क पहनने, हाथ धोने और सामाजिक दूरी बनाए रखने जैसी आदतें महामारी के दौरान बचाव के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुईं और इन आदतों के बारे में विद्यार्थियों को समझाना आवश्यक था।

अध्यापक विद्यार्थियों में जागरूकता पैदा करने के लिए विभिन्न शैक्षिक गतिविधियाँ आयोजित कर सकते हैं जैसे- वीडियो प्रदर्शनी, केस स्टडी और महामारी पर आधारित परियोजनाओं के माध्यम से। उन्हें महामारी के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव और आत्म-देखभाल की आवश्यकता के बारे में भी शिक्षित किया जा सकता है। महामारी से संबंधित शिक्षा विद्यार्थियों को केवल शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी तैयार करती है।

3. पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता

पर्यावरणीय संकट और जलवायु परिवर्तन विश्व के लिए सबसे गंभीर खतरे बन गए हैं। प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग इन समस्याओं को और बढ़ा रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर विद्यार्थियों में जागरूकता उत्पन्न करना और उन्हें पर्यावरणीय जिम्मेदारी का अहसास दिलाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अध्यापक विद्यार्थियों को यह समझाने में सक्षम होते हैं कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र किस प्रकार पृथ्वी के जीवन को बनाए रखते हैं? और इनका असंतुलन कैसे गंभीर परिणामों को जन्म दे सकता है? विद्यार्थियों को प्लास्टिक के उपयोग को कम करने, वृक्षारोपण करने, जल और ऊर्जा के विवेकपूर्ण उपयोग के महत्व के बारे में जागरूक कर सकते हैं। विद्यालयों में स्वच्छता अभियानों, जल संरक्षण परियोजनाओं और पर्यावरणीय कार्यशालाओं का आयोजन करके विद्यार्थी स्वयं भी इन मुद्दों पर सक्रिय रूप से काम कर सकते हैं।

4. शिक्षकों की भूमिका और रणनीतियाँ

अध्यापकों के लिए इन मुद्दों पर विद्यार्थियों को जागरूक करने की भूमिका केवल शैक्षिक नहीं बल्कि सामाजिक और नैतिक भी है। अध्यापक विद्यार्थियों में आलोचनात्मक सोच और समझ विकसित करने के लिए विभिन्न विधियों का उपयोग कर सकते हैं। इसके लिए वे केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहते बल्कि अतिरिक्त शैक्षिक गतिविधियों, समूह चर्चाओं और प्रोजेक्ट कार्यों के माध्यम से विद्यार्थियों को इन समस्याओं से अवगत कराते हैं।

अध्यापक एक प्रेरक के रूप में विद्यार्थियों को समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारियों का अहसास कराते हैं और यह बताते हैं कि वे अपने व्यवहार और निर्णयों के माध्यम से इन संकटों का सामना करने में मदद कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, अध्यापक विद्यार्थियों को यह सिखाते हैं कि इन समस्याओं का समाधान सामूहिक प्रयासों से ही संभव है और केवल व्यक्तिगत रूप से ही नहीं बल्कि सामूहिक रूप से भी जिम्मेदार नागरिक बनना जरूरी है।

5. शिक्षकों का उदाहरण और प्रेरणा

अध्यापकों का उदाहरण विद्यार्थियों के लिए बहुत प्रभावशाली होता है। यदि शिक्षक स्वयं इन मुद्दों पर जागरूक होते हैं और इनका पालन करते हैं। वे विद्यार्थियों के लिए एक आदर्श बन जाते हैं। उदाहरण स्वरूप, यदि शिक्षक पर्यावरण की रक्षा के लिए कम कागज का उपयोग करते हैं, प्लास्टिक का उपयोग कम करते हैं, या महामारी के दौरान स्वच्छता के नियमों का पालन करते हैं, तो यह विद्यार्थियों पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। शिक्षक जब इन मुद्दों पर खुद प्रतिबद्ध होते हैं तो विद्यार्थियों में स्वाभाविक रूप से इनका पालन करने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है।

अध्यापक विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने में एक केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। वे केवल शिक्षा के साधन नहीं होते बल्कि वे समाज के निर्माण में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता के रूप में कार्य करते हैं। उनकी भूमिका से विद्यार्थी न केवल इन संकटों के प्रति संवेदनशील होते हैं बल्कि वे समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रेरित भी होते हैं। शिक्षक-विद्यार्थी सहयोग से हम एक बेहतर और जागरूक समाज की नींव रख सकते हैं जो इन वैश्विक समस्याओं का सामना करने के लिए तैयार हो।

2.4.3. विद्यालयों के दृष्टिकोण से

प्राकृतिक आपदाएँ, कोरोना महामारी और पर्यावरणीय संकट हमारे समाज और जीवन के महत्वपूर्ण मुद्दे बन चुके हैं। इन समस्याओं का प्रभाव न केवल व्यक्तिगत जीवन पर पड़ता है बल्कि यह पूरे समाज और पृथ्वी के अस्तित्व को भी प्रभावित करता है। इन वैश्विक समस्याओं से निपटने के लिए विद्यार्थियों में जागरूकता और जिम्मेदारी का होना अत्यंत आवश्यक है। विद्यालयों का इन मुद्दों पर शिक्षा देने और विद्यार्थियों को जागरूक करने में अहम योगदान है। विद्यालयों के दृष्टिकोण से विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

1. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता

प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भूकंप, बाढ़, सूखा, तूफान और ज्वालामुखी विस्फोट, पृथ्वी पर जीवन के लिए खतरे के रूप में हमेशा मौजूद रही हैं। इन आपदाओं का प्रभाव केवल प्राकृतिक संसाधनों पर ही नहीं बल्कि मानव जीवन पर भी गहरा होता है। विद्यालयों का यह दायित्व बनता है कि वे विद्यार्थियों को इन आपदाओं के बारे में सही जानकारी और उनके प्रबंधन के उपायों के बारे में शिक्षित करें।

विद्यालयों में प्राकृतिक आपदाओं पर आधारित पाठ्यक्रम और गतिविधियाँ विद्यार्थियों को यह समझाने में मदद कर सकती हैं कि इन आपदाओं के कारण क्या घटनाएँ होती हैं? इनके प्रभाव क्या होते हैं और इन्हें कैसे कम किया जा सकता है? उदाहरण के लिए, भूकंप या बाढ़ के समय क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए, इनसे बचाव के लिए क्या तैयारी की जानी चाहिए? और आपदा के समय किस प्रकार से तात्कालिक कदम उठाए जाएं? इस पर विद्यालयों में शिक्षा दी जा सकती है। विद्यार्थियों में यह जागरूकता भी पैदा की जा सकती है कि वे संकट के समय कैसे अन्य लोगों की मदद कर सकते हैं? और सामूहिक प्रयास से इन आपदाओं का सामना कैसे किया जा सकता है?

2. कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता

कोरोना महामारी (COVID-19) ने सम्पूर्ण विश्व को एक गंभीर संकट से रूबरू कराया। इस महामारी ने न केवल लाखों लोगों की जान ली बल्कि यह समाज और अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गई। इस महामारी ने हमें यह सिखाया कि स्वच्छता, सामाजिक दूरी, मास्क पहनना और अन्य सुरक्षा उपायों का पालन करना कितना महत्वपूर्ण है?

विद्यालयों में कोरोना महामारी के दौरान, विद्यार्थियों को इस संक्रमण से बचने के उपायों के बारे में सिखाना अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया था। मास्क पहनने, हाथ धोने, और सुरक्षित दूरी बनाए रखने जैसी आदतों को विद्यार्थियों में एक व्यवहार के रूप में विकसित करना आवश्यक है। विद्यालयों में इस प्रकार के स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन कर विद्यार्थियों को उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा के बारे में जानकारी दी जा सकती है। महामारी के मानसिक स्वास्थ्य पर होने वाले प्रभावों और तनाव कम करने के उपायों पर भी विद्यार्थियों को जागरूक किया जा सकता है।

3. पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता

पर्यावरण संकट और प्रदूषण एक गंभीर वैश्विक चुनौती बन गई है। जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, जल और वायु प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग पृथ्वी के अस्तित्व के लिए खतरा बन गए हैं। विद्यालयों में विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण और इसके महत्व के बारे में जागरूक करना आवश्यक है।

विद्यालयों में पर्यावरणीय शिक्षा देने से विद्यार्थियों को यह समझने में मदद मिलती है कि पर्यावरण हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है और इसे बचाना हमारी जिम्मेदारी है। विद्यार्थियों को जलवायु परिवर्तन के कारण, प्रदूषण और संसाधन के अत्यधिक उपयोग के प्रभावों के बारे में जानकारी देना आवश्यक है। इसके साथ ही, विद्यालयों में स्वच्छता अभियान, वृक्षारोपण अभियान और जल संरक्षण जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं ताकि विद्यार्थियों में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भाव उत्पन्न हो।

विद्यालयों में पर्यावरणीय शिक्षा देने से विद्यार्थियों में न केवल जागरूकता बढ़ती है बल्कि वे अपने व्यवहार में भी सकारात्मक बदलाव लाते हैं। वे अपने परिवार और समुदाय में भी पर्यावरणीय जिम्मेदारी के प्रति जागरूकता फैला सकते हैं और अपनी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित हो सकते हैं।

4. शिक्षा प्रणाली की भूमिका

विद्यालयों का उद्देश्य केवल शैक्षिक ज्ञान देना नहीं होता बल्कि विद्यार्थियों को सामाजिक, नैतिक और नागरिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक करना भी होता है। विद्यालयों में इन मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने के लिए विभिन्न शैक्षिक गतिविधियाँ आयोजित की जा सकती हैं, जैसे- कार्यशालाएँ, सेमिनार, परियोजनाएँ और समूह चर्चाएँ। इस प्रकार की गतिविधियाँ विद्यार्थियों को इन समस्याओं के प्रति सोचने और उनके समाधान में योगदान देने के लिए प्रेरित करती हैं।

विद्यालयों में इन मुद्दों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने से विद्यार्थियों की सोच में बदलाव आ सकता है और वे इन समस्याओं को गंभीरता से ले सकते हैं। इसके अलावा, विद्यालयों में उन कार्यों को प्रोत्साहित किया जा सकता है जो पर्यावरण और समाज के लिए सकारात्मक हों जैसे- स्वच्छता अभियान, वृक्षारोपण, और सामूहिक रूप से आपदा प्रबंधन की योजनाओं में भागीदारी।

5. सामाजिक जिम्मेदारी और नागरिक जागरूकता

विद्यालयों के माध्यम से विद्यार्थियों में जागरूकता केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं बल्कि सामाजिक और नागरिक स्तर पर भी पैदा की जा सकती है। जब विद्यार्थी प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों के बारे में जानते हैं तो वे न केवल अपनी रक्षा करने के लिए तैयार होते हैं बल्कि वे समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए भी प्रेरित होते हैं।

विद्यार्थियों को यह समझाया जा सकता है कि वे केवल अपने जीवन के लिए जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि उनके समुदाय और राष्ट्र के लिए भी उन्हें जागरूक और जिम्मेदार नागरिक बनने की आवश्यकता है। यह शिक्षा उन्हें पर्यावरण की रक्षा, सामाजिक सुरक्षा और सामूहिक प्रयासों के महत्व को समझने में मदद करती है।

विद्यालयों का यह दायित्व है कि वे विद्यार्थियों को प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक बनाएं। इन मुद्दों पर शिक्षा देने से न केवल विद्यार्थियों की व्यक्तिगत सुरक्षा और भलाई सुनिश्चित होती है बल्कि यह समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में भी मदद करता है। विद्यालयों के माध्यम से विद्यार्थियों में जागरूकता और जिम्मेदारी का विकास, भविष्य में एक सुरक्षित, स्वस्थ और पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार समाज के निर्माण में सहायक हो सकता है।

2.5 उपसंहार

उपर्युक्त सम्बन्धित साहित्य के अनुसंधान से यह स्पष्ट होता है कि भारत तथा विदेशों मे अनेक समस्याओं पर अनेक उपयोगी अध्ययन किए गये हैं। शोधकर्ता को जो कुछ भी साम्रगी मिली वह अलग-अलग तथ्यों पर आधारित थी यद्यपि अनुसंधानकर्ता ने विषय का चुनाव किया हैं उस पर अध्ययन लगभग नगण्य हैं।

प्रस्तुत अध्ययन भूगोल विषय के विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन से सम्बन्धित बहुत कम अनुसंन्धान कार्य हुआ है जो कि शोधकर्ता की दृष्टी में आया हैं यदि इस प्रकार का अध्ययन कहीं ओर हुआ भी होगा या तो बहुत कम या नही हो पाया या वे अनुसंन्धान को ढूढ़ने में असफल रहे हैं।

शोधकर्ता विषय सर्वथा नवीन विषय पर आधारित हैं अतः उससे सम्बन्धित अधिक शोध विषय का अभाव रहा हैं। फिर भी यथा संभव शोधकर्ता ने सम्बन्धित साहित्य का अर्थ महत्व का विवरण प्रस्तुत किया हैं इससे अतिरिक्त प्रस्तुत शोध समस्या से कमोंबेश सम्बन्धित पूर्व में किये गये अनुसंधानों का अध्ययन विदेश तथा भारत के सन्दर्भ में दिया गया हैं।

तृतीय अध्याय में अनुसंन्धान समस्या की विधि एवं उपकरणों का उल्लेख किया जायेगा ।   




तृतीय अध्याय - शोध विधि‚ उपकरण, तकनीक एवं सांख्यिकी


3.1. प्रस्तावना

किसी भी अनुसंधान की सफलता के लिए उसकी अध्ययन विधि एवं अध्ययन योजना को प्रभावशाली एवं स्पष्ट होना अत्यंत आवश्यक है। अनुसंधान एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है। जिसमें वैज्ञानिक उपकरणों के प्रयोग द्वारा वर्तमान ज्ञान का परिमार्जन उसका विकास तथा किसी नए तथ्य की खोज द्वारा ज्ञान में वृद्धि की जाती है। इस प्रकार अनुसंधान का उद्देश्य मुख्य रूप से वैज्ञानिक वीडियो द्वारा विशिष्ट प्रश्नों का उत्तर एवं विशिष्ट समस्याओं का समाधान प्राप्त करना है।

प्रत्येक अनुसंधान कार्य में एक या एक से अधिक निश्चित अध्ययन प्रणाली एवं विधियों का उपयोग किया  जाता है। अध्ययन की योजना व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध स्पष्ट तथा प्रभावशाली होनी चाहिए।  जिससे समय व शक्ति का व्यय सार्थक हो सके। अतः प्रस्तुत अनुसंधान कार्य के उद्देश्यों तथा विभिन्न कारकों को समुचित रूप से ध्यान में रखते हुए शोधकर्ता द्वारा न्यादर्श अनुसंधान विधियों एवं उपकरणों का चयन किया गया है।

3.2. विधि

शैक्षिक अनुसंधान के क्षेत्र में अनेक विधियां समय-समय पर विकसित होती है। कोई भी शोध किसी विधि से श्रेष्ठ अथवा हीन नहीं होता है। प्रत्येक विधि की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अध्ययन विधि का चयन शोध कार्य की वैधता निष्कर्ष तथा सार्थकता में सहायक होता है।

किसी भी अनुसंधान की सफलता के लिए उसकी अध्ययन विधि एवं अध्ययन योजना को प्रभावित एवं स्पष्ट होना अत्यंत आवश्यक है। किसी विशिष्ट प्रयोग के लिए विशिष्ट विधियां प्रयोग में लाई जाती है। प्रयुक्त की जाने वाली विधि का निर्णय चयन की गई समस्या की प्रकृति तथा उसके समाधान हेतु आवश्यकता के प्रकार पर निर्भर करता है। चयन की गई विधियां सदैव अध्ययन के अनुकूल, व्यावहारिक, पूर्व नियोजित तथा बोधगम्य होनी चाहिए।

गुड एण्ड हेड के अनुसार: - “जो अनुसंधानकर्ता यह नहीं जानता कि उद्देश्यों की परीक्षा के लिए कौन-कौन सी विधियां उपलब्ध है तो व्यावहारिक प्रश्नों के निर्माण में असफल रहता है।”

शैक्षिक अनुसंधान (Educational Research) में विधि का चयन अनुसंधान के उद्देश्य, प्रश्न, और संदर्भ पर निर्भर करता है। शैक्षिक अनुसंधान में विभिन्न विधियाँ होती हैं जो विभिन्न प्रकार के डेटा संग्रहण, विश्लेषण और निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए इस्तेमाल होती हैं। इनमें प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं:

1. मानविकी विधि (Qualitative Research Method)

यह विधि उन पहलुओं का अध्ययन करती है जो संख्यात्मक रूप में नहीं मापे जा सकते जैसे- छात्र का व्यवहार, मानसिकता, शिक्षा प्रणाली की सामाजिक-आर्थिक प्रभाव, आदि। इस विधि में व्यक्ति, समूह, समाज और संस्कृति के गहरे अध्ययन पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। प्रमुख मानविकी विधियाँ निम्नलिखित हैं:- 

• साक्षात्कार

• समूह चर्चा 

• केस अध्ययन

• विषयगत विश्लेषण


2. संख्यात्मक विधि (Quantitative Research Method)

इस विधि का उद्देश्य आंकड़ों के माध्यम से शैक्षिक प्रक्रिया या विषय का वैज्ञानिक अध्ययन करना होता है। इसमें सांख्यिकी और गणनात्मक उपकरणों का उपयोग किया जाता है। यह विधि शिक्षा में विभिन्न पहलुओं का मात्रात्मक मूल्यांकन करने के लिए प्रयोग की जाती है। संख्यात्मक विधियाँ निम्नलिखित हैं:-

• सर्वेक्षण 

• प्रश्नावली 

• परीक्षण 

• प्रयोग 

3. मिश्रित विधि (Mixed-Methods Research)

इस विधि में दोनो अर्थात् मानविकी और संख्यात्मक विधियों का संयोजन किया जाता है। इसका उद्देश्य दोनो विधियों के लाभों का उपयोग करना होता है ताकि शोध में अधिक व्यापक और सटीक परिणाम मिल सकें जैसे- पहले किसी विषय पर संख्यात्मक डेटा एकत्र करना फिर उस डेटा के आधार पर गुणवत्ता-आधारित साक्षात्कार या विश्लेषण करना।

4. व्यावहारिक अनुसंधान विधि (Action Research)

यह विधि आमतौर पर शैक्षिक सुधार के लिए इस्तेमाल होती है। इसमें शिक्षक या अन्य शैक्षिक पेशेवर स्वयं अपने शिक्षण विधियों, पाठ्यक्रमों या स्कूल नीतियों का विश्लेषण करते हैं ताकि सुधारात्मक कदम उठाए जा सकें जैसे-

   - शिक्षकों द्वारा अपनाई गई शिक्षण विधियों का विश्लेषण और उनमें सुधार करना।

   - विद्यार्थियों के प्रदर्शन के आधार पर विधियों में बदलाव करना।

5. मूल्यांकन विधि (Evaluation Research)

इस विधि का उद्देश्य किसी शैक्षिक कार्यक्रम, नीति या हस्तक्षेप का मूल्यांकन करना है ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि वह कार्यक्रम या नीति प्रभावी है या नहीं जैसे-

   - किसी शैक्षिक कार्यक्रम के प्रभाव का मूल्यांकन।

   - पाठ्यक्रम या शैक्षिक सॉफ़्टवेयर के उपयोग की प्रभावशीलता का परीक्षण।

6. नैतिक अनुसंधान विधि (Ethnographic Research)

यह विधि किसी विशेष शैक्षिक समुदाय जैसे- स्कूल या कॉलेज में शोधकर्ता के लंबे समय तक अवलोकन पर आधारित होती है। इसमें शोधकर्ता शिक्षा और संस्कृति के संबंधों को समझने के लिए गहरी पंक्तियों का अनुसरण करता है जैसे- विद्यालय की सांस्कृतिक गतिविधियों और उनके शैक्षिक प्रभाव का अध्ययन।

7. विवरणात्मक विधि (Descriptive Research)

इस विधि में शैक्षिक परिप्रेक्ष्य को बिना किसी हेरफेर के या प्रभाव डालने के अध्ययन किया जाता है। यह शैक्षिक घटनाओं, परिस्थितियों या विषयों का व्यवस्थित रूप से वर्णन करती है जैसे- विद्यार्थियों के प्रदर्शन या शैक्षिक संदर्भ में होने वाली प्रवृत्तियों का विवरण।

8. निरंतरता विधि (Longitudinal Research)

इसमें शैक्षिक अध्ययन को एक लंबी अवधि के दौरान देखा जाता है ताकि समय के साथ बदलावों या प्रवृत्तियों को समझा जा सके जैसे- किसी विशेष शैक्षिक हस्तक्षेप के दीर्घकालिक प्रभावों का अध्ययन।

शैक्षिक अनुसंधान में विधियाँ अनुसंधान के उद्देश्य, प्रकार और संदर्भ के आधार पर चुनी जाती हैं। प्रत्येक विधि का अपना महत्व है और यह शैक्षिक सुधार के लिए विविध दृष्टिकोण प्रदान करती है। 

अतः शोधकर्ता के लिए यह आवश्यक है कि शोधकर्ता अपना कार्य प्रारंभ करने से पूर्व अध्ययन में प्रयुक्त होने वाली विधि एवं उपकरण का निर्धारण करे।

3.2.1. सर्वेक्षण विधि (Survey Method)

सर्वेक्षण विधि (Survey Method) शैक्षिक अनुसंधान में एक महत्वपूर्ण और व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली विधि है। यह विधि शैक्षिक संदर्भ में डेटा संग्रहण के लिए उपयोगी होती है जैसे- विद्यार्थियों के व्यवहार, शिक्षण विधियाँ, पाठ्यक्रम का मूल्यांकन, या शैक्षिक नीतियों के प्रभाव का विश्लेषण। सर्वेक्षण विधि का उद्देश्य बड़ी संख्या में उत्तरदाताओं से व्यवस्थित तरीके से जानकारी प्राप्त करना होता है ताकि शैक्षिक प्रक्रियाओं को समझा और सुधारने के लिए ठोस निष्कर्ष निकाले जा सकें।

3.2.2. सर्वेक्षण विधि की प्रमुख विशेषताएँ:

1. डेटा संग्रहण के उपकरण:

प्रश्नावली (Questionnaire): यह विधि शैक्षिक अनुसंधान में सबसे आम होती है। प्रश्नावली में विभिन्न प्रकार के सवाल होते हैं: बंद (Closed-ended) और खुले (Open-ended) प्रश्न। बंद प्रश्नों में सीमित उत्तर होते हैं जैसे "हाँ" या "नहीं" या कुछ विकल्प दिए जाते हैं जबकि खुले प्रश्नों में उत्तरदाता विस्तृत और व्यक्तिगत प्रतिक्रिया देता है।

साक्षात्कार (Interview): कभी-कभी साक्षात्कारों का उपयोग भी किया जाता है जहां शोधकर्ता व्यक्तिगत रूप से या छोटे समूहो में सवाल पूछते हैं। यह विधि विशेष रूप से गुणवत्ता-आधारित डेटा संग्रहण के लिए उपयोगी होती है।

नमूना चयन (Sampling): सर्वेक्षण में नमूना चयन महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि डेटा किसी बड़े समूह का प्रतिनिधित्व करता हो। नमूना चयन की विभिन्न विधियाँ होती हैं:

रैंडम सैंपलिंग (Random Sampling): इस विधि में हर व्यक्ति को समान अवसर मिलता है।

सुविधाजनक सैंपलिंग (Convenience Sampling): इसमें शोधकर्ता उन लोगों का चयन करते हैं जो सबसे आसान तरीके से उपलब्ध होते हैं।

डेटा विश्लेषण: एकत्रित डेटा का विश्लेषण सांख्यिकीय (Statistical) या गुणवत्तात्मक (Qualitative) किया जा सकता है। सांख्यिकीय विश्लेषण में औसत, प्रतिशत, वितरण आदि का उपयोग होता है जबकि गुणात्मक विश्लेषण में प्रतिक्रियाओं के पैटर्न और विषयों की पहचान की जाती है।

3.2.3. सर्वेक्षण विधि का महत्व :-

सर्वेक्षण विधि अनुसंधान में कई प्रकार के डेटा एकत्र करने के लिए उपयोग की जाती है:-

1. शिक्षण विधियों का मूल्यांकन: - शोधकर्ता यह जानने के लिए सर्वेक्षण विधि का उपयोग करते हैं कि कौन सी शिक्षण विधियाँ विद्यार्थियों पर अधिक प्रभावी हैं। जैसे- पारंपरिक शैक्षिक विधियाँ और डिजिटल शिक्षण उपकरणो का तुलनात्मक मूल्यांकन।

2. विद्यार्थियों का मूल्यांकन: - विद्यार्थियों के दृष्टिकोण, उनकी सीखने की आदतें और शैक्षिक अनुभवों पर सर्वेक्षण के माध्यम से जानकारी एकत्र की जाती है।

3. शैक्षिक नीतियों का मूल्यांकन: - शैक्षिक संस्थानों में लागू की गई नीतियों का मूल्यांकन करना जैसे- छात्र-शिक्षक अनुपात, पाठ्यक्रम सुधार और स्कूल की प्रशासनिक नीतियाँ।

4. शैक्षिक संस्थानों की समीक्षा: - स्कूलों और कॉलेजों के कार्यों, शिक्षण के तरीके और अन्य शैक्षिक पहलुओं की समीक्षा सर्वेक्षण के माध्यम से की जाती है।

3.2.4. सर्वेक्षण विधि के लाभ और सीमाएँ:

लाभ:

I. व्यापक डेटा संग्रहण: सर्वेक्षण विधि बड़ी संख्या में उत्तरदाताओं से डेटा एकत्र करने के लिए प्रभावी है।

II. समय की बचत: बड़े पैमाने पर डेटा संग्रहण में यह विधि अपेक्षाकृत कम समय लेती है।

III. कम लागत: खासकर जब सर्वेक्षण ऑनलाइन या डिजिटल माध्यम से किया जाता है तो इसकी लागत कम होती है।

IV. समान्यीकृत परिणाम: एक ही विषय पर डेटा के बड़े सेट से निष्कर्ष अधिक सामान्य और विश्वसनीय होते हैं।

सीमाएँ:

I. उत्तरदाताओं की ईमानदारी: उत्तरदाता कभी-कभी सामाजिक रूप से स्वीकार्य उत्तर देते हैं जो वास्तविक राय से भिन्न हो सकते हैं।

II. प्रश्नों की अस्पष्टता: प्रश्नों की अस्पष्टता या जटिलता उत्तरदाताओं को भ्रमित कर सकती है जिससे परिणामों पर असर पड़ सकता है।

III. नमूना चयन में बायस: यदि नमूना चयन ठीक से नहीं किया जाता, तो परिणामों में पक्षपातीता (Bias) आ सकती है।

शैक्षिक अनुसंधान में सर्वेक्षण विधि एक महत्वपूर्ण और व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली विधि है। यह विधि शोधकर्ताओं को शैक्षिक संदर्भ में बड़े पैमाने पर डेटा संग्रहण की सुविधा प्रदान करती है जिससे शैक्षिक नीतियों, शिक्षण विधियों और विद्यार्थियों के दृष्टिकोण का प्रभावी मूल्यांकन किया जा सकता है। सर्वेक्षण विधि के उपयोग में सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है जैसे- स्पष्ट और संतुलित प्रश्नावली डिज़ाइन करना ताकि डेटा विश्वसनीय और प्रभावी हो सके।

3.2.5 सर्वेक्षण विधि का शोध हेतु उपयोग

सर्वेक्षण विधि द्वारा वर्तमान एवं व्यावहारिक समस्याओं का निराकरण किया जाता है अतः इसी आधार पर शोध समस्या "भूगोल विषय के विद्यार्थियों में पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक आपदाओं एवं कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता का अध्ययन।" के लिए सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया हैं।

3.2.6 सर्वेक्षण विधि का औचित्य 

किसी भी क्षेत्र में शोध के लिए जो विधियाँ प्रयोग मे लाई जाती है उनका अपना अलग ही महत्व होता है, क्योकि यह शोध की प्रवृति पर निर्भर करता हैं कि किस विषय शोध हेतु कौनसी विधि उपयुक्त रहेगी ? इन्ही विधियों मे सर्वेक्षण विधि एक महत्वपूर्ण विधि मानी जाती हैं क्योकि यह दत्त संकलन में सहायक होती हैं इसलिए सर्वेक्षण विधि का अपना औचित्य हैं।

सर्वेक्षण विधि द्वारा सामान्य रूप से उन्ही तथ्यों का संकलन किया जाता हैं जो वर्तमान से संबंधित हैं। इसके अतिरिक्त सर्वेक्षण विधि में तथ्य एकत्रित करके सामान्य सिद्धान्त या सामान्य स्थिति की जानकारी प्राप्त की जाती हैं। 

प्रस्तुत शोध वर्तमान परिस्थितियों से महत्वपूर्ण रूप से संबंधित हैं अतः इस शोध के अध्ययन के लिए सर्वेक्षण विधि को प्रयुक्त करना सभी दृष्टियों से अपनी कसौटी पर खरा उतरता हैं।

प्रस्तुत शोध में सर्वेक्षण विधि का प्रयोग निम्नलिखित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए किया गया हैं-

12. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का विभिन्न चरों के आधार पर अध्ययन करना।

13. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का प्राकृतिक आपदाओं संबंधी जानकारी का अध्ययन करना।

14. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का कोरोना महामारी संबंधी जानकारी का अध्ययन करना।

15. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का पर्यावरण संरक्षण संबंधी जानकारी का अध्ययन करना।

16. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का प्राकृतिक आपदा के प्रति जागरूकता का अध्ययन करना।

17. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता का अध्ययन करना।

18. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन।

19. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का राजकीय एवं निजी विद्यालय के आधार पर तुलनात्मक अध्ययन करना।

20. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का राजकीय एवं निजी विद्यालय के आधार पर प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता का तुलनात्मक अध्ययन करना।

21. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का राजकीय एवं निजी विद्यालय के आधार पर कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता का तुलनात्मक अध्ययन करना।

22. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का राजकीय एवं निजी विद्यालय के आधार पर पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का तुलनात्मक अध्ययन करना।

3.3. उपकरण

अनुसंधान के दौरान डेटा संग्रहण के लिए विभिन्न प्रकार के उपकरणों का उपयोग किया जाता है। इन उपकरणों को आमतौर पर दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: स्वनिर्मित उपकरण (Self-made Tools) और प्रमापित उपकरण (Standardized Tools) । ये दोनो प्रकार के उपकरण विभिन्न उद्देश्यों और शोध के प्रकार के अनुसार उपयोग किए जाते हैं। 

1. स्वनिर्मित उपकरण (Self-made Tools)

स्वनिर्मित उपकरण वे उपकरण होते हैं जिन्हें शोधकर्ता अपने अनुसंधान के लिए स्वयं तैयार करते हैं। यह तब उपयोगी होता है जब कोई पहले से मौजूद उपकरण शोध के उद्देश्यों के अनुरूप न हो या शोधकर्ता को विशिष्ट डेटा संग्रहण की आवश्यकता हो।

स्वनिर्मित उपकरण के प्रकार:- 

1. प्रश्नपत्र (Questionnaires):- शोधकर्ता अपने अध्ययन के उद्देश्य के आधार पर प्रश्नपत्र तैयार करते हैं। इसमें सवालों का स्वरूप, संख्या और प्रकार शोधकर्ता द्वारा तय किया जाता है।

2. साक्षात्कार प्रश्नावली (Interview Schedules):- जब शोधकर्ता को किसी विशेष विषय या समूह पर गहरी जानकारी प्राप्त करनी होती है तो वे स्वयं साक्षात्कार प्रश्नावली तैयार करते हैं।

3. अवलोकन उपकरण (Observation Tools):- अगर किसी विशेष गतिविधि या प्रक्रिया का निरीक्षण किया जा रहा हो तो शोधकर्ता स्वनिर्मित अवलोकन उपकरण तैयार करते हैं जो उनके अध्ययन के उद्देश्यों को पूरा करते हैं।

4. मूल्यांकन मापदंड (Evaluation Criteria):- किसी विशेष कार्यक्रम या योजना की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने के लिए स्वनिर्मित मापदंडों का उपयोग किया जा सकता है।

प्रमापित उपकरण (Standardized Tools)

प्रमापित उपकरण वे उपकरण होते हैं जिनका पहले से मानकीकरण किया गया होता है और जिन्हें कई शोधों में उपयोग किया जा चुका होता है। इन उपकरणों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि डेटा संग्रहण के दौरान एक ही मानक और प्रक्रिया का पालन किया जाए जिससे परिणामों की तुलना करना आसान हो सके।

प्रमापित उपकरण के प्रकार:-

1. मानकीकृत प्रश्नपत्र (Standardized Questionnaires):- ये प्रश्नपत्र पहले से विभिन्न शैक्षिक, मानसिक या सामाजिक उद्देश्यों के लिए प्रमाणित होते हैं। उदाहरण: IQ टेस्ट, व्यक्तित्व परीक्षण आदि।

2. मानकीकृत परीक्षण (Standardized Tests):- ये परीक्षण किसी विशेष मानक पर आधारित होते हैं और अक्सर शैक्षिक या मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र में उपयोग किए जाते हैं।

3. मानकीकृत साक्षात्कार (Standardized Interviews):- इनमें साक्षात्कार के प्रश्न और प्रक्रिया पहले से निर्धारित होती है ताकि सभी व्यक्तियो से समान प्रकार की जानकारी प्राप्त की जा सके।

4. मानकीकृत मूल्यांकन मापदंड (Standardized Evaluation Criteria): ये मापदंड किसी विशिष्ट प्रोग्राम या योजना के प्रभाव और कार्यक्षमता का आकलन करने के लिए तैयार किए जाते हैं।

अनुसंधान में स्वनिर्मित उपकरण और प्रमापित उपकरण दोनो का महत्व है। जहां एक ओर स्वनिर्मित उपकरण किसी विशेष संदर्भ में अधिक उपयुक्त हो सकते हैं, वहीं प्रमापित उपकरण व्यापक रूप से स्वीकार्य होते हैं और इनकी विश्वसनीयता और समानता सुनिश्चित होती है। इन उपकरणो का चयन अनुसंधान के उद्देश्य, प्रक्रिया और अपेक्षित परिणामों के आधार पर किया जाता है।

3.4. अनुसन्धान में प्रयुक्त उपकरण

प्रस्तुत शोध अध्ययन में शोधकर्ता ने स्वनिर्मित उपकरण के रूप में जागरूकता प्रमापनी का निर्माण किया है। इस शोध में निम्नलिखित प्रमापीकृत एवं अप्रमापीकृत स्वनिर्मित उपकरणों को प्रमापीकृत कर प्रयोग किया गया है -

अ. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी -  स्वनिर्मित परीक्षण

ब. कोरोना महामारी जागरूकता प्रमापनी - स्वनिर्मित परीक्षण

स. पर्यावरण संरक्षण प्रश्नावली / प्रमापनी - प्रमापीकृत उपकरण  

3.4.1 स्वनिर्मित उपकरण निर्माण की आवश्यकता 

शोधकर्ता के समक्ष विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता, कोरोना महामारी जागरूकता को ज्ञात करने के लिए कोई नवीन प्रमापीकृत उपकरण उपलब्ध न हो सका अतः शोध हेतु आवश्यक स्वनिर्मित उपकरणों को प्रमापीकृत कर उपयोग किया गया है।

3.5. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी - स्वनिर्मित परीक्षण

शोधकर्ता द्वारा प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी उपकरण के निर्माण का कार्य निम्नलिखित सोपानो के अन्तर्गत किया जाता है।  


3.5.1 प्रथम सोपान: - 

सम्बन्धित साहित्य का अध्ययन सर्वप्रथम अनुसंधानकर्ता ने विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी निर्माण हेतु संबंधित साहित्य का अध्ययन किया साथ ही शिक्षा मनोविज्ञान तथा शिक्षा अनुसंधान के प्राध्यापकों एवं विशेषज्ञो से विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता की जानकारी प्राप्त की ताकि विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी के निर्माण की प्रक्रिया तथा निर्माण के समय ध्यान रखने योग्य बातों से परिचित हुआ जा सके।

3.5.2 द्वितीय सोपान: - 

विशेषज्ञो से परामर्श समस्या से संबंधित साहित्य के अध्ययन करने से समस्या से सम्बन्धित घटको की जानकारी हुई। अनुसंधानकर्ता ने घटक वरीयता प्रपत्र बनाया और घटको के वरीयता क्रम हेतु उसकी प्रक्रिया विशेषज्ञो को दी।  

3.5.3 तृतीय सोपान: - 

घटको का निर्धारण तथा कथनो का निर्माण पर सारणी बनाकर घटको का वर्गीकरण किया गया। जिन घटको का सर्वाधिक अंक प्राप्त हुये उनका चयन किया गया। इस प्रकार अनुसंधान समस्या प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के घटको में से जिन 6 घटको का चयन किया गया वे घटक निम्नलिखित हैः- 

1. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के क्षेत्र 

i. आपदा का परिचय

ii. आपदा के प्रकार

iii. आपदाओं के कारण

iv. आपदाओं के प्रभाव

v. आपदा प्रबंधन

vi. आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका

3.5.4 चतुर्थ सोपान: - 

घटको में सम्बन्धित कथनो का निर्माण सम्बन्धित साहित्य का अध्ययन करने के पश्चात ही अनुसंधानकर्ता ने घटकवार सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण कथनो का निर्माण किया उसके द्वारा यह प्रयास किया गया कि इस समस्या से सम्बन्धित प्रत्येक कथन का निर्माण अच्छे ढ़ंग से किया जा सके। इसमे मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण का सहारा लिया गया। प्रश्नों की रचना के समय निम्नलिखित बिन्दुओं का पालन किया गया। 

1. कथनो में भाषा सरल, शुद्ध एवं स्पष्ट करने का प्रयत्न किया गया।

2. कोई भी कथन ऐसा नहीं पूछा गया जिसका उत्तर दूसरे कथन पर निर्भर करता है। 

3. मापनी के प्रारम्भ में विद्यार्थियों के लिए आवश्यक निर्देश दिये गये। 

4. विद्यार्थियों को मापनी अपना नाम, आयु, लिंग, कक्षा, विद्यालय का नाम एवं शहरी/ग्रामीण लिखने के लिए अनुरोध इस आश्वासन के साथ किया गया कि मापनी की पूर्तियॉ पूर्णतः गोपनीय रखी जायेगी। 

5. एक कथन के अन्दर केवल एक ही विचार प्रस्तुत किया गया। 

6. यथा संभव कथनो का आकार छोटा रखा गया। 

  क्षेत्रो का चयन किया गया है जो निम्नानुसार है:-






सारणी संख्या 3.1

प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के क्षेत्रो में प्रश्नों की संख्या चयन सारणी

क्र.सं. क्षेत्र प्रश्न संख्या

1. आपदा का परिचय 1-8

2. आपदा के प्रकार 9-18

3. आपदाओं के कारण 19-28

4. आपदाओं के प्रभाव 29-38

5. आपदा प्रबंधन 39-48

6. आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका 49-58

योग 58


3.5.5 पंचम सोपान 

प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के परीक्षण को 100 विद्यार्थियों पर भी प्रशासित किया गया। प्रशासित करने के बाद निम्न प्रकार से अंकन किया गया:- 

सारणी संख्या 3.2

सकारात्मक व नकारात्मक कथन पर अंकन

मानक्रम अंक

सहमत 3

अनिश्चित 2

असहमत 1


प्रशासित करने के बाद अंकन किया गया फिर सरकारी विद्यालय तथा निजी विद्यालय के 60 विद्यार्थियों के प्राप्तांको के आधार पर प्राप्तांको की सारणी तैयार की। 

 

 

Higher Group Lower Group

x f fxH fxH2 x f fxH fxH2

3 10 30 90 lger 3 1 3 9

2 16 32 64 mnklhu 2 23 46 92

1 1 1 1 vlger 1 3 3 3

  27 63 155 Total 27 52 104


सारणी के आधार पर प्रत्येक कथन का टी मान निम्नलिखित सूत्रों के द्वारा निकाला गया-

 


 


 

जिस कथन का ‘टी’ मान 0.686 से अधिक आने पर उस कथन का चयन किया जाता है। और ‘टी‘ का मान 0.686 से कम होने उस कथन को निरस्त कर दिया जाता है।

सारणी संख्या 3.3

प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता मापनी के कथनो का टी-मान

क्र.स. टी-मान चयनित कथन

1 0.381 अचयनित

2 0.503 अचयनित

3 1.758 चयनित

4 5.131 चयनित

5 4.071 चयनित

6 1.700 चयनित

7 4.132 चयनित

8 4.473 चयनित

9 4.134 चयनित

10 2.206 चयनित

11 5.830 चयनित

12 4.559 चयनित

13 4.548 चयनित

14 4.587 चयनित

15 4.679 चयनित

16 7.058 चयनित

17 6.160 चयनित

18 3.616 चयनित

19 5.333 चयनित

20 3.534 चयनित

21 2.968 चयनित

22 6.160 चयनित

23 4.274 चयनित

24 5.814 चयनित

25 6.603 चयनित

26 2.486 चयनित

27 4.172 चयनित

28 4.359 चयनित

29 4.359 चयनित

30 2.850 चयनित

31 5.375 चयनित

32 3.389 चयनित

33 3.584 चयनित

34 5.738 चयनित

35 5.963 चयनित

36 2.566 चयनित

37 2.093 चयनित

38 3.984 चयनित

39 6.160 चयनित

40 6.554 चयनित

41 5.216 चयनित

42 2.850 चयनित

43 5.248 चयनित

44 2.844 चयनित

45 6.615 चयनित

46 4.206 चयनित

47 5.759 चयनित

48 4.548 चयनित

49 5.334 चयनित

50 2.850 चयनित

51 5.513 चयनित

52 2.150 चयनित

53 3.399 चयनित

54 4.559 चयनित

55 2.968 चयनित

56 4.063 चयनित

57 4.163 चयनित

58 3.820 चयनित

59 5.513 चयनित

60 3.801 चयनित


विश्वसनीयता 

प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी के परीक्षण को 100 विद्यार्थियों पर भी प्रशासित किया गया। इस प्रकार पद विश्लेषण प्रक्रिया के आधार पर प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी में से 2 कथनो को हटाया गया। उसके बाद प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी के कुल 58 कथनो की प्रमापनी को विश्वसनीयता की गणना के लिए रखा गया। कथनो के पद विश्लेषण से प्राप्त टी-मान के आधार पर बड़े से छोटे क्रम में जमाया जाता है। इसके बाद इन कथनो में प्राप्त सम तथा विषम कथनो के प्राप्तांको की जोड़ की जाती है। सम तथा विषम कथनो में प्रत्येक विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त योग के बीच में सहसम्बन्ध गुणांक ज्ञात किया गया। सहसम्बन्ध गुणांक इस सूत्र से निकाला गया:- 

r =  

इस प्रकार सहसम्बन्ध गुणांक से प्राप्त मान को विश्वसनीयता के सूत्र में रखा जाता है। 

विश्वसनीयता का सूत्र - 

विश्वसनीयता = 

r = सहसम्बन्ध गुणांक का मान।

उपरोक्त विश्वसनीयता गुणांक प्राप्त करने की इस विधि को अर्द्धविच्छेदन विधि कहते है। इस प्रकार विश्वसनीयता गुणांक का मान 0.07 से अधिक होने पर उपकरण विश्वसनीय माना जाता है। परीक्षण प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी के कुल 58 कथनो की प्रमापनी की विश्वसनीयता गुणांक का मान 0.74 प्राप्त हुआ है। इसलिए हमारे द्वारा निर्मित उपकरण विश्वसनीय है।

3.5.6. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी - परिचय

प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के मापन हेतु स्वनिर्मित उपकरण का प्रयोग विद्यार्थियों के प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता का मापन करने के लिए एक मानकीकृत माप है जो कि भारतीय परिस्थितियों और संस्कृति के अनुकूल है। यह मापनी 15 से 18 आयु के विद्यार्थियो में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के स्तर का मापन करने में सक्षम है। इस मापनी के अन्तर्गत विद्यार्थियो में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के की पांच अवस्थाओं- बहुत कम, कम, सामान्य, अधिक, बहुत अधिक की जाँच भी की गयी है। 

परीक्षण का विवरण:-

यह परीक्षण हिन्दी भाषा में दिया गया है। जिसमें 58 पद है जो कि दैनिक जीवन की विभिन्न व्यावहारिक परिस्थितियों से संबंधित है तथा उनके साथ ही कुछ सम्भावित प्रतिक्रियायें भी दी गई हैं। वे सारी परिस्थितियाँ जिनके साथ ये पद सामान्य तौर पर प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता की परिस्थितियों से संबंधित हैं ।

इस परीक्षण की वस्तुनिष्ठता एवं प्रमापीकरण के लिए इसे संभाव्य पद्धति द्वारा चयनित 100 विद्यार्थियों पर प्रशास्ति किया गया। 

प्रशासन:-

इस परीक्षण का प्रशासन सरकारी व निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के दो समूहो पर प्रशासित किया गया। परीक्षणार्थियों को स्पष्ट रूप से निर्देश दिये गये कि 

निर्देश: -

1. प्रस्तुत प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी को विद्यार्थी की आपदा के प्रति जागरूकता जानने के लिये किया गया है। 

2. आप अपनी सोच के अनुसार इस प्रमापनी में दिये गये कथनो के उत्तर दीजिये। आप प्रत्येक कथन को ध्यान से पढ़े तथा अपनी राय के अनुसार कथन के सामने 1 सहमत 2 अनिश्चित 3 असहमत के तीन कॉलम में से किसी एक कॉलम में सही (√) का चिन्ह लगायें। 

3. आप प्रमापनी में दिये हुए प्रश्नों का निर्भीकतापूर्ण उत्तर दे। आपके द्वारा दी गई जानकारी को पूर्ण गोपनीय रखा जायेगा।

4. प्रमापनी में दी गई जानकारी केवल शोध कार्य हेतु काम में लिया जायेगा। इस मापनी को भरने में कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है फिर भी इसे यथा समय में पूर्ण करने का प्रयत्न करें।

अंकन:-

अंकन की दृष्टि से यह परीक्षण सरल है। इस परीक्षण में तीन प्रतिक्रिया दी गई है -  

प्रतिक्रिया अंक

सहमत 3

अनिश्चित 2

असहमत 1

इस परीक्षण के प्राप्तांको का अधिकतम प्रसार 174 अंको तक है तथा न्यूनतम 35 अंक तक है। अधिकतम अंक प्राप्त करने का तात्पर्य है कि बालक में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता अधिक है और निम्नतम अंक प्राप्त करने का तात्पर्य है कि बालक में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता कम है। इस परीक्षण में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के स्तर की पाँच श्रेणियाँ विभाजित की गई है - बहुत अधिक, अधिक, सामान्य, कम तथा बहुत कम। सारणी संख्या 3.5 में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के स्तर का वर्गीकरण प्राप्तांको के आधार पर संदर्शिका के अनुसार दर्शाया गया  है - 




सारणी 3.4

प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के स्तर का वर्गीकरण प्राप्तांको के आधार पर

क्र.सं. प्रतिशत श्रेणी प्राप्तांक

छात्र वर्ग

1 100 - 85 बहुत अधिक 174 - 147

2 84 - 69 अधिक 146 - 120

3 68 - 53 सामान्य 119 - 92

4 52 - 37 कम 91 - 64

5 36 - 0 बहुत कम 63 - 35


3.6. कोरोना महामारी जागरूकता प्रमापनी - स्वनिर्मित परीक्षण

शोधकर्ता द्वारा कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी उपकरण के निर्माण का कार्य निम्नलिखित सोपानो के अन्तर्गत किया जाता है।  

3.6.1 प्रथम सोपान: - 

सम्बन्धित साहित्य का अध्ययन सर्वप्रथम अनुसंधानकर्ता ने विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी निर्माण हेतु संबंधित साहित्य का अध्ययन किया साथ ही शिक्षा मनोविज्ञान तथा शिक्षा अनुसंधान के प्राध्यापकों एवं विशेषज्ञो से विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता की जानकारी प्राप्त की ताकि विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी के निर्माण की प्रक्रिया तथा निर्माण के समय ध्यान रखने योग्य बातो से परिचित हो सके।


3.6.2 द्वितीय सोपान: -

विशेषज्ञो से परामर्श समस्या से संबंधित साहित्य के अध्ययन करने से समस्या से सम्बन्धित घटको की जानकारी हुई। अनुसंधानकर्ता ने घटको वरीयता प्रपत्र बनाया और घटको के वरीयता क्रम हेतु उसकी प्रक्रिया विशेषज्ञो को भी दे।  

3.6.3 तृतीय सोपान: - 

घटको का निर्धारण तथा कथनो का निर्माण पर सारणी बनाकर घटको का वर्गीकरण किया गया। जिन घटको का सर्वाधिक अंक प्राप्त हुये, उनका चयन किया गया। इस प्रकार अनुसंधान समस्या कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के घटको में से जिन 6 घटको का चयन किया गया वे घटक निम्नलिखित हैः- 

1. कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के क्षेत्र 

I. कोरोना महामारी का परिचय

II. कोरोना के विभिन्न स्वरूप

III. कोरोना के कारण

IV. कोरोना के लक्षण

V. कोरोना संबंधी सावधानियां

VI. कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका

3.6.4 चतुर्थ सोपान: - 

घटको में सम्बन्धित कथनो का निर्माण सम्बन्धित साहित्य का अध्ययन करने के पश्चात ही अनुसंधानकर्ता ने घटकवार सभी दृष्टियो से महत्वपूर्ण कथनो का निर्माण किया उसके द्वारा यह प्रयास किया गया कि इस समस्या से सम्बन्धित प्रत्येक कथन का निर्माण अच्छे ढ़ंग से किया जा सके। इसमें मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण का सहारा लिया गया। प्रश्नों की रचना के समय निम्नलिखित बिन्दुओ का पालन किया गया। 

1. कथनो में भाषा सरल, शुद्ध एवं स्पष्ट करने का प्रयत्न किया गया।

2. कोई भी कथन ऐसा नहीं पूछा गया जिसका उत्तर दूसरे कथन पर निर्भर करता है। 

3. मापनी के प्रारम्भ में विद्यार्थियों के लिए आवश्यक निर्देश दिये गये। 

4. विद्यार्थियों को मापनी अपना नाम, आयु, लिंग, कक्षा, विद्यालय का नाम एवं शहरी/ग्रामीण लिखने के लिए अनुरोध इस आश्वासन के साथ किया गया कि मापनी की पूर्तियो पूर्णतः गोपनीय रखी जायेगी। 

5. एक कथन के अन्दर केवल एक ही विचार प्रस्तुत किया गया। 

6. यथा संभव कथनो का आकार छोटा रखा गया। 

  क्षेत्रो का चयन किया गया है जो निम्नानुसार है:-

सारणी संख्या 3.5

कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के क्षेत्रो में प्रश्नों की संख्या चयन सारणी

क्र.सं. क्षेत्र प्रश्न संख्या

1. कोरोना महामारी का परिचय 1-8

2. कोरोना के विभिन्न स्वरूप 9-17

3. कोरोना के कारण 18-27

4. कोरोना के लक्षण 28-37

5. कोरोना संबंधी सावधानियां 38-47

6. कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका 48-57

योग 57


3.6.5 पंचम सोपान 

कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के परीक्षण को 100 विद्यार्थियों पर भी प्रशासित किया गया। प्रशासित करने के बाद निम्न प्रकार से अंकन किया गया:- 

सारणी संख्या 3.6

सकारात्मक व नकारात्मक कथन पर अंकन

मानक्रम अंक

सहमत 3

अनिश्चित 2

असहमत 1


प्रशासित करने के बाद अंकन किया गया फिर सरकारी विद्यालय तथा निजी विद्यालय के 60 विद्यार्थियों के प्राप्तांको के आधार पर प्राप्तांको की सारणी तैयार की। 

Higher Group  

  Lower Group

x f fxH fxH2 x f fxH fxH2

3 6 18 54 सहमत 3 0 0 0

2 21 42 84 अनिश्चित 2 5 10 20

1 0 0 0 असहमत 1 22 22 22

  27 60 138 Total 27 32 42


सारणी के आधार पर प्रत्येक कथन का टी मान निम्नलिखित सूत्रों के द्वारा निकाला गया-

 


 


 

जिस कथन का ‘टी’ मान 0.641 से अधिक आने पर उस कथन का चयन किया जाता है। और ‘टी‘ का मान 0.641 से कम होने उस कथन को निरस्त कर दिया जाता है।

सारणी संख्या 3.7

कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता मापनी के कथनो का टी-मान

क्र.स. टी-मान चयनित कथन

1 5.375 चयनित

2 2.812 चयनित

3 1.946 चयनित

4 4.163 चयनित

5 0.000 अचयनित

6 8.113 चयनित

7 0.346 अचयनित

8 3.959 चयनित

9 3.801 चयनित

10 2.993 चयनित

11 0.563 अचयनित

12 2.601 चयनित

13 9.541 चयनित

14 7.293 चयनित

15 6.617 चयनित

16 2.066 चयनित

17 4.559 चयनित

18 3.959 चयनित

19 8.575 चयनित

20 5.432 चयनित

21 4.584 चयनित

22 1.393 चयनित

23 6.139 चयनित

24 3.820 चयनित

25 3.801 चयनित

26 5.432 चयनित

27 3.250 चयनित

28 4.342 चयनित

29 3.399 चयनित

30 7.211 चयनित

31 1.863 चयनित

32 6.519 चयनित

33 1.491 चयनित

34 2.516 चयनित

35 4.799 चयनित

36 6.401 चयनित

37 6.573 चयनित

38 2.981 चयनित

39 7.454 चयनित

40 6.620 चयनित

41 2.031 चयनित

42 2.968 चयनित

43 2.574 चयनित

44 3.062 चयनित

45 3.259 चयनित

46 2.351 चयनित

47 3.432 चयनित

48 1.491 चयनित

49 3.170 चयनित

50 2.150 चयनित

51 7.627 चयनित

52 3.379 चयनित

53 3.399 चयनित

54 4.237 चयनित

55 3.801 चयनित

56 3.869 चयनित

57 2.968 चयनित

58 2.150 चयनित

59 4.655 चयनित

60 3.624 चयनित



विश्वसनीयता 

कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी के परीक्षण को 100 विद्यार्थियों पर भी प्रशासित किया गया। इस प्रकार पद विश्लेषण प्रक्रिया के आधार पर कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी में से 3 कथनो को हटाया गया। उसके बाद कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी के कुल 57 कथनो की प्रमापनी को विश्वसनीयता की गणना के लिए रखा गया। कथनो के पद विश्लेषण से प्राप्त टी-मान के आधार पर बड़े से छोटे क्रम में जमाया जाता है। इसके बाद इन कथनो में प्राप्त सम तथा विषम कथनो के प्राप्तांको की जोड़ की जाती है। सम तथा विषम कथनो में प्रत्येक विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त योग के बीच में सहसम्बन्ध गुणांक ज्ञात किया गया। सहसम्बन्ध गुणांक इस सूत्र से निकाला गया:- 

r =  

इस प्रकार सहसम्बन्ध गुणांक से प्राप्त मान को विश्वसनीयता के सूत्र में रखा जाता है। 

विश्वसनीयता का सूत्र - 

विश्वसनीयता = 

r = सहसम्बन्ध गुणांक का मान।

उपरोक्त विश्वसनीयता गुणांक प्राप्त करने की इस विधि को अर्द्धविच्छेदन विधि कहते है। इस प्रकार विश्वसनीयता गुणांक का मान 0.07 से अधिक होने पर उपकरण विश्वसनीय माना जाता है। परीक्षण कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी के कुल 57 कथनो की प्रमापनी की विश्वसनीयता गुणांक का मान 0.64 प्राप्त हुआ है इसलिए हमारे द्वारा निर्मित उपकरण विश्वसनीय है।

3.6.6. कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी - परिचय

कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के मापन हेतु स्वनिर्मित उपकरण का प्रयोग विद्यार्थियों के कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता का मापन करने के लिए एक मानकीकृत माप है जो कि भारतीय परिस्थितियो और संस्कृति के अनुकूल है। यह मापनी 15 से 18 आयु के विद्यार्थियो में कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के स्तर का मापन करने में सक्षम है। इस मापनी के अन्तर्गत विद्यार्थियो में कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के की पांच अवस्थाओं - बहुत कम, कम, सामान्य, अधिक, बहुत अधिक की जाँच की गयी है। 

परीक्षण का विवरण:-

यह परीक्षण हिन्दी भाषा में दिया गया है। जिसमें 57 पद है जो कि दैनिक जीवन की विभिन्न व्यावहारिक परिस्थितियों से संबंधित है तथा उनके साथ ही कुछ सम्भावित प्रतिक्रियायें भी दी गई हैं। वे सारी परिस्थितियाँ जिनके साथ ये पद सामान्य तौर पर कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता की परिस्थितियों से संबंधित हैं ।

इस परीक्षण की वस्तुनिष्ठता एवं प्रमापीकरण के लिए इसे संभाव्य पद्धति द्वारा चयनित 100 विद्यार्थियों पर प्रशासित किया गया। 

प्रशासन:-

इस परीक्षण का प्रशासन सरकारी व निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के दो समूहो पर प्रशासित किया गया। परीक्षणार्थियों को स्पष्ट रूप से निर्देश दिये गये कि 

निर्देश: -

1. प्रस्तुत कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी को विद्यार्थी की आपदा के प्रति जागरूकता जानने के लिये किया गया है। 

2. आप अपनी सोच के अनुसार इस प्रमापनी में दिये गये कथनो के उत्तर दीजिये। आप प्रत्येक कथन को ध्यान से पढ़े तथा अपनी राय के अनुसार कथन के सामने 1 सहमत 2 अनिश्चित 3 असहमत के तीन कॉलम में से किसी एक कॉलम में सही (√) का चिन्ह लगाये। 

3. आप प्रमापनी में दिये हुए प्रश्नों का निर्भीकतापूर्ण उत्तर दे। आपके द्वारा दी गई जानकारी को पूर्ण गोपनीय रखा जायेगा।

4. प्रमापनी में दी गई जानकारी केवल शोध कार्य हेतु काम में लिया जायेगा। इस मापनी को भरने में कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है फिर भी इसे यथा समय में पूर्ण करने का प्रयत्न करें।

अंकन:- अंकन की दृष्टि से यह परीक्षण सरल है। इस परीक्षण में तीन प्रतिक्रिया दी गई है -  

प्रतिक्रिया अंक

सहमत 3

अनिश्चित 2

असहमत 1

इस परीक्षण के प्राप्तांको का अधिकतम प्रसार 171 अंको तक है तथा न्यूनतम 35 अंक तक है। अधिकतम अंक प्राप्त करने का तात्पर्य है कि बालक में कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता अधिक है और निम्नतम अंक प्राप्त करने का तात्पर्य है कि बालक में कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता कम है। इस परीक्षण में कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के स्तर की पाँच श्रेणियाँ विभाजित की गई है - बहुत अधिक, अधिक, सामान्य, कम तथा बहुत कम। सारणी संख्या 3.5 में कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के स्तर का वर्गीकरण प्राप्तांको के आधार पर संदर्शिका के अनुसार दर्शाया गया है - 

सारणी 3.8

कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के स्तर का वर्गीकरण प्राप्तांको के आधार पर

क्र.सं. प्रतिशत श्रेणी प्राप्तांक

1 100 - 85 बहुत अधिक 171 - 145

2 84 - 69 अधिक 144 - 117

3 68 - 53 सामान्य 116 - 90

4 52 - 37 कम 89 - 63

5 36 - 20 बहुत कम 62 - 34


3.7. पर्यावरण जागरूकता योग्यता प्रमापनी - प्रमापीकृत परीक्षण

पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के मापन हेतु प्रवीण कुमार झा द्वारा निर्मित उपकरण  Environmental Awareness Ability Measure (EAAM) का प्रयोग किया है। इस मापनी के अन्तर्गत 51 प्रश्न दिये गये है। विद्यार्थियों को अपनी आकांक्षा के अनुरूप किसी तीन विकल्प में से एक पर सही का निशान लगना है।

पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के मापन हेतु पर्यावरण जागरूकता योग्यता प्रमापनी उपकरण का प्रयोग विद्यार्थियों के पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का मापन करने के लिए एक मानकीकृत माप है जो कि भारतीय परिस्थितियों और संस्कृति के अनुकूल है। यह मापनी 14 से 21 आयु के विद्यार्थियो में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के स्तर का मापन करने में सक्षम है। इस मापनी के अन्तर्गत विद्यार्थियो में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता की पांच अवस्थाओं - बहुत कम, कम, सामान्य, अधिक, बहुत अधिक की जाँच की गयी है। 

परीक्षण का विवरण:-

यह परीक्षण हिन्दी भाषा में दिया गया है। जिसमें 51 पद है जो कि दैनिक जीवन की विभिन्न व्यावहारिक परिस्थितियों से संबंधित है तथा उनके साथ ही कुछ सम्भावित प्रतिक्रियायें भी दी गई हैं। वे सारी परिस्थितियाँ जिनके साथ ये पद सामान्य तौर पर पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता की परिस्थितियों से संबंधित हैं ।

विश्वसनीयता:

इस परीक्षण का विश्वसनीयता गुणांक तीन विधियों द्वारा मापा गया है। सारणी संख्या 3.9 में इस परीक्षण का विश्वसनीयता गुणांक दर्शाया गया है-

सारणी 3.9

पर्यावरण जागरूकता क्षमता माप की विश्वसनीयता

K. R. Method Test-Retest Method Split-Half Method

N=100 Time gape of 3-month N=50 Time gape of 6-month N=50 N=50

0.84* 0.74* 0.71* 0.61*

*Significant at 0.01 level of significance 

वैधता

पर्यावरण जागरूकता क्षमता माप की वैधता निर्धारित करने के लिए वर्तमान पैमाने के अंको और तरनिजी के पर्यावरण जागरूकता पैमाने के बीच सहसंबंध के गुणांक की गणना की गई। सहसंबंध का गुणांक 0.83 पाया गया। पैमाने में चेहरा और सामग्री वैधता भी है क्योंकि प्रत्येक आइटम का मूल्यांकन विशेषज्ञो द्वारा किया गया था।

प्रशासन:-

इस परीक्षण का प्रशासन सरकारी व निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के दो समूहो पर प्रशासित किया गया। परीक्षणार्थियों को स्पष्ट रूप से निर्देश दिये गये कि-



निर्देश: -

1. प्रस्तुत पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता प्रमापनी को विद्यार्थी की आपदा के प्रति जागरूकता जानने के लिये किया गया है। 

2. आप अपनी सोच के अनुसार इस प्रमापनी में दिये गये कथनो के उत्तर दीजिये। आप प्रत्येक कथन को ध्यान से पढ़े तथा अपनी राय के अनुसार कथन के सामने 1 सहमत 2 अनिश्चित 3 असहमत के तीन कॉलम में से किसी एक कॉलम में सही (√) का चिन्ह लगायें। 

3. आप प्रमापनी में दिये हुए प्रश्नों का निर्भीकतापूर्ण उत्तर दे। आपके द्वारा दी गई जानकारी को पूर्ण गोपनीय रखा जायेगा।

4. प्रमापनी में दी गई जानकारी केवल शोध कार्य हेतु काम में लिया जायेगा। इस मापनी को भरने में कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है फिर भी इसे यथा समय में पूर्ण करने का प्रयत्न करें।

अंकन:-

अंकन की दृष्टि से यह परीक्षण सरल है। इस परीक्षण में तीन प्रतिक्रिया दी गई है -  

प्रतिक्रिया अंक

सहमत 2

अनिश्चित 1

असहमत 0

इस परीक्षण के प्राप्तांको का अधिकतम प्रसार 102 अंको तक है तथा न्यूनतम 00 अंक तक है। अधिकतम अंक प्राप्त करने का तात्पर्य है कि बालक में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता अधिक है और निम्नतम अंक प्राप्त करने का तात्पर्य है कि बालक में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता कम है। इस परीक्षण में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के स्तर की पाँच श्रेणियाँ विभाजित की गई है - बहुत अधिक, अधिक, सामान्य, कम तथा बहुत कम। सारणी संख्या 3.8 में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के स्तर का वर्गीकरण प्राप्तांको के आधार पर संदर्शिका के अनुसार दर्शाया गया  है - 

सारणी 3.10

पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के स्तर का वर्गीकरण प्राप्तांको के आधार पर

क्र.सं. Grand श्रेणी प्राप्तांक

छात्र वर्ग

1 A बहुत अधिक 99 से अधिक

2 B अधिक 87 - 98

3 C सामान्य 75 - 86

4 D औसत 59 - 74

5 E औसत से कम 47 – 58 

6 F कम 35 - 46

5 G बहुत कम 34 से कम


3.8. साक्षात्कार (असंरचित)

सामाजिक अनुसंधान की पद्धतियों में साक्षात्कार पद्धति का स्थान सर्वोपरी है अन्य व्यक्तियो के आंतरिक विचारो को जानने में यह एक उपयोगी पद्धति है। साक्षात्कार समूह अथवा व्यक्तियो के पारस्परिक सम्पर्क की क्रमबद्ध प्रणाली है जिसके माध्यम से अन्य व्यक्तियो अथवा समुदाय के जीवन के अपरिचित तथ्यों का ज्ञान प्राप्त होता है। जब तक दोनो मिलने वाले पक्ष समान सामाजिक स्तर पर आकर विचार-विमर्श करने को तैयार नहीं होते, तब तक साक्षात्कार होना संभव नहीं है।

‘पी. वी. यंग’ :- ‘‘साक्षात्कार को एक क्रमबद्ध प्रणाली माना जा सकता है जिसके द्वारा एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के आन्तरिक जीवन में अधिक अथवा कम काल्पनिकता से प्रवेश करता है जो कि उसके लिए सामान्यतया तुलनात्मक रूप से अपरिचित है।’’

‘गुड व हैट’: - ‘‘साक्षात्कार मूलरूप से एक सामाजिक प्रतिक्रिया है।’’

‘शिन पाओयेंग’: - ‘‘साक्षात्कार क्षेत्रीय कार्य की एक पद्धति है जो कि एक व्यक्ति या व्यक्तियो के व्यवहार की देखभाल करने, कथनो को अंकित करने एवं सामाजिक या सामूहिक अन्तक्रिया के वास्तविक परिणामो का प्रेक्षण करने के लिए प्रयोग में ली जाती है।’’

‘मीनेन्द्रनाथ बसु’ : - ‘‘एक साक्षात्कार को कुछ बिन्दुओं पर व्यक्तियो के आमने-सामने या मिलने के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।’’

साक्षात्कार के उद्देश्य 

साक्षात्कार के अनेक उद्देश्य होते हैं। प्रत्येक साक्षात्कारकर्ता को उनका पूर्ण ज्ञान होना चाहिए जिससे वह परिस्थिति अनुसार वांछनीय प्रकार के साक्षात्कार ले सके। ये उद्देश्य निम्नांकित हैं -

I. आमने-सामने के सम्पर्क से सूचना प्राप्त करना:- प्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने का संबंध स्थापित करके जो वार्तालाप किया जाता है उससे अध्ययनकर्ता को साक्षात्कार लिए जाने वाले व्यक्ति के जीवन की आन्तरिक बाते, आन्तरिक भावनाएँ, इच्छाएँ और अभिरूचियों को जानने का अवसर प्राप्त होता है। इस प्रकार अज्ञात तथ्यों की खोज हो जाती है।

II. प्राक्कल्पनाओं का स्त्रोत:- साक्षात्कार से अध्ययनकर्ता को व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन के संबंध में विविध व बहुमूल्य जानकारी प्राप्त होती है जिसके आधार पर वह अपने अध्ययन से संबंधित कई नयी प्राक्कल्पनाओं का निर्माण करने में सफल होता है।

III. गुणात्मक तथ्यों को प्राप्त करना:- सामाजिक तथ्य मूल रूप से गुणात्मक होते है जो विचार, भावना, लोकविश्वास आदि के रूप में मनुष्य के अन्तर्जगत में फैले रहते हैं। ये व्यक्तिगत भी हो सकते है और सामूहिक भी। इन्हें अन्य साधनों द्वारा प्राप्त नहीं किया जा रहा सकता, केवल साक्षात्कार द्वारा ही संकलित किया जा सकता है।

IV. प्रेक्षण के लिए अवसर पाना:- जब अध्ययनकर्ता किसी व्यक्ति के पास साक्षात्कार लेने के लिए पहुंचता है तो वह न केवल साक्षात्कार ही लेता है बल्कि उस व्यक्ति के घर का वातावरण, आस-पड़ौस, उसके घर के सदस्यों के व्यवहार के विविध प्रारूप आदि अनायास ही उसकी दृष्टि में आ जाते हैं और वह उनके प्रेक्षण का बहुमूल्य अवसर भी वही पा लेता है। समाजशास्त्रीय और मानवशास्त्रीय अध्ययनो में इन दोनो पद्धतियो के सम्मिलित प्रयोग को सर्वोत्तम माना जता है। बेंजामिन डी. पाल ने लिखा है कि यद्यपि साक्षात्कार व प्रेक्षण को विकल्प पद्धतियां माना जाता है लेकिन वे पूरक पद्धतियां हैं और किसी अकेली पद्धति का उपयोग करने के स्थान पर उनके सम्मिलित प्रयोग से अधिक उत्तम ज्ञानदृष्टि प्राप्त होती है।

V. किसी विशेष समस्या पर विशेष परिस्थितियों में विभिन्न व्यक्तियो के विभिन्न विचार जानना:- कई बार ऐसा देखने में आता है कि एक विशेष समय में एक विशेष समस्या पर विभिन्न व्यक्तियो के विचारो में बड़ा अंतर होता है। उसको जानने से समाज की विभिन्न प्रवृत्तियो की जानकारी होती है। अतः साक्षात्कार पद्धति इस रूप में बहुत उपयोगी सिद्ध होती है।

3.8.1 साक्षात्कार के प्रकार

साक्षात्कार का वर्गीकरण कई आधारो पर किया जा सकता है। 

1. उद्देश्य के आधार पर: -

• कारणों की जाँच वाला साक्षात्कार:- जब किसी साक्षात्कार का उद्देश्य किसी गंभीर सामाजिक घटना या समस्या के कारणों की खोज करना हो उसे कारणों की जाँच वाला साक्षात्कार कहा जाता है।

• उपचार संबंधी साक्षात्कार:- जब साक्षात्कार का उद्देश्य समस्या के उपचार से संबंधित सुझावों को प्राप्त करना हो तो उसे उपचार संबंधी साक्षात्कार कहा जाता है।

• अनुसंधान संबंधी साक्षात्कार:- जब समस्या से संबंधित सभी आवश्यक कारणों की खोज की जाती है तो उसे अनुसंधान संबंधी साक्षात्कार कहते है।

2. औपचारिकता के आधार पर: -

• औपचारिक साक्षात्कार: पहले से तैयार की गई अनुसूची के आधार पर विधि पूर्वक सूचना एकत्र करना औपचारिक साक्षात्कार कहलाता है। इसमें अनुसूची के प्रश्नों की भाषा, उनके क्रम तथा संख्या में किसी प्रकार का परिवर्तन करने की स्वतंत्रता नहीं होती है।

• अनौपचारिक साक्षात्कार: इसमें साक्षात्कारकर्ता को हर प्रकार की स्वतत्रता रहती है। वह बिना साक्षात्कार-अनुसूची के साक्षात्कार कर सकता है, प्रश्नों को किसी भी क्रम के अनुसार या बिना क्रम के आगे पीछे पूछ सकता है। प्रश्नों का पूर्व-निर्धारित होना आवश्यक नहीं होता।

3. उत्तरदाताओं की संख्या के आधार पर: -

• व्यक्तिगत साक्षात्कार : - इसमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से वार्तालाप करता है और उसके द्वारा जानकारी एकत्रित करता है। साक्षात्कारकर्ता एक के बाद दूसरा प्रश्न पूछता जाता है और उत्तरदाता बारी-बारी से उनका उत्तर देता जाता है। प्रत्येक प्रश्न से साक्षात्कार करवाने वाले व्यक्ति को प्रेरणा मिलती जाती है। एक समय में एक ही व्यक्ति से साक्षात्कार किया जाता है। अतः इस प्रकार की पद्धति की कुछ विशेषताएँ स्पष्टतया प्रकट होती हैं -

1. अन्य पद्धतियों की तुलना में इससे अधिक सही जानकारी प्राप्त होती है क्योंकि साक्षात्कारकर्ता उत्तरदात्ता के गलत उत्तरों को ठीक कर सकता है और जानबूझ कर दिए गए झूठे उत्तरों की जांच भी कर सकता है।

2. साक्षात्कार अनुसूची के सभी प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने के लिए साक्षात्कारकर्ता दुबारा या कई बार उत्तरदात्ता के पास जा सकता है और प्रत्येक बार की भेंट उसके अध्ययन के लिए उपयोगी सामग्री संग्रहित करने में योग दे सकती है।

3. जिन प्रश्नों के बारे में उत्तरदात्ता संवेदनशील हो सकता है उनको साक्षात्कारकर्ता व्यक्तिगत साक्षात्कार में कोमलतापूर्वक प्रस्तुत कर सकता है। अन्य शब्दों में एक कोमल स्थिति इस प्रकार के साक्षात्कार में अच्छी तरह से उपयोग में ली जा सकती है।

4. अनुसूची में कठिन भाषा में बनाए गए प्रश्नों को साक्षात्कारकर्ता सरल शब्दों में स्पष्ट कर सकता है। अतः उनका त्रुटिपूर्ण अर्थ समझ लिए जाने का भय जाता रहता है। 

इन विशेषताओं के साथ ही व्यक्तिगत साक्षात्कार की कुछ सीमाएं भी हैं। आवागमन के व्यय के कारण यह पद्धत्ति बड़े क्षेत्र के अध्ययन में नहीं चल पाती। मानवीय समीकरण अर्थात् रागद्वेष प्राप्त उत्तरों को अस्त-व्यस्त कर सकता है अथवा व्यक्तिगत साक्षात्कार के कारण अभिन्नति का प्रवेश हो सकता है। इसके अतिरिक्त इस प्रकार के साक्षात्कार के लिए साक्षात्कारकर्ताओं के चुनाव, प्रशिक्षण और निरीक्षण की व्यवस्था जटिल तथा कठिन हो जाती है।

• सामूहिक साक्षात्कार:- यह बहुत बड़ी सीमा तक व्यक्तिगत साक्षात्कार की कमियों को दूर करता है। अध्ययनकर्ता एक स्थान में व्यक्तियो के समूह से मिलता है और अपने प्रश्नों को बारी-बारी से उचित समय के अन्तर से पूछा जाता है और सभी के सभी व्यक्तियो को उनका उत्तर देने के लिए प्रेरित करता है। एक व्यक्ति उत्तर देता है, समूह के अन्य व्यक्ति या तो उसके अनुमोदन में सिर हिलाते हैं या भावाकृतियां या बातें करते हैं अथवा उसके विरोध में चुनौतीपूर्ण तथ्य सम्मुख लाते हैं। इस प्रकार एक वाद-विवाद सभा का स्वरूप उपस्थित हो जाता है और साक्षात्कारकर्ता को वास्तविक तथ्यों को चुनने, एकत्रित करने के लिए पर्याप्त अवसर मिल जाता है। बड़े क्षेत्र में शीघ्रतापूर्वक, कम व्यय, कम समय और कम प्रयास में अधिक तथ्यों की खोज करने के लिए यह पद्धति प्रयोग में लाना उचित रहता है।

4. अध्ययन पद्धति के आधार पर: -

• गैर-निर्देशित साक्षात्कार:- इसमें कोई निश्चित साक्षात्कार अनुसूची नहीं होती। साक्षात्कारकर्ता अपनी इच्छानुसार प्रश्नों को पूछने के लिए स्वतन्त्र होता है। साक्षात्कारकर्ता किसी प्रश्न के रूप में उत्तरदाता के सम्मुख कोई चुनौती देने वाली परिस्थिति या समस्या रख सकता है और उत्तरदाता उसके समाधान के लिए अपनी ओर से लम्बे अथवा संक्षिप्त विवरण के रूप में अथवा कहानी या स्वयं अनुभव की कहानी के रूप में अपना उत्तर स्वतन्त्रतापूर्वक प्रस्तुत करता है। साक्षात्कारकर्ता उसको बीच-बीच में अन्य प्रश्नों द्वारा नहीं टोकता। एक प्रश्न का जब उत्तरदाता पूर्ण उत्तर अपनी ओर से दे चुकता है, तब ही साक्षात्कारकर्ता अपन अगला प्रश्न रखता है, लेकिन प्रायः ऐसे साक्षात्कार में उत्तरदाता या साक्षात्कारकर्ता दोनों के लिए साक्षात्कार के मूल प्रसंग से इधर-उधर भटक जाने की आंशका बनी रहती है। ऐसा साक्षात्कार मनोवैज्ञानिक अध्ययनो अथवा एकल विषय अध्ययनो के लिए विशेषकर उपयोगी रहता है।

• केन्द्रित साक्षात्कार:- इसकी प्रणाली का उपयोग सर्वप्रथम रोबर्ट मर्टन ने किया था। इस पद्धति के साक्षात्कार का मूल उद्देश्य प्राक्कल्पना के उस औचित्य का परीक्षण करना है। जिसकी प्रतिस्थापना मानव व्यवहार की पूर्व विश्लेषित अवस्था के आधार पर हुई हो। यह साक्षात्कार इस मान्यता पर आधारित है कि यद्यपि वैयक्तिक अनुभूतिपरक धारणाओं के सूक्ष्म स्वरूप की प्राप्ति संभव है लेकिन इसमें संबंधित स्थिति का पूर्ण विश्लेषण करना अत्यन्त आवश्यक है। ऐसे साक्षात्कार पूर्व विश्लेषित स्थितियों के ऊपर ही केन्द्रित रहते हैं। साक्षात्कारकर्ता साक्षात्कार से पहले यह प्रयास करता है कि किसी न किसी तरह से साक्षात्कार के प्रंसग को उत्तरदाताओं के मस्तिष्क में तरोताजा रूप में प्रविष्ट किया जाए ताकि वे उससे प्रेरणा पाकर समस्या के विषय में चिंतन कर सकें और जब उनसे उसी समय या कुछ समय बाद में साक्षात्कार किया जाये तो वे साक्षात्कारकर्ता को अपने विचार भली भांति प्रकट कर सकें।

• पुनरावृत्ति साक्षात्कार:- इसके अन्तर्गत एक से अधिक बार साक्षात्कार किया जाता है। कुछ सामाजिक परिवर्तनों अथवा सामाजिक समस्याओं की प्रकृति इस प्रकार की होती है कि वे एक बार अध्ययन से ही पूर्णतया स्पष्ट नहीं होती, उन पर अधिकार प्राप्त करने के लिए बार-बार साक्षात्कार करना आवश्यक होता है। उदाहरणार्थ, आय से आर्थिक संतुष्टि, और जीवन स्तर, आदि विषय इसी प्रकार के हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की आर्थिक संतुष्टि और जीवन स्तर की अवस्थाओं में समय - समय पर अन्तर आता रहता है। इस प्रकार के साक्षात्कार किसी विशेष व्यवहार के प्रतिमान या सामाजिक स्थिति का निर्धारण करने वाले सामाजिक अथवा सामाजिक-मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया के विशिष्ट विकास को जानने में उपयोगी होते हैं।

5. रचना के आधार पर: -

• संरचित साक्षात्कार: - इस प्रकार के साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता व्यवस्थित रूप से पूर्व निर्मित अनुसूची अथवा प्रश्नावली की सहायता से साक्षात्कार लेता है। यह व्यक्तिगत व सामूहिक दोनो रूपों में किया जा सकता है। इसे नियंत्रित साक्षात्कार भी कहा जाता है।

• असंरचित साक्षात्कार:- इस साक्षात्कार में साक्षात्कार की योजना पूर्व निर्धारित नहीं होती है और इसके लिए पहले से ही अनुसूची या प्रश्नावली का निर्माण नहीं होता है। इस प्रकार के साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता अनुसंधान स्थल पर ही परिस्थितियों के अनुसार प्रश्नों का निर्माण कर साक्षात्कारदाता से तथ्य एकत्र करता है। इसमें प्रश्नों की भाषा, क्रम, विधियों आदि की व्यवस्था पहले से नहीं की जाती है। इस साक्षात्कार को भी व्यक्तिगत-सामूहिक दोनो प्रकार से काम में लिया जा सकता है। इसे अनिंयत्रित साक्षात्कार भी कहते है।

प्रस्तुत शोध में असंरचित साक्षात्कार का प्रयोग किया गया है।

असंरचित साक्षात्कार के प्रयोग का औचित्य 

प्रस्तुत शोध में असंरचित साक्षात्कार के प्रयोग का निम्नलिखित औचित्य है -

1. भूगोल विषय के विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के अध्ययन ।

2. विद्यार्थियों की निम्नलिखित चरों के आधार पर तुलना करना।

(अ) प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता, 

(ब) कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता, 

(ब) पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता, 

सम्पूर्ण न्यादर्श में से 10 प्रतिशत विद्यार्थियों को साक्षात्कार हेतु चुना जिसमें से 5 प्रतिशत भूगोल विषय के सरकारी विद्यालय तथा 5 प्रतिशत निजी विद्यालय के विद्यार्थियों को सम्मिलित किया गया हैं।

3.9. न्यादर्श

अनुसंधान कार्य को सम्पन्न करने एवं तथ्यों को एकत्रित करने हेतु आदर्श न्यादर्श का चयन किया जाना आवश्यक हैं। न्यादर्श किसी भी अनुसंधान कार्य की आधार शिला होता हैं। यह आधार शिला जितनी सुदृढ़ होगी अनुसंधान के परिणाम उतने ही विश्वसनीय एवं परिशुद्ध होगें। न्यादर्श को सामाजिक अनुसंधानों में वैज्ञानिक रूप प्रदान करनें का श्रेय ‘रडले तथा जान सान’ को जाता हैं उन्ही प्रयासों से सामाजिक अध्ययनो में न्यादर्श का चयन वैज्ञानिक रूप से किया जाने लगा हैं।

अनुसंधान कार्य को करने तथा तथ्यों के सत्यापन हेतु मुख्यतः दो विधियों का उपयोग किया जाता हैं।

1. जनगणना पद्धति या समग्र अध्ययन 

2. न्यादर्श पद्धति 

जनगणना पद्धति के अन्तर्गत संबंधित विषय में आने वाली सभी ईकाइयों के अध्ययन एवं अवलोकन के आधार पर निष्कर्ष ज्ञात किये जाते हैं परन्तु न्यादर्श पद्धति के अन्तर्गत हम कुछ ऐसी विधियों का प्रयोग करते हैं जो समय या जनसंख्या में से चुना हुआ कुछ भाग होता हैं तथा वह भाग उस सम्पूर्ण या समग्र का उचित व सही प्रतिनिधित्व करता हैं । प्रायः जनगणना पद्धति का अनुसंधान में उपयोग करना असंभव होता है अतः हम न्यादर्श का उपयोग करते हैं इसके चयन के कारण समय व धन दोनो की बचत होती हैं परन्तु साथ ही आर्थिक व अच्छे ढंग से विश्लेषण अध्ययन भी संभव होता हैं।




3.9.1 न्यादर्श की परिभाषाएँ

न्यादर्श अथवा न्यादर्श पद्धति की विभिन्न विद्धानों ने अपने शब्दों में व्याख्या की है जो कि मुख्य परिभाषाओं के रूप में निम्न प्रकार से वर्णित हैं जिनमें से कुछ मुख्य परिभाषाएँ अंग्राकित हैं-

1. गुड व हाँट के अनुसार: -

‘‘एक न्यादर्श जैसा कि नाम से स्पष्ट हैं एक विस्तृत समूह का अपेक्षाकृत छोटा प्रतिनिधि हैं ।’’

2. फैक याटन के शब्दों में: -

‘‘न्यादर्श शब्द का प्रयोग किसी समग्र की ईकइयों के एक सेट या भाग के लिए किया जाना चाहिए जिसे इस विश्वास के साथ चुना गया हैं कि यह समय का प्रतिनिधित्व करेगा।’’

3. क्रोगाइस के अनुसार: -

‘‘न्यादर्श एक पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार ईकाइयों के एक समूह में से एक निश्चित प्रतिशत का चुनाव हैं ।’’

4. राम एवं भटनागर के शब्दों में: -

‘‘जनसंख्या में से किसी का विशिष्ट मान ज्ञात करने के लिए उसकी कुछ ईकाइयों को चुन लिया जाता हैं ईकाइयों को चुनने की इस प्रक्रिया को न्यादर्श पद्धति तथा चुनी हुई ईकाइयों को न्यादर्श कहते हैं।’’

3.9.2 अनुसंधान मे न्यादर्श का स्थान

अनुसंधान में न्यादर्श का महत्वपूर्ण स्थान हैं तथा इसकी बहुमूल्य उपयोगिता हैं। अनुसंधान में अधिकांश परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं। जिनमे हमे केवल न्यादर्श के आधार पर विश्वसनीय निष्कर्ष निकाल सकते है बशर्तें कि न्यादर्श का चयन वैज्ञानिक ढंग से किया गया हो। अधिकतर अनुसंधान परिस्थितियों के निष्कर्ष निकालने के लिए केवल प्रतिदर्श को लेना न केवल प्रर्याप्त होता हैं बल्कि समष्टि के समस्त सदस्यों का अध्ययन करना अनावश्यक क्रिया होती हैं। न्यादर्श के आधार पर प्राप्त निष्कर्ष समष्टि के समस्त सदस्यों के आधार पर निष्कर्षो से बहुत भिन्न नही होते हैं इस प्रकार अधिकतर परिस्थतियों मे हम न्यादर्श विधि के द्वारा निष्कर्ष निकाल सकते हैं।

3.9.3 न्यादर्श के उद्देश्य

1. समस्त समष्टि के आधार पर कुछ गिनी हुई ईकाइयों का ही अध्ययन करना।

2. अल्प समय मे परिणाम जानने की क्षमता प्रदान करना।

3. कम खर्च व आवश्यक सूचना प्रदान करना।

4. निष्कर्ष से परिशुद्धता तथा यथार्थता के स्तरों के प्रतिस्थापित करना।

5. इसके द्वारा अल्प समय में परिणाम जानने की अभिक्षमता प्रदान की जाती हैं।

6. इसके द्वारा प्रतिचयन प्रसरण को कम किया जा सकता हैं।

3.9.4 न्यादर्श के महत्व एवं गुण

1. समय की बचत:- न्यादर्श विधि के अन्तर्गत कुछ चयनित इकाइयों का अध्ययन किया जाता हैं। अतः यह स्वभाविक हैं कि जनगणना या समग्र के अध्ययन के पद्धति मे जहाँ सम्पूर्ण समग्र का अध्ययन करने मे बहुत सा समय एवं श्रम व्यर्थ चला जाता हैं। वहा न्यादर्श प्रणाली द्वारा वास्तविक समय की बचत होती हैं। न्यादर्श द्वारा प्राप्त परिणाम समूह के समस्त सदस्यों के अध्ययन के आधार पर प्राप्त परिणाम से भिन्न नही होते हैं। अतः अनुसंधानकर्ता न्यादर्श विधि अपना कर समय एवं श्रम की बचत कर सकती हैं इस प्रकार की प्रणाली पद्धति को अपना कर शोधकर्ता अपने शोध समय का सदुपयोग कर सकता हैं।

2. धन की बचत: - न्यादर्श प्रणाली के अन्तर्गत जब कुछ ईकाइयों का ही अध्ययन करना होता हैं । तो उस पर किया गया खर्च अधिक नही होता हैं। इस पद्धति के प्रयोग मे आने से धन की बचत अपेक्षाकृत अधिक होती हैं।

3. अधिक गहन अध्ययन की संभावना: - न्यादर्श विधि द्वारा हम सम्पूर्ण समूह का अध्ययन कर उसके गहन अध्ययन में हम अधिक समय लगा सकते हैं। अतः न्यादर्श द्वारा प्राप्त परिणाम अधिक सम्पन्न हो सकते हैं।

4. प्रबन्ध की सुविधा: - न्यादर्श पद्धति के अन्तर्गत कम ईकाइयों का अघ्ययन करना होता हैं । अतः अधिक संख्या में कार्यकर्ताओं की नियुक्ति करने की आवश्यकता नही होती हैं और दूसरी बात कुछ ही लोगों से सूचना प्राप्त करनी पडती हैं अतः साधन भी आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं । सूचना के मिलने मे भी देरी व असुविधा नही रहती हैं। कहने का तात्पर्य हैं कि जिन चयनित ईकाइयों का अध्ययन किया जाता हैं, उस संबंध मे प्रबन्ध इतना जटिल एवं व्यापक नही होता सम्पूर्ण सर्वेक्षण आसान एवं सुविधाजनक होता हैं ।

5. आकड़ों के संकलन में अधिक विश्वसनीयता एवं परिशुद्धता होती हैं।

3.9.5 न्यादर्श के चयन मे सावधानियाँ

1. न्यादर्श समष्टि का सही अर्थो में प्रतिनिधित्व करने वाला होना चाहिए ।

2. न्यादर्श का आकार न अधिक बड़ा और न ही अधिक छोटा होना चाहिए अपितु पर्याप्त होना चाहिए।

3. न्यादर्श चयन से पूर्व चयन विधि की उपयुक्त पर सभी दृष्टीकोण से विचार कर लेना चाहिए।

3.9.6 न्यादर्श की विधियाँ 

न्यादर्श की विधियों को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता हैं।

1. सम्भाव्य न्यादर्श 

2. असम्भाव्य न्यादर्श 

(अ) सम्भाव्य न्यादर्श (Probability Sampling)

संम्भाव्य न्यादर्श एक वैज्ञानिक विधि हैं। जिसका चयन इस प्रकार किया हैं कि प्रत्येक इकाई के चुने जाने की संभावना रहती हैं, इसके लिए यह मान कर चला जाता है कि जो विशेषताएँ जनसंख्या में विद्यमान है वही प्रतिदर्श में भी विद्यमान होनी चाहिए।

सम्भाव्य न्यादर्श भी कुछ प्रकार के होते हैं जो कि प्रमुख निम्नलिखित हैं -

1. याद्धच्छिक न्यादर्श (Simple Random Sample)

यादृच्छिक न्यादर्श विधि न्यादर्श चुनने की वह विधि है जिस द्वारा केवल कुछ सदस्य चुने जाते हैं यद्यपि संभावित सभी प्रतिदर्शों में से निर्धारित सदस्यों के चुने जाने की सम्भावना रहती हैं। यादृच्छिक न्यादर्श निम्नलिखित तीन विधियों से किया जाता है-

(क) संख्या तालिका द्वारा: - सांख्यिकी शब्दों ने कुछ यादृच्छिक तालिकाएँ बना रखी है इस विधि में सभी विद्यार्थियों में से न्यादर्श का चुनाव एक के बीच की यादृच्छिक संख्याओं की तालिका में से किया जाता है। इससे पूर्वाग्रह कम रहता है।

(ख) प्रत्येक वें सदस्य को चुनकर यादृच्छिक न्यादर्श: - इस विधि में समष्टि के सदस्यों को एक से अंत तक क्रमांक दिये जाते हैं तथा प्रत्येक पाँचवें सदस्य को न्यादर्श में शामिल कर लिया जाता है।

(ग) दैव निर्देशन विधि द्वारा: - इस विधि में समष्टि के सब सदस्यों को 1 से 10 तक क्रमांक देकर उन्हें एक कागज की चिट्ठी पर लिखकर गोली बना ली जाती है। प्रतिदर्श में जितने सदस्य रखने होते हैं उतनी गोलियाँ निकाल ली जाती हैं।

2. स्तरित याद्धच्छिक न्यादर्श (Stratified Random Sample)

यह वह विधि है जो विभिन्न आकारों के उपसमूहों व स्तरों से निर्मित जनंसंख्या में न्यादर्श का चुनाव करने में उपयुक्त प्रतिनिधित्व का निर्धारण करती है। इस प्रविधि को तब काम में लिया जाता है जब समष्टि में विभिन्नता व आकार बड़ा होता है। ऐसी स्थिति में समष्टि को विभिन्न समूहों में बाँट कर प्रत्येक में से अलग - अलग न्यादर्श चुन लिए जाते हैं।

3. बहुस्तरीय या गुच्छ न्यादर्श (Cluster Sample)

यह विधि यादृच्छिक व सोद्देश्य न्यादर्श विधि का सम्मिलित रुप है। इसमें पहले सोद्देश्य विधि को अपनाकर समग्र को कई सजातीय वर्गों में विभाजित कर लिया जाता है। तत्पश्चात् यादृच्छिक विधि का प्रयोग कर प्रत्येक वर्ग से निश्चित वास्तविक ईकाइयों का चयन किया जाता है।

(ब) असम्भाव्य न्यादर्श (Non-Probability Sampling)

असम्भाव्य न्यादर्श में न्यादर्श का चुनाव करते समय किसी स्तर पर शोधकर्ता अपनी इच्छा का उपयोग करता हैं इस कारण समग्र की ईकाइयों की न्यादर्श में सम्मिलित होने की गणना नही की जा सकती हैं। इस पद्धति में अनुसंधानकर्ता अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु वृद्धि या इच्छानुसार न्यादर्श का चयन करता हैं न कि याद्वच्छिक पद्धति से। असम्भाव्य न्यादर्श तीन प्रकार के होते है-

1. उद्देश्य न्यादर्श (Purposive Sampling)

2. पुंज न्यादर्श (Quota Sampling)

3. आकस्मिक न्यादर्श (Accidental Sampling)

1. उद्देश्य न्यादर्श (Purposive Sampling)¬: - जब अनुसंधानकर्ता सम्पूर्ण में से किसी विशेष उद्देश्य से कुछ ईकाइयों को न्यादर्श के रूप में चयनित करता हैं तो उसे उद्देश्य पूर्ण समायोजन प्रणाली कहा जाता हैं।

जहादा तदाकुक के अनुसार:- 

‘‘उद्देश्यपूर्ण न्यादर्श के पीछे राह आधारभूत मान्यता होती हैं कि उचित निर्णय तथा उपयुक्त कुशलता के साथ शोधकर्ता न्यादर्श में सम्मिलित करने हेतु इन मामलों को चुन सकता हैं तथा इस प्रकार ऐसे न्यादर्श का विकास कर सकता हैं जो उसकी आवश्यकताओं कें अनुसार सन्तोष जनक हैं ।’’

    इस प्रकार सप्रयोजन या उद्देश्य पूर्ण न्यादर्श में शोधकर्ता समग्र में से एक या अधिक गुच्छे चुनती हैं किन्तु याद्धच्छिक ढंग से नही अपितु यह विचार करके कि यह गुच्छे या समूह से हमें आबादी का ठीक प्रतिशत मिल जायेगा क्योंकि इसकें सभी प्रकार के अंश उपस्थित हैं या उचित अनुपात में हैं तथा जिसकी सांख्यिकी जानकारी पहले से ही हैं।

2. पुंज न्यादर्श (Quota Sampling): - इस विधि मे केवल समूहो तथा वर्गों को चुना जाता है एवं उनमें जों भी सदस्य होते है वे इसी न्यादर्श के भाग बन जाते है। 

3. आकस्मिक न्यादर्श (Accidental Sampling): - इसमें न्यादर्श चयन की कोई पूर्व - योजना नही होती न कोई समाविष्ट संदर्भ होता है और न ही कोई ईकाइयों की सूची, जो जहाँ मिल गया उसी से शोध सामग्री प्राप्त कर ली जाती है।

प्रस्तुत अनुसंधान में भूगोल विषय के विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के अध्ययन के लिए यादृच्छिक न्यादर्श विधि का चयन किया गया हैं।


3.9.7 प्रस्तुत अध्ययन में न्यादर्श का चयन

इस अध्ययन के लिए निम्न प्रकार से न्यादर्श का चयन किया गया-

क्र.स. जिलें राजकीय विद्यालय निजी 

विद्यालय कुल

1 जोधपुर 100 100 200

2 पाली 100 100 200

3 बाड़मेर 100 100 200

4 सिरोही 100 100 200

5 जैसलमेर 100 100 200

6 जालौर 100 100 200

कुल 600 600 1200

अनुसंधान कार्य करने के लिए दत्त संकलन हेतु चयनित न्यादर्श का आकार इतना छोटा नही हो कि उससे प्राप्त निष्कर्ष अविश्वसनीय हो बल्कि आकार कम से कम इतना बड़ा हो कि न्यादर्श समष्टि का पूर्ण रूपेण प्रतिनिधित्व कर सके। 

प्रस्तुत शोधकार्य में दत्त संकलन हेतु जोधपुर, पाली, बाड़मेर, सिरोही, जैसलमेर एवं जालौर के विद्यालयों के विद्यार्थियों को यादृच्छिक न्यादर्श विधि चुना गया हैं जोधपुर, पाली, बाड़मेर, सिरोही, जैसलमेर एवं जालौर के विद्यालयों के कुल 1200 विद्यार्थियों का न्यादर्श लिया गया हैं।

3.10. अनुसन्धान में प्रयुक्त सांख्यिकी

किसी भी शोध में दत्त संकलन मात्र से शोधकार्य का महत्व नही हो जाता। जब तक कि दत्त संकलन का विश्लेषण उपयुक्त सांख्यिकी विधियों द्वारा न किया जाये। एकत्रित सूचनाओं एवं संकलित तथ्यों का विश्लेषण कर व्याख्या की जाती है तभी वह शोध उद्धेश्य पूर्ण व उपयोगी होती हैं।

प्रस्तुत अनुसंधान में भूगोल विषय के विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के अध्ययन के परीक्षण से प्राप्त आकडों के विश्लेषण अर्थापन हेतु निम्नलिखित सांख्यिकी विधियों का प्रयोग किया गया हैं-

1. मध्यमान 

2. प्रमाप विचलन 

3. ‘टी’ परीक्षण

1. मध्यमान: - यह समान्तर माध्य या औसत होता है जो कि मूल प्राप्ताकों द्वारा ज्ञात किया जाता हैं। मध्यमान की गणना निम्न सूत्र द्वारा की गई हैं-

  

X      = मध्यमान (MEAN)

A.M. = कल्पित मध्यमान (Assumed mean)

Σfd    = कल्पित मध्यमान से विचलन का आवृतियों से गुणनफल का योग

C.I.   = वर्गान्तर का आकार (Class Interval)

परीक्षण से प्राप्त आकडों का मध्यमान उपरोक्त सूत्र से ज्ञात किया गया हैं।

2. प्रमाप विचलन: -

प्रस्तुत अनुसंधान में प्रमाप विचलन की गणना से मूल प्राप्तांको की दूरी या विचलन को ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया गया है प्रमाप विचलन ज्ञात करने का सूत्र निम्नलिखित है -

  

 = प्रमाप विचलन 

N = विद्यार्थियों की संख्या

CI = वर्गान्तर का आकार

Fd = कल्पित माध्य से आवृतियों का विचलन x आवृतियों का योग

Fd 2= विचलन का वर्ग x आवृतियों का योग

3. ‘t’ परीक्षण:-

प्रस्तुत अनुसंधान में अंको के मध्यमान के मध्य अन्तर की सार्थकता की जाँच करने हेतु ‘t’ परीक्षण का उपयोग किया गया है। जिसका सूत्र निम्नलिखित है-

  

‘t’ = टी मान

M1= प्रथम समूह का मध्यमान

M2= द्वितीय समूह का मध्यमान

SD1= प्रथम समूह का मानक विचलन

SD2= द्वितीय समूह का मानक विचलन

N1= प्रथम समूह के विद्यार्थियों की संख्या

N2= द्वितीय समूह के विद्यार्थियों की संख्या


3.11. उपसंहार

तृतीय अध्याय में शोधकर्ता द्वारा अनुसंधान में अपनाई गई विधि, उपकरणों एवं न्यादर्श का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। 

प्रस्तुत अध्याय में अध्ययन हेतु अपनाई गई विधि, सर्वेक्षण प्रक्रिया, सर्वेक्षण की विशेषताएँ, औचित्य आदि का उल्लेख किया गया है। इस अध्ययन में उपकरण का विवरण प्रस्तुत किया गया है। दत्त संकलन हेतु प्रमापीकृत तथा अप्रमापीकृत उपकरणों के प्रयोग का विवरण तथा सांख्यिकी विवरण प्रस्तुत किया गया है तथा अंत में अनुसंधान हेतु चयनित न्यादर्श, न्यादर्श की परिभाषा, उद्देश्य, विशेषताएँ, महत्त्व तथा न्यादर्श चयन प्रक्रिया का वर्णन किया गया है।

चतुर्थ अध्याय में अनुसंधान से संबंधित आकड़ों का विश्लेषण व व्याख्या प्रस्तुत की गई हैं।














चतुर्थ अध्याय - तथ्यों का विश्लेषण एवं व्याख्या


4.1 प्रस्तावना

किसी अनुसंधान कार्य में दत्तो का संकलन कर लेने से ही अभिष्ठ लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं हो सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि प्राप्त दत्तो की समस्या के संदर्भ में विश्लेषण करके अर्थ पूर्ण व्याख्या प्रस्तुत की जाये। विश्लेषण के आधार पर ही शोध उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि दत्तो की शोध समस्या सन्दर्भ में विश्लेषण तथा व्याख्या की जाये।

प्रख्यात फ्रेंन्स गणित शास्त्री प्वाय केयक:-

‘‘जो शोध कार्य के प्रतिफल निर्माण की समस्याओं से भली-भाति परिचित होता हैं। वह अपने तथ्य के विश्लेषण मे कठिनाई अनुभव नही करते।’’

गुड व हैट:-

‘‘आकड़ों को हिला देने की शक्ति आकड़ों में नहीं परन्तु भावनाओं की प्रबलताओ मे हैं परन्तु इस शक्ति का प्रयोग संसार में सही मार्ग पर चलाने के लिये करना हैं तो उसका ऑकडों से निर्देशित होना अनिवार्य हैं। ‘‘

4.1.1 अर्थ एवं आवश्यकता 

अनुसंधान के लिए उपयुक्त तथ्यों का संकलन एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है परन्तु मात्र तथ्य संकलन होने से उद्धेश्य की पूर्ति नही होती अतः सबसे महत्वपूर्ण कार्य हैं तथ्यों को सुव्यवस्थित करके उनका विश्लेषण करना तथ्यों का विश्लेषण किये बिना ही उसके अनुसंधान कार्य का वास्तविक उपयोग सच्चे अर्थों में अधूरा ही रहेगा अतः अनुसंधान कार्य को पूर्ण एवं सार्थक बनाने के हेतु तथ्यों के संकलन के साथ उनका व्यवस्थित रूप से विश्लेषण करना आवश्यक हैं।

प्रायः संकलित किये गये तथ्य अपने प्रारम्भिक रूप मे बडे ही जटिल असंबंध तथा बिखरे हुए होते हैं इसे सार्थक बनाने तथा विश्लेषण करके किसी निष्कर्ष पर पहुचने से पूर्व उसे एक निश्चित रूपरेखा प्रदान करना आवश्यक रहता हैं। उचित विवेचना के लिए आवश्यक हैं कि पहले उस सामग्री को  सुसंगठित किया जाये। यह सुव्यवस्थित करने की प्रक्रिया हैं इस प्रकार किसी प्रक्रिया में तथ्यों का संपादन, वर्गीकरण, संकलन एंव सारणीयन सम्मिलित हैं। इस प्रकार किसी घटना या स्थिति के कार्य-कारणों के संबन्धों को जानने हेतु तथ्यों का विश्लेषण करना आवश्यक हो जाता हैं।

श्री मती पी. वी. यंग के अनुसार:- 

‘‘वैज्ञानिक विश्लेषण की यह धारणा हैं कि एकत्र तथ्यों से कही अधिक महत्वपूर्ण व भेद खोलने वाली बात और भी कुछ हैं यदि सुव्यवस्थित तथ्यों का सार अध्ययन से जोडा जाये तो उनका एक महत्व व अर्थ प्रकट हो सकता हैं, जिसके द्वारा प्रमाणित व्याख्याएँ निकाली जा सकती हैं।’’

इन्ही तथ्यों को ध्यान मे रख कर प्रस्तुत शोध मे तथ्यांकन सामग्री को सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करने तथा उसका विश्लेषण एवं व्याख्या करने का प्रयास किया हैं।

4.1.2 तथ्यों के विश्लेषण की प्रक्रिया

विश्लेषण कार्य जितना सरल समझा जाता हैं। उतना सरल कार्य नही हैं इसकी सफलता, विश्लेषणकर्ता के गुण एवं योग्यता पर अधिक निर्भर करते हैं। एक अच्छा विश्लेषणकर्ता एक अयोग्य प्रशासक सिद्ध हो सकता हैं और एक कुशल प्रशासक एक अयोग्य विश्लेषणकर्ता सिद्ध हो सकता हैं।

अतः विश्लेषण का संबंध हमारे आन्तरिक गुणों से हैं। क्या अनुसंधानकर्ता की अन्तदृष्टि गहन है? क्या उसके व्यक्तिगत गुण स्पष्ट परिलक्षित है? क्या उसकी अनुभूति शक्ति श्रेष्ठ है? क्या उसमे बौद्धिक शिष्टता का गुण हैं? तात्पर्य यह हैं कि विश्लेषणकर्ता का अनुभव सबसे अधिक सहायक हैं।

विश्लेषण प्रक्रिया की आवश्यक शर्त निम्नलिखित हो सकती हैं-

1. आलोचनात्मक कल्पना शक्ति की आवश्यकता हैं जिससे सब तथ्यों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जा सकता हैं।

2. आलोचनात्मक परीक्षण की क्षमता की आवश्यकता हैं इस क्षमता के अभाव में अनुसंधानकर्ता कल्पना जगत मे ही उड़ान भरता रहेगा जिससे वैज्ञानिक पथ निर्बल होता जायेगा।

3. विश्लेषण करते समय यह ध्यान रखना चाहिए की विश्लेषणकर्ता की कल्पना रचनात्मक होनी चाहिए। विश्लेषण को केवल आदर्श और कृत्रिम कल्पनाओं के सहारे तथ्यों का विश्लेषण नही करना चाहिए।

4. विश्लेषणकर्ता का दृष्टीकोण पक्षपातहीन होना चाहिए ताकि सही एवं विश्वसनीय विश्लेषण संभव हो सके।

अंतः यह कहा जा सकता हैं कि दत्त अर्थात् तथ्यों का विश्लेषण शोधकर्ता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं। जिसके अन्तर्गत जटिल कारकों का खंडित करके सरल अंकों में समायोजित करना होता हैं शोधकर्ता को विश्लेषण की प्रक्रिया से पूर्व कई आवश्यक उपक्रियाए सम्पन्न करनी पडती हैं जिनके आधार पर ही वस्तुनिष्ट विश्लेषण संभव हो पाता हैं इन उपक्रियाओं में तथ्यों का सम्पादन, तथ्यों का वर्गीकरण, तथ्यों का संकलन तथा तथ्यों का सारणीयन महत्वपूर्ण हैं।




4.1.3 तथ्यों का सम्पादन 

शोधकार्य मे प्रयुक्त संकलित तथ्यों का सूक्ष्म अन्वेषण करना ही तथ्यों का सम्पादन कहलाता हैं।

सूचनादाताओं के परीक्षणों से जो प्रश्नावलियाँ एवं अनुसूचियाँ प्राप्त होती हैं उनका सम्पादन करना अनिवार्य होता हैं। सम्पादन का मुख्य अभिप्राय यह हैं कि तथ्यों की विसंगतिया, संदेह, गलतियों एवं अपूर्णताओं का बारीकि से निरीक्षण करना हैं ताकि अशुद्ध निष्कर्ष से बचा जा सके। यह सम्पादन कार्य वर्णमाला क्रम व भौगोलिक परिस्थियों के आधार पर किया जा सकता हैं। अनुसंधानक के अनुकूल हैं या प्रतिकूल, यदि प्रतिकूल अनावश्यक हैं तो उसे तथ्य सामग्री के स्थान पर नही रखना चाहिए। यदि वह स्वयं गलतियों को सुधार सकता हैं। जिसमे सूचनादाता की आवश्यकता नही रहती हैं तो उसी समय सुधार कर देना चाहिए साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मौलिक विवरण मे किसी प्रकार का अंतर नही आना चाहिए। मौलिक तथ्यों को तोडना मरोडना नही चाहिए। संकलन कार्य को आसान बनाने के लिए तथ्य सामग्री व्यवस्थित होनी चाहिए। तथ्यों मे विश्वसनीयता जाँचने हेतु उनका परीक्षण भी कर लेना चाहिए।

4.1.4 तथ्यों का वर्गीकरण 

तथ्यों का सम्पादन तथा उसकी अविश्वसनीयता एवं उपयुक्तता की जाँच करने के पश्चात् उनका वर्गीकरण किया जाता हैं आकड़ों को प्रदर्शन योग्य बनाने हेतु वर्गीकरण आवश्यक हैं वर्गीकरण की प्रक्रियाऐ प्रारम्भिक सामग्री को दो या दो से अधिक वर्गों में प्रदर्शित किया जाता हैं। वास्तव मे देखा जाये तो तथ्यों को एक से अधिक वर्गों मे विभाजित किये बिना न तो विश्लेषण संभव है और न ही कोई वैज्ञानिक अनुसंधान। इसमें शोधकार्य के विश्लेषण एवं प्रक्रिया मे सरलता के साथ वैज्ञानिकता के गुणों का भी समावेश हो जाता हैं। 

एफ. एन. करलिंजर के अनुसार:-‘‘संकेतीकरण वह पद हैं जिसमे कि प्रश्नों के प्रत्युत्तरों तथा सूचनादाताओं द्वारा प्राप्त सूचना को विशिष्ट संवेगों में इस उद्देश्य के साथ प्रस्तुत करना हैं ताकि उनका विश्लेषण प्रस्तुत किया जा सके।’’

‘‘वर्गीकरण तथ्यों को उनकी समानता के आधार पर वर्गों तथा समूहों मे क्रमबद्ध करने तथा व्यक्तिगत इकाईयों की विभिन्नता के बीच उपस्थित गुणों की एकात्मकता को प्रकट करने की क्रिया का नाम हैं।’’

वर्गीकरण के उद्देश्य:-

1. जटिल, बिखरी हुई परस्पर असम्बद्ध तथ्यों को थोडे से समझने योग्य, तर्क सम्पन्न समूहों मे रखना।

2. विभिन्न वर्गों की समानता व असमानता को स्पष्ट करना ।

3. दो या दो से अधिक वर्गों के तुलनात्मक अध्ययन की सुविधा प्रदान करना 

4. विशेषताओं को समझने मे मस्तिष्क पर पडने वाले जोर को दूर करना।

5. सूचनाओं को स्मरण योग्य बनाना।

6. विवेचन कार्य को सरल बनाने हेतु ताकि विभिन्न प्रकार की सांख्यिकी मापों जैसे- माध्य विचलन, सह संबंध आदि को जानने की सुविधा हैं।

वर्गीकरण की प्रमुख विशेषताएँ:-

1. तथ्यों का सजातीय समूहों मे विभाजन करना।

2. गुण तथा विशेषताए वर्गीकरण का आधार होते हैं।

3. वर्गीकरण का आधार इकाईयों की विभिन्नता मे एकता हैं।

4.1.5 तथ्यों का संकलन  

तथ्यों के वर्गीकरण के पश्चात् तथ्यों का संकलन करते है इसके लिए शेाध मे प्रयुक्त प्रत्येक वर्ग मे उत्तरों के लिए प्रतीकों का प्रयोग करना पडता है संकेतन वर्णात्मक उत्तरों में अधिक उपयोगी हैं बडे-बडे उत्तरों को संकेतो द्वारा व्यक्त किया जा सकता है।

अतः इस प्रकार संकेतक का मूल उद्देश्य प्राप्त तथ्यों को अर्थ पूर्ण श्रेणियों मे बांटना होता हैं ताकि उनका मूलभूत प्रतिमान निश्चित किया जा सके। अनुसंधान के दौरान जब अनुसूचि या प्रश्नावली की सहायता से तथ्य संकलित किये जाते हैं। जब उनमे बंद व खुले दोनों प्रकार के प्रश्नों के संभावित उत्तर पूर्ण निर्धारित होते हैं। इसलिए उसे पीकोंड प्रश्न भी कहते हैं। इनका संकेत करने मे अनुसंधानकर्त्ता को कोई परेशानी नही होती हैं। वह केवल प्रत्येक संकेत को एक निश्चित संख्या चिन्ह अक्षर आदि कोड के रूप मे प्रदान कर देता हैं।

इसके विपरीत खुले प्रश्नों मे उत्तर अपने तरीके से तथा विस्तार से अपने शब्दों मे देने होते हैं। शोधकर्त्ता को उनका संकेतन करने मे कठिनाई आने लगती हैं इसके लिए वह पहले प्राप्त विस्तृत उत्तरों का संक्षिप्तिकरण करते हैं। फिर वह ऐसे विकल्पों का चुनाव करते हैं जो उनके उत्तरों की अर्थ पूर्ण श्रेणियों मे बांट सके। ये श्रेणिया न तो संख्या मे बहुत अधिक होती हैं और ना ही बहुत कम होती हैं। इसके लिए शोधकर्त्ता को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि एक उत्तर एक ही श्रेणी में आये एक से अधिक श्रेणी में नही। श्रेणियों का निर्धारण करने के बाद प्रत्येक श्रेणी को संकेत (कोड) देना होता हैं ताकि आगे सारणीयन का कार्यक्रम सुगमता से हो सके।

अनुसंधान की प्रक्रिया में तथ्यों का संकलन करने के बाद आगामी प्रयास तथ्यों के संगठन, विश्लेषण एवं व्याख्या तथा संग्रहित की गई सूचनाओं का निष्कर्षों एवं सामान्यीकरण के निरूपण द्वारा अर्थपूर्ण चित्र प्रस्तुत करना है।

‘‘क्रमबद्ध विश्लेषण का कार्य एक ठोस बौद्धिक विचार के एक संगठन का निर्माण करना जो कि एकत्रित तथ्यों को उसके उचित स्थान तथा संबधों में व्यवस्थित करने में सहायक होगा ताकि उससे सामान्य निष्कर्षों को निकाला जा सके।’’

- श्री मती येन


4.1.6 तथ्यों का सारणीयन 

सारणीयन संवर्गीकृत सामग्री को क्रमबद्ध, स्पष्ट, संक्षिप्त व बोधगम्य रूप प्रदान करती है ताकि उसके सांख्यिकीय विश्लेषण व विवेचन में विशिष्ट सुविधा उपलब्ध हो सके। सारणीयन को साख्यिकी तथ्यों के विश्लेषण की तकनीकी प्रक्रिया का एक अंग माना जा सकता हैं।

‘‘सारणीयन केवल विभिन्न प्रकार के प्रत्युत्तरों की संख्या के प्रकारों को उनके उपयुक्त संवर्गों मे अभिलेखन किये जाने को ही कहते हैं।’’

घेाष एवं चौधरी के अनुसार:- 

‘‘सारणीयन द्वारा गणनात्मक तथ्यों का इस तरह व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक ढंग से प्रदर्शन करना हैं ताकि विचाराधीन समस्या स्पष्ट हो जाये।’’

प्रो. निखार के अनुसार:- 

      ‘‘सारणी स्तम्भ एवं पंक्तियों मे आंकडों का क्रमबद्ध संगठन हैं।’’

वर्गीकरण की गणना, सारणियों का निर्माण तथा सांख्यिकीय गणना, आदि शोधकर्ता स्वयं अपने हाथों करना चाहता हैं तो वह संकेतों की सहायता से व्यवस्थित रूप मे अंकित कर लेता हैं इसकी उपयोगिता यह है कि आगे चलकर उसे बार-बार अनुसूची को नही देखना पडता हैं।

यदि शोध का विश्लेषण कार्य विज्ञान की सहायता से करने पर मास्टर शीट बनाने की आवश्यकता नही होती हैं। उसके स्थान पर कार्डों का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया मे 8 कोलम कार्ड का उपयोग करते है।

वर्तमान में शोधकर्ताओं द्वारा इच्छित वर्गीकरण तथा सांख्यिकीय गणनाएँ विज्ञान की सहायता से की जाती हैं।



सारणी के प्रकार:- 

संकलित सामग्री के चरों के गुण ही सारणीयन के प्रकारों का आधार माने जाते हैं। जैसे- एक गुण सारणी मे सामग्री को एक की चर या गुण के आधार पर सारणीयन किया जाता हैं इन्ही आधारों पर प्राय सारणियों के प्रमुख चार प्रकारों मे विभाजित किया जाता हैं जो निम्नलिखित हैं -

1. एक गुण सारणी

2. द्वि गुण सारणी

3. त्रि गुण सारणी

4. बहु गुण सारणी

4.1.7 तथ्यों का विश्लेषण 

किसी भी शोधकार्य मे सारणी के निर्माण के पश्चात् तथ्यों का वास्तविक विश्लेषण कार्य शुरू होता हैं। तथ्यों के विश्लेषण से संबंधित वर्णन पहले भी किया जा चुका हैं सारणी के वास्तविक विश्लेषण के अन्तर्गत सारणीबद्ध विषय सामग्री का अध्ययन एवं उसमे निहित समानताओं, विषमताओं, प्रवृतियों तथा महत्वपूर्ण कारकों पर ध्यान केन्द्रित किया जाता हैं परिणाम क्यों और कैसे मिले हैं ? इसकी प्रारम्भिक विधि प्रतिशत की गणना हैं। जो लगभग सभी अनुसंधानों मे की जाती हैं। यदि अध्ययन को अधिक निश्चित व प्रमाणिक बनाना हो तब शोधकर्ता उच्च स्तरीय सांख्यिकी का प्रयोग करते हैं जिसमे मुख्यतः मध्यमान, मध्यांक, प्रमाप विचलन की गणना, सहचर्य का माप, काईस्कवेयर, टी टेस्ट आदि को सम्मिलित किया जाता है। अनुसंधानकर्ता द्वारा किसी विधि का उपयोग उसके तथ्यों की प्रकृति व विश्लेषण के प्रारूप तथा अध्ययन के उद्धेश्य पर निर्भर करते हैं। विश्लेषण एवं व्याख्या की प्रक्रिया साथ-साथ चलती हैं।




4.1.8 तथ्यों की व्याख्या 

एकत्रित तथ्यों का विश्लेषण करके हम जो निष्कर्ष या परिणाम व्यक्त करते हैं उनकी व्याख्या करना ही निर्वचन हैं। परिणामों से क्या अभिप्राय हैं ? उनकी सार्थकता क्या हैं ? मूल समस्या का उत्तर क्या हैं ? इत्यादि का विवेचन करना अर्थापन या व्याख्या कहलाता हैं। व्याख्या एक व्यक्तिनिष्ठ कार्य हैं। अतः इसमे त्रुटियों की संभावना अधिक रहती हैं एक ही निष्कर्ष की व्याख्या भिन्न भिन्न व्यक्ति विभिन्न प्रकार से करते हैं क्योकि वे अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर पूर्णतया तटस्थ नही हो पाते हैं। अतः शोधकर्ता के व्यक्तिगत गुण, कल्पना शक्ति, गहन अन्तदृष्टि अनुसंधान प्रविधि का पर्याप्त ज्ञान, अध्ययन क्षेत्र का विस्तृत ज्ञान एवं सावधानी पूर्वक निष्पक्ष समीक्षा अर्थ पूर्ण व्याख्या मे सहायक सिद्ध होती हैं। अनुसंधान मे वैज्ञानिकता प्रकट हो जाती हैं।

उपयुक्त विवरण एवं तथ्यों को दृष्टिगत एवं आत्म ज्ञान करते हुए अनुसंधानकर्ता ने भी तथ्यों का वर्गीकरण करके उनका सारणीयन किया हैं एवं उसके पश्चात् उनकी अर्थ पूर्ण व्याख्या प्रस्तुत की हैं।

4.2 शोध से संबंधित आँकड़ों का विश्लेषण एवं व्याख्या

प्रस्तुत शोध का उद्देश्य भूगोल विषय के विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन के परीक्षणों से प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण एवं व्याख्या करना है।

प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण एवं व्याख्या उद्देश्य एवं परिकल्पनाओं के प्रकाश में किया गया है। प्रस्तुत अध्याय चतुर्थ को तीन वर्गों में विभाजित किया गया हैं –

प्रथम वर्ग 

I. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का प्राकृतिक आपदाओं संबंधी जानकारी का अध्ययन।

II. भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का प्राकृतिक आपदा के प्रति जागरूकता का अध्ययन।

द्वितीय वर्ग

I. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का कोरोना महामारी संबंधी जानकारी का अध्ययन।

II. भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता का अध्ययन।

तृतीय वर्ग

I. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का पर्यावरण संरक्षण संबंधी जानकारी का अध्ययन।

II. भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन।

प्रथम वर्ग 

4.3 भूगोल विषय के विद्यार्थियों का प्राकृतिक आपदाओं संबंधी जानकारी का अध्ययन

विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं संबंधी जानकारी के मापन हेतु स्वनिर्मित उपकरण का प्रयोग भूगोल विषय के विद्यार्थियों का प्राकृतिक आपदाओं संबंधी जानकारी का मापन करने के लिए ‘‘प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी’’ एक स्वनिर्मित मानकीकृत माप है जो कि भारतीय परिस्थितियों और संस्कृति के अनुकूल है। 

भूगोल विषय के विद्यार्थियों पर प्रशासित परीक्षण से प्राप्त तथ्यों की व्याख्या एवं विश्लेषण करने से पूर्व प्राप्त प्राप्तांकों के आधार पर सांख्यिकी तकनीक की सहायता से भूगोल विषय के विद्यार्थियों का प्राकृतिक आपदाओं संबंधी जानकारी का मापन करने के लिए ‘‘प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी’’ परीक्षण से प्राप्त प्राप्तांकों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा टी मूल्य की गणना की गई जिसका श्रेणी विभाजन विवरणिका की सारणी 3.4 के अनुसार किया गया। 

प्राप्त टी मूल्य के आधार पर भूगोल विषय के विद्यार्थियों के प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी के प्राप्तांकों के मध्य अंतर की सार्थकता की जाँच की गई।

प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी से प्राप्त प्राप्तांकों के द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा श्रेणी को ज्ञात किया गया है। 

सारणी 4.1 भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता का मध्यमान, प्रमाप विचलन ज्ञात किया गया। इनकी श्रेणी का निर्धारण सारणी 3.4 के आधार पर किया गया हैं।

सारणी 4.1

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा श्रेणी (N-1200)

क्र.सं. आयामः मध्यमान प्रमाप विचलन श्रेणी

1. आपदा का परिचय 22.35 1.40 बहुत अधिक

2. आपदा के प्रकार 25.14 1.95 अधिक

3. आपदाओं के कारण 25.35 2.24 बहुत अधिक

4. आपदाओं के प्रभाव 24.64 2.32 अधिक

5. आपदा प्रबंधन 25.89 3.05 बहुत अधिक

6. आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका 27.76 2.38 बहुत अधिक

कुल 151.11 10.17 बहुत अधिक


प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी से प्राप्त भूगोल विषय के विद्यार्थियों के सभी छः आयामों को सारणी 4.1 में भूगोल विषय के छः आयामों के मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा श्रेणी को दर्शाया गया है। इसका रेखाचित्र संख्या 4.1 में प्रदर्शित है।





रेखाचित्र संख्या-4.1

 

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के 6 आयामों की व्याख्या एवं विश्लेषण निम्नानुसार प्रस्तुत किया गया है - 

1. आयाम: आपदा का परिचय

सारणी 4.1 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा का परिचय का मध्यमान 22.35 तथा प्रमाप विचलन 1.40 है जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा का परिचय की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है। 

जो विद्यार्थी आयामः आपदा का परिचय में उच्च अंक प्राप्त करते है। उनमे आपदा प्रबंधन के सिद्धांतों, प्रक्रियाओं और नीतियों का व्यापक ज्ञान व जोखिम मूल्यांकन (Risk Assessment) और प्रबंधन की अवधारणाओं की पकड़ को प्रदर्शित करता है आयामः आपदा का परिचय का मध्यमान के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता बहुत अधिक पायी गयी है। 

परिणाम की पुष्टि हेतु शोधकर्ता द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों के समूह में से 5 प्रतिशत विद्यार्थियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें उनसे पूछा गया कि- क्या पर्यावरणीय प्रक्रमों द्वारा सदा चरम घटनाएं उत्पन्न होती हैं? तब 90 प्रतिशत विद्यार्थियों के उत्तर हॉ में थें। जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा का परिचय के बहुत अधिक होने को प्रदर्शित करते हैं।

2. आयाम: आपदा के प्रकार

सारणी 4.1 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा के प्रकार का मध्यमान 25.14 तथा प्रमाप विचलन 1.95 है जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा के प्रकार की श्रेणी अधिक प्रदर्शित करता है।

जो विद्यार्थी आयामः आपदा के प्रकार में अधिक अंक प्राप्त करते है। उनमे आपदा के प्रकारों (प्राकृतिक, मानव-निर्मित, जैविक और तकनीकी) की स्पष्ट और व्यापक समझ, 

प्रत्येक आपदा के कारण, प्रकृति, और प्रभाव का विश्लेषण करने की क्षमता व भौगोलिक, सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से आपदाओं की जागरूकता पायी गयी है। आयामः आपदा के प्रकार का मध्यमान के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता अधिक पायी गयी है। 

परिणाम की पुष्टि हेतु शोधकर्ता द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों के समूह में से 5 प्रतिशत विद्यार्थियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें उनसे पूछा गया कि- आपदाएं मुख्यतः कितने प्रकार की होती हैं? तब 81 प्रतिशत विद्यार्थियों के उत्तर- 2, प्राकृतिक एवं कृत्रिम में था। जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा के प्रकार के अधिक होने को प्रदर्शित करते हैं।

3. आयाम: आपदाओं के कारण

सारणी 4.1 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के कारण का मध्यमान 25.35 तथा प्रमाप विचलन 2.24 है जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के कारण की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है। 

जो विद्यार्थी आयामः आपदाओं के कारण में बहुत अधिक अंक प्राप्त करते है। उनमे प्राकृतिक आपदाओं के भूगर्भीय, जलवायु और पारिस्थितिक कारणों की विस्तृत समझ, मानव-निर्मित आपदाओं (जैसे औद्योगिक दुर्घटनाएं, युद्ध या शहरीकरण) के पीछे की प्रक्रियाओं और कारकों व आपदाओं के सामाजिक, आर्थिक, और पर्यावरणीय पहलुओं का विश्लेषण को प्रदर्शित करता है आयामः आपदाओं के कारण का मध्यमान के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता बहुत अधिक पायी गयी है। 

परिणाम की पुष्टि हेतु शोधकर्ता द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों के समूह में से 5 प्रतिशत विद्यार्थियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें उनसे पूछा गया कि- क्या प्राकृतिक आपदा पर्यावरण असंतुलन के फलस्वरूप उत्पन्न होती हैं? तब 83 प्रतिशत विद्यार्थियों के उत्तर हॉ में थे, जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के कारण के बहुत अधिक होने को प्रदर्शित करते हैं।

4. आयाम: आपदाओं के प्रभाव

सारणी 4.1 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के प्रभाव का मध्यमान 24.64 तथा प्रमाप विचलन 2.32 है जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के प्रभाव की श्रेणी अधिक प्रदर्शित करता है।

जो विद्यार्थी आयामः आपदाओं के प्रभाव में अधिक अंक प्राप्त करते है। उनमे आपदाओं के विभिन्न प्रकारों (जैसे भौतिक, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय) पर उनके प्रभावों की विस्तृत समझ, आपदाओं के दीर्घकालिक प्रभावों और उनके पारिस्थितिकीय परिणामों को समझना, भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक मेट्रिक्स का उपयोग करके प्रभाव का मूल्यांकन व आपदाओं से उत्पन्न समस्याओं और उनके समाधान के बीच संतुलन बनाने की कुशलता की जागरूकता पायी जाती है। आयामः आपदाओं के प्रभाव का मध्यमान के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता अधिक पायी गयी है। 

परिणाम की पुष्टि हेतु शोधकर्ता द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों के समूह में से 5 प्रतिशत विद्यार्थियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें उनसे पूछा गया कि- क्या प्राकृतिक आपदाएं महामारी को जन्म देती हैं? तब 82 प्रतिशत विद्यार्थियों के उत्तर- हॉ में थे, जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के प्रभाव के अधिक होने को प्रदर्शित करते हैं।

5. आयाम: आपदा प्रबंधन

सारणी 4.1 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन का मध्यमान 25.89 तथा प्रमाप विचलन 3.05 है जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन  की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है।

जो विद्यार्थी आयामः आपदा प्रबंधन में बहुत अधिक अंक प्राप्त करते है। आपदा प्रबंधन के सभी चरणों (रोकथाम, तैयारी, प्रतिक्रिया और पुनर्निर्माण) की गहरी समझ, आपदाओं के प्रकार, उनके प्रभाव और प्रबंधन प्रक्रियाओं का विस्तृत ज्ञान व विद्यार्थी अकादमिक रूप से मेधावी, तकनीकी रूप से कुशल और सामाजिक रूप से जागरूक होते हैं। आयामः आपदा प्रबंधन का मध्यमान के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता बहुत अधिक पाया गया है। 

परिणाम की पुष्टि हेतु शोधकर्ता द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों के समूह में से 5 प्रतिशत विद्यार्थियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें उनसे पूछा गया कि- क्या आपदा के प्रबंधन हेतु विद्यार्थियों को प्रशिक्षण प्रदान करना चाहिए? तब 86 प्रतिशत विद्यार्थियों के उत्तर हॉ में थे, जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन के बहुत अधिक होने को प्रदर्शित करते हैं।

6. आयाम: आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका

सारणी 4.1 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका का मध्यमान 27.76 तथा प्रमाप विचलन 2.38 है जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है ।

जो विद्यार्थी आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका में बहुत अधिक अंक प्राप्त करते है वे आपदा जोखिम और सुरक्षा उपायों पर समुदाय को शिक्षित करने, स्कूलों, कॉलेजों और स्थानीय समुदायों में आपदा प्रबंधन पर वर्कशॉप और सेमिनार आयोजित कर जागरूकता अभियानों के माध्यम से आपदाओं के प्रति लोगों को सतर्क बनाने में विद्यार्थियों की भूमिका होती हैं। आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका का मध्यमान के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता बहुत अधिक पाया गया है। 

परिणाम की पुष्टि हेतु शोधकर्ता द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों के समूह में से 5 प्रतिशत विद्यार्थियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें उनसे पूछा गया कि- क्या विद्यार्थियों द्वारा पर्यावरणीय जन जागरूकता कार्यक्रम एवं रैली प्रदर्शन आदि का आयोजन कर आपदा के प्रति जन चेतना जागृत की जा सकती हैं? तब 92 प्रतिशत विद्यार्थियों के उत्तर हॉ में थे, जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका के बहुत अधिक होने को प्रदर्शित करते हैं।

7. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता (समेकित)

सारणी 4.1 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता का मध्यमान 151.11तथा प्रमाप विचलन 10.17 है जो की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता की श्रेणी बहुत अधिक को प्रदर्शित करता है ।

जो विद्यार्थी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता (समेकित) में बहुत अधिक अंक प्राप्त करते है। वे आपदा जोखिम और सुरक्षा उपायों पर समुदाय को शिक्षित करने, स्कूलों, कॉलेजों और स्थानीय समुदायों में आपदा प्रबंधन पर वर्कशॉप और सेमिनार आयोजित कर जागरूकता अभियानों के माध्यम से आपदाओं के प्रति लोगों को सतर्क बनाने में विद्यार्थियों की भूमिका होती हैं। प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता (समेकित) का मध्यमान के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता बहुत अधिक पायी गयी है। 

परिणाम की पुष्टि हेतु शोधकर्ता द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों के समूह में से 5 प्रतिशत विद्यार्थियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें उनसे पूछा गया कि- क्या विद्यार्थियों को विभिन्न प्रकार की आपदाओं के कारण तथा उसके निवारण की जानकारी प्रदान करवायी जानी चाहिए? तब 86 प्रतिशत विद्यार्थियों के उत्तर हॉ में थे, जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता (समेकित) के बहुत अधिक होने को प्रदर्शित करता हैं।

4.3.1 भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का प्राकृतिक आपदा के प्रति जागरूकता का अध्ययन

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों पर प्रशासित ‘‘प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी’’ एक स्वनिर्मित मानकीकृत परीक्षण से प्राप्त तथ्यों की व्याख्या एवं विश्लेषण करने से पूर्व प्राप्त प्राप्तांकों के आधार पर सांख्यिकी तकनीक की सहायता से भूगोल विषय के दोनों समूहों के परीक्षण से प्राप्त प्राप्तांकों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा टी मूल्य की गणना की गई। 

प्राप्त टी मूल्य के आधार पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों के प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी के प्राप्तांकों के मध्य अंतर की सार्थकता की जाँच की गई।




सारणी 4.2 प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी से प्राप्त प्राप्तांकों के द्वारा भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा टी-मूल्य को ज्ञात किया गया है। 

सारणी 4.2

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा टी-मूल्य (N-600)

क्र.सं. आयामः राजकीय विद्यालय

(N-600) निजी विद्यालय

(N-600) टी-मूल्य

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

1. आपदा का परिचय 22.20 1.36 22.51 1.43 3.845

2. आपदा के प्रकार 24.95 2.07 25.32 1.80 3.335

3. आपदाओं के कारण 25.04 2.14 25.66 2.30 4.806

4. आपदाओं के प्रभाव 24.33 2.12 24.94 2.46 4.544

5. आपदा प्रबंधन 25.29 3.24 26.48 2.73 6.865

6. आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका 27.44 2.55 28.07 2.16 4.639

कुल 149.25 9.86 152.97 10.14 6.447


प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी से प्राप्त भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों के सभी आयामों को सारणी 4.2 में भूगोल विषय के छः आयामों के मध्यमानो का रेखाचित्र संख्या 4.2 में प्रदर्शित है।



रेखाचित्र संख्या-4.2

 

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के 6 आयामों की व्याख्या एवं विश्लेषण निम्नानुसार प्रस्तुत किया गया है - 

1. आयाम: आपदा का परिचय

सारणी 4.3

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा का परिचय का मध्यमान, प्रमाप विचलन और टी मूल्य

राजकीय विद्यालय

विद्यार्थी N=600 निजी विद्यालय विद्यार्थी N=600 टी-मूल्य

सार्थकता

0.05 विश्वास स्तर पर 

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

22.20 1.36 22.51 1.43 3.845 सार्थक


सारणी 4.3 के अनुसार भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा का परिचय का मध्यमान 22.20 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा का परिचय का मध्यमान 22.51 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा का परिचय बहुत अधिक श्रेणी के पाये गये है अर्थात् विद्यार्थी आपदा प्रबंधन के सिद्धांतों, प्रक्रियाओं और नीतियों का व्यापक ज्ञान व जोखिम मूल्यांकन (Risk Assessment) और प्रबंधन की अवधारणाओं की पकड़ को प्रदर्शित करता है।

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा का परिचय के मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः1.36 तथा 1.43 है, तथा टी मूल्य 3.845 हैं जो कि - 

0.05 विश्वास स्तर पर: भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा का परिचय के मध्यमानों का टी मूल्य 3.845 प्राप्त किया गया जो कि 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से अधिक है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा का परिचय में सार्थक अंतर है।

Singh, A., & Kumar, M. (2019) ने भारत में मीडिया द्वारा प्राकृतिक आपदाओं के बारे में जन जागरूकता फैलाने की भूमिका के अध्ययन में मीडिया ने आपदाओं के प्रति जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन यह प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित था। 

2. आयाम: आपदा के प्रकार

सारणी 4.4

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा के प्रकार का मध्यमान, प्रमाप विचलन और टी मूल्य

राजकीय विद्यालय

विद्यार्थी N=600 निजी विद्यालय विद्यार्थी N=600 टी-मूल्य

सार्थकता

0.05 विश्वास स्तर पर 

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

24.95 2.07 25.32 1.80 3.335 सार्थक


सारणी 4.4 के अनुसार भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा के प्रकार का मध्यमान 24.95 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा के प्रकार का मध्यमान 25.32 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा के प्रकार अधिक श्रेणी के पाये गये है, अर्थात् विद्यार्थी आपदा के प्रकारों (प्राकृतिक, मानव-निर्मित, जैविक और तकनीकी) की स्पष्ट और व्यापक समझ को प्रदर्शित करता है। भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा के प्रकार के मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 2.07 तथा 1.80 है तथा टी मूल्य 3.335 हैं जो कि - 

0.05 विश्वास स्तर पर: भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा के प्रकार के मध्यमानों का टी मूल्य 3.335 प्राप्त किया गया जो कि 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से अधिक है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा के प्रकार में सार्थक अंतर पाया गया है।

Kumar, P., & Joshi, R. (2018) ने भारत में भूकंप के प्रति जनता की जागरूकता और उनके जोखिम मूल्यांकन का अध्ययन में भूकंप के प्रति जागरूकता में सुधार हुआ है, लेकिन भूकंपीय क्षेत्रों में लोगों की तैयारी में कमी है।

3. आयाम: आपदाओं के कारण

सारणी 4.5

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के कारण का मध्यमान, प्रमाप विचलन और टी मूल्य

राजकीय विद्यालय

विद्यार्थी N=600 निजी विद्यालय विद्यार्थी N=600 टी-मूल्य

सार्थकता

0.05 विश्वास स्तर पर 

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

25.04 2.14 25.66 2.30 4.806 सार्थक


सारणी 4.5 के अनुसार भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के कारण का मध्यमान 25.04 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के कारण का मध्यमान 25.66 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के कारण अधिक श्रेणी के पाये गये है, अर्थात् विद्यार्थी आपदाओं के कारण मे प्राकृतिक आपदाओं के भूगर्भीय, जलवायु और पारिस्थितिक कारणों की विस्तृत समझ, मानव-निर्मित आपदाओं (जैसे औद्योगिक दुर्घटनाएं, युद्ध या शहरीकरण) के पीछे की प्रक्रियाओं और कारकों व आपदाओं के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय पहलुओं का विश्लेषण को प्रदर्शित करता है भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के कारण के मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 2.14 तथा 2.30 है तथा टी मूल्य 4.806 हैं जो कि - 

0.05 विश्वास स्तर पर: भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के कारण के मध्यमानों का टी मूल्य 4.806 प्राप्त किया गया जो कि 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से अधिक है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के कारण में सार्थक अंतर पाया गया है।





4. आयाम: आपदाओं के प्रभाव

सारणी 4.6

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के प्रभाव का मध्यमान, प्रमाप विचलन और टी मूल्य

राजकीय विद्यालय

विद्यार्थी N=600 निजी विद्यालय विद्यार्थी N=600 टी-मूल्य

सार्थकता

0.05 विश्वास स्तर पर 

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

24.33 2.12 24.94 2.46 4.544 सार्थक


सारणी 4.6 के अनुसार भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के प्रभाव का मध्यमान 24.33 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के प्रभाव का मध्यमान 24.94 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के प्रभाव अधिक श्रेणी के पाये गये है, अर्थात् विद्यार्थी आपदाओं के प्रभाव मे आपदाओं के विभिन्न प्रकारों (जैसे भौतिक, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय) पर उनके प्रभावों की विस्तृत समझ, आपदाओं के दीर्घकालिक प्रभावों और उनके पारिस्थितिकीय परिणामों को समझना, भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक मेट्रिक्स का उपयोग करके प्रभाव का मूल्यांकन व आपदाओं से उत्पन्न समस्याओं और उनके समाधान के बीच संतुलन बनाने की कुशलता की जागरूकता पायी गयी है। भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के प्रभाव के मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 2.12 तथा 2.46 है, तथा टी मूल्य 4.544 हैं जो कि - 

0.05 विश्वास स्तर पर: भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के प्रभाव के मध्यमानों का टी मूल्य 4.544 प्राप्त किया गया जो कि 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से अधिक है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के प्रभाव में सार्थक अंतर पाया गया है।

5. आयाम: आपदा प्रबंधन

सारणी 4.7

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन का मध्यमान, प्रमाप विचलन और टी मूल्य

राजकीय विद्यालय

विद्यार्थी N=600 निजी विद्यालय विद्यार्थी N=600 टी-मूल्य

सार्थकता

0.05 विश्वास स्तर पर 

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

25.29 3.24 26.48 2.73 6.865 सार्थक


सारणी 4.7 के अनुसार भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन का मध्यमान 25.29 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन का मध्यमान 26.48 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन बहुत अधिक श्रेणी के पाये गये है, अर्थात् विद्यार्थी आपदा प्रबंधन के सभी चरणों (रोकथाम, तैयारी, प्रतिक्रिया, और पुनर्निर्माण) की गहरी समझ, आपदाओं के प्रकार, उनके प्रभाव, और प्रबंधन प्रक्रियाओं का विस्तृत ज्ञान व विद्यार्थी अकादमिक रूप से मेधावी, तकनीकी रूप से कुशल, और सामाजिक रूप से जागरूक हैं। भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन के मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 3.24 तथा 2.73 है, तथा टी मूल्य 6.865 हैं जो कि - 

0.05 विश्वास स्तर पर: भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन के मध्यमानों का टी मूल्य 6.865 प्राप्त किया गया जो कि 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से अधिक है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में सार्थक अंतर पाया गया है।

6. आयाम: आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका

सारणी 4.8

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका का मध्यमान, प्रमाप विचलन और टी मूल्य

राजकीय विद्यालय

विद्यार्थी N=600 निजी विद्यालय विद्यार्थी N=600 टी-मूल्य

सार्थकता

0.05 विश्वास स्तर पर 

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

27.44 2.55 28.07 2.16 4.639 सार्थक


सारणी 4.8 के अनुसार भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका का मध्यमान 27.44 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका का मध्यमान 28.07 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका बहुत अधिक श्रेणी के पाये गये है, अर्थात् विद्यार्थी आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका में आपदा जोखिम और सुरक्षा उपायों पर समुदाय को शिक्षित करने, स्कूलों, कॉलेजों और स्थानीय समुदायों में आपदा प्रबंधन पर वर्कशॉप और सेमिनार आयोजित कर जागरूकता अभियानों के माध्यम से आपदाओं के प्रति लोगों को सतर्क बनाने में विद्यार्थियों की भूमिका हैं। भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका के मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 2.55 तथा 2.16 है, तथा टी मूल्य 4.639 हैं जो कि - 

0.05 विश्वास स्तर पर: भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका के मध्यमानों का टी मूल्य 4.639 प्राप्त किया गया जो कि 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से अधिक है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका में सार्थक अंतर पाया गया है।

7. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता (समेकित)

सारणी 4.9

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता (समेकित) में मध्यमान, प्रमाप विचलन और टी मूल्य

राजकीय विद्यालय

विद्यार्थी N=600 निजी विद्यालय विद्यार्थी N=600 टी-मूल्य

सार्थकता

0.05 विश्वास स्तर पर 

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

149.25 9.86 152.97 10.14 6.447 सार्थक

सारणी 4.9 के अनुसार भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता में मध्यमान 149.25 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता में मध्यमान 152.97 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता में बहुत अधिक श्रेणी के पाये गये है, अर्थात् विद्यार्थी आपदा जोखिम और सुरक्षा उपायों पर समुदाय को शिक्षित करने, स्कूलों, कॉलेजों और स्थानीय समुदायों में आपदा प्रबंधन पर वर्कशॉप और सेमिनार आयोजित कर जागरूकता अभियानों के माध्यम से आपदाओं के प्रति लोगों को सतर्क बनाने में विद्यार्थियों की भूमिका होती हैं। भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 9.86 तथा 10.14 है, तथा टी मूल्य 6.447 हैं जो कि - 

0.05 विश्वास स्तर पर: भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति के मध्यमानों का टी मूल्य 6.447 प्राप्त किया गया जो कि 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से अधिक है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता में सार्थक अंतर पाया गया है।

Patel, A., & Mehta, S. (2020), भारत में आपदा जागरूकता को बढ़ावा देने में सरकार की भूमिका का अध्ययन में सरकार ने जागरूकता बढ़ाने के लिए कई पहल कीं, लेकिन इसे अधिक व्यापक बनाने की आवश्यकता है। जबकि भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के मध्यमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता में बहुत अधिक श्रेणी के पायी गयी है।



द्वितीय वर्ग

4.4 भूगोल विषय के विद्यार्थियों का कोरोना महामारी संबंधी जानकारी का अध्ययन

विद्यार्थियों की कोरोना महामारी संबंधी जानकारी के मापन हेतु स्वनिर्मित उपकरण का प्रयोग भूगोल विषय के विद्यार्थियों का कोरोना महामारी संबंधी जानकारी का मापन करने के लिए ‘‘कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी’’ एक स्वनिर्मित मानकीकृत माप है, जो कि भारतीय परिस्थितियों और संस्कृति के अनुकूल है। 

भूगोल विषय के विद्यार्थियों पर प्रशासित परीक्षण से प्राप्त तथ्यों की व्याख्या एवं विश्लेषण करने से पूर्व प्राप्त प्राप्तांकों के आधार पर सांख्यिकी तकनीक की सहायता से भूगोल विषय के विद्यार्थियों का कोरोना महामारी संबंधी जानकारी का मापन करने के लिए ‘‘कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी’’ परीक्षण से प्राप्त प्राप्तांकों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा टी मूल्य की गणना की गई जिसका श्रेणी विभाजन विवरणिका की सारणी 3.8 के अनुसार किया गया। 

प्राप्त टी मूल्य के आधार पर भूगोल विषय के विद्यार्थियों के कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी के प्राप्तांकों के मध्य अंतर की सार्थकता की जाँच की गई।

कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी से प्राप्त प्राप्तांकों के द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा श्रेणी को ज्ञात किया गया है। 

सारणी 4.1 भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता का मध्यमान, प्रमाप विचलन ज्ञात किया गया, इनकी श्रेणी का निर्धारण सारणी 3.8 के आधार पर किया गया हैं।



सारणी 4.10

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा श्रेणी (N-1200)

क्र.सं. आयामः मध्यमान प्रमाप विचलन श्रेणी

1. कोरोना महामारी का परिचय 20.12 2.37 अधिक

2. कोरोना के विभिन्न स्वरूप 20.17 2.78 सामान्य

3. कोरोना के कारण 26.12 2.33 बहुत अधिक

4. कोरोना के लक्षण 24.51 2.82 अधिक

5. कोरोना संबंधी सावधानियां 27.28 1.56 बहुत अधिक

6. कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका 28.65 1.27 बहुत अधिक

कुल 146.84 7.87 बहुत अधिक


कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी से प्राप्त भूगोल विषय के विद्यार्थियों के सभी छः आयामों को सारणी 4.10 में भूगोल विषय के छः आयामों के मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा श्रेणी को दर्शाया गया है। इसका रेखाचित्र संख्या 4.3 में प्रदर्शित है।



रेखाचित्र संख्या-4.3

  

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के 6 आयामों की व्याख्या एवं विश्लेषण निम्नानुसार प्रस्तुत किया गया है - 

1. आयाम: कोरोना महामारी का परिचय

सारणी 4.10 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय का मध्यमान 20.12 तथा प्रमाप विचलन 2.37 है जो की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय की श्रेणी अधिक प्रदर्शित करता है। 

जो विद्यार्थी आयामः कोरोना महामारी का परिचय में अधिक अंक प्राप्त करते है। उनमें कोरोना महामारी के बारे में बुनियादी जानकारी- कोरोना वायरस (COVID-19) क्या है?, इसका इतिहास और यह कैसे फैलता है? महामारी के लक्षण, इसके प्रकार, और इसके संक्रमण का तरीका विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और स्थानीय सरकारों द्वारा दी गई जानकारी होने को प्रदर्शित करता है आयामः कोरोना महामारी का परिचय का मध्यमान के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता अधिक पायी गयी है। 

परिणाम की पुष्टि हेतु शोधकर्ता द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों के समूह में से 5 प्रतिशत विद्यार्थियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें उनसे पूछा गया कि- क्या कोविड- 19 से संक्रमित व्यक्ति जब खांसता है, छीकता है या श्वास छोड़ता है तो उसके नाक या मुख से निकली हुई बूदों से यह रोग फैलता है ? तब 83 प्रतिशत विद्यार्थियों के उत्तर हॉ में थें, जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय के अधिक होने को प्रदर्शित करते हैं।

2. आयाम: कोरोना के विभिन्न स्वरूप

सारणी 4.10 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप का मध्यमान 20.17 तथा प्रमाप विचलन 2.78 है जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप की श्रेणी सामान्य प्रदर्शित करता है ।

जो विद्यार्थी आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप में औसत अंक प्राप्त करते है। उनमें कोरोना वायरस के अलग-अलग वेरिएंट (जैसे अल्फा, डेल्टा, ओमिक्रॉन) और उनकी विशेषताएं, वेरिएंट्स के बीच अंतर और उनका प्रभाव (संक्रमण दर, गंभीरता) व वेरिएंट्स के उभरने के कारण जैसे कि वायरस का म्यूटेशन की जागरूकता सामान्य पायी गयी है। 

परिणाम की पुष्टि हेतु शोधकर्ता द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों के समूह में से 5 प्रतिशत विद्यार्थियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें उनसे पूछा गया कि- अभी तक के सभी कोरोना वायरस में सबसे घातक कोनसा हैं? तब 66 प्रतिशत विद्यार्थियों के उत्तर- कोविड-19 था। जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप के सामान्य जागरूकता को प्रदर्शित करता हैं।

3. आयाम: कोरोना के कारण

सारणी 4.10 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण का मध्यमान 26.12 तथा प्रमाप विचलन 2.33 है जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है।

जो विद्यार्थी आयामः कोरोना के कारण में बहुत अधिक अंक प्राप्त करते है। उनमे कोरोना महामारी SARS-CoV-2 वायरस की उत्पत्ति, प्रारंभिक फैलाव, और इसका संबंध चमगादड़ों या अन्य जानवरों से, वायरस के इंसान से इंसान में फैलने के तरीके, जैसे कि ड्रॉपलेट्स, सतह संपर्क और एरोसोल विषय में छात्रों का अधिक रुचि लेना और उच्च जागरूकता स्तर प्राप्त करना यह दर्शाता है 

परिणाम की पुष्टि हेतु शोधकर्ता द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों के समूह में से 5 प्रतिशत विद्यार्थियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें उनसे पूछा गया कि- क्या कोरोना वायरस हमारे फेफड़ों में श्वसन तंत्र को संक्रमित करता हैं? तब 87 प्रतिशत विद्यार्थियों के उत्तर हॉ में थें, जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण के बहुत अधिक होने को प्रदर्शित करते हैं।

4. आयाम: कोरोना के लक्षण

सारणी 4.10 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण का मध्यमान 24.51 तथा प्रमाप विचलन 2.82 है, जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण की श्रेणी अधिक प्रदर्शित करता है। 

जो विद्यार्थी आयामः कोरोना के लक्षण में अधिक अंक प्राप्त करते है। उनमे प्राथमिक लक्षण:- बुखार, सूखी खांसी और थकावट।

अन्य सामान्य लक्षण:- गले में खराश, सिरदर्द, मांसपेशियों या जोड़ों में दर्द, गंध और स्वाद की क्षमता का कम होना।

गंभीर लक्षण:- सांस लेने में कठिनाई, छाती में दर्द और बोलने या चलने में कठिनाई।

लक्षणों का समय:- संक्रमण के बाद 2 से 14 दिनों के भीतर लक्षण प्रकट हो सकते हैं।

कोरोना के लक्षणों की जागरूकता अधिक पायी गयी है। 

परिणाम की पुष्टि हेतु शोधकर्ता द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों के समूह में से 5 प्रतिशत विद्यार्थियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें उनसे पूछा गया कि- क्या कोरोना से ग्रसित व्यक्ति को स्वाद और गन्ध का अनुभव होना बंद हो जाता है? तब 81 प्रतिशत विद्यार्थियों के उत्तर- हॉ में थें जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण के अधिक होने को प्रदर्शित करते हैं।




5. आयाम: कोरोना संबंधी सावधानियां

सारणी 4.10 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां का मध्यमान 27.28 तथा प्रमाप विचलन 1.56 है, जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है। 

जो विद्यार्थी आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां में बहुत अधिक अंक प्राप्त करते है। वे कोरोना संबंधी सावधानियां जैसे-

व्यक्तिगत स्वच्छता:- हाथ धोने की आदत (कम से कम 20 सेकंड तक साबुन और पानी से हाथ धोना), सैनिटाइज़र का उपयोग करना।

मास्क का उपयोग:- सार्वजनिक स्थानों और भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में मास्क पहनना, मास्क पहनने के सही तरीके (नाक और मुंह को पूरी तरह ढकना)।

सामाजिक दूरी:- 2 मीटर की दूरी बनाए रखना, अनावश्यक रूप से भीड़भाड़ वाले स्थानों से बचना।

सुरक्षित यात्रा:- यात्रा के दौरान स्वास्थ्य दिशा-निर्देशों का पालन करना, कोविड-19 प्रोटोकॉल के तहत परिवहन का उपयोग।

टीकाकरण:- टीका लगवाने का महत्व और उसकी समयबद्धता आदि में बहुत अधिक जागरूक प्रदर्शित करते हैं। 

परिणाम की पुष्टि हेतु शोधकर्ता द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों के समूह में से 5 प्रतिशत विद्यार्थियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें उनसे पूछा गया कि- क्या कोरोनावायरस से प्रभावित व्यक्ति से संबंधित दूरी बनाकर रखना चाहिए? तब 90 प्रतिशत विद्यार्थियों के उत्तर हॉ में थें, जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां के बहुत अधिक होने को प्रदर्शित करते हैं।


6. आयाम: कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका

सारणी 4.10 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका में विद्यार्थियों की भूमिका का मध्यमान 28.65 तथा प्रमाप विचलन 1.27 है, जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका में विद्यार्थियों की भूमिका की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है। 

जो विद्यार्थी आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका में विद्यार्थियों की भूमिका में बहुत अधिक अंक प्राप्त करते है। कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका जैसे-

स्वयं जागरूक रहना:- छात्रों ने कोरोना वायरस से संबंधित आवश्यक जानकारी प्राप्त की और उसे अपने दैनिक जीवन में लागू करना।

परिवार और समाज को जागरूक करना:- उन्होंने अपने परिवार और पड़ोसियों को मास्क पहनने, सामाजिक दूरी बनाए रखने और टीकाकरण के महत्व के बारे में शिक्षित करना।

स्वास्थ्य प्रोटोकॉल का पालन:- छात्रों ने स्वयं और दूसरों को संक्रमण से बचाने के लिए स्वास्थ्य प्रोटोकॉल जैसे मास्क पहनना, हाथ धोना और भीड़भाड़ वाले स्थानों से बचना सुनिश्चित करना।

ऑनलाइन शिक्षा को बढ़ावा:- छात्रों ने तकनीकी उपकरणों और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर न केवल अपनी पढ़ाई जारी रखना व दूसरों को भी इसका लाभ उठाने में मदद करने में भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता बहुत अधिक पाया गयी है। 

परिणाम की पुष्टि हेतु शोधकर्ता द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों के समूह में से 5 प्रतिशत विद्यार्थियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें उनसे पूछा गया कि- क्या विद्यार्थियों द्वारा कोरोना जन जागरूकता कार्यक्रम तथा रैली प्रदर्शन आदि का आयोजन कर कोरोना महामारी के प्रति जन चेतना जागृत करनी चाहिए? तब 95 प्रतिशत विद्यार्थियों के उत्तर हॉ में थें, जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका में विद्यार्थियों की भूमिका के बहुत अधिक होने को प्रदर्शित करते हैं।

7. कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता (समेकित)

सारणी 4.10 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता का मध्यमान 146.84 है जो की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है तथा प्रमाप विचलन 7.87 है।

विद्यार्थियों का कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता (समेकित) में उच्च अंक प्राप्त करना इस बात का संकेत है कि छात्र न केवल महामारी के बारे में जानकारी रखते हैं बल्कि उन्होंने इसे अपनी सोच और व्यवहार में लागू भी किया। उनकी यह जागरूकता न केवल वर्तमान महामारी से निपटने में सहायक है बल्कि यह उन्हें भविष्य में भी जिम्मेदार नागरिक बनने में मदद करेगी। कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता (समेकित) का मध्यमान के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता बहुत अधिक पायी गयी है। 

परिणाम की पुष्टि हेतु शोधकर्ता द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों के समूह में से 5 प्रतिशत विद्यार्थियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें उनसे पूछा गया कि- क्या जिस बीमारी का असर संपूर्ण विश्व पर दिखाई दे, उसे महामारी कहते हैं? जैसे- कोरोना महामारी। तब 84 प्रतिशत विद्यार्थियों के उत्तर हॉ में थें, जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता (समेकित) के बहुत अधिक होने को प्रदर्शित करता हैं।




4.4.1 भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता का अध्ययन

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों पर प्रशासित ‘‘कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी’’ एक स्वनिर्मित मानकीकृत परीक्षण से प्राप्त तथ्यों की व्याख्या एवं विश्लेषण करने से पूर्व प्राप्त प्राप्तांकों के आधार पर सांख्यिकी तकनीक की सहायता से भूगोल विषय के दोनों समूहों के परीक्षण से प्राप्त प्राप्तांकों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा टी मूल्य की गणना की गई। 

प्राप्त टी मूल्य के आधार पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों के कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी के प्राप्तांकों के मध्य अंतर की सार्थकता की जाँच की गई।

सारणी 4.11 कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी से प्राप्त प्राप्तांकों के द्वारा भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा टी-मूल्य को ज्ञात किया गया है- 





सारणी 4.11

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा टी-मूल्य 

क्र.सं. आयामः राजकीय विद्यालय

(N-600) निजी विद्यालय

(N-600) टी-मूल्य

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

1. कोरोना महामारी का परिचय 19.72 2.38 20.51 2.30 5.830

2. कोरोना के विभिन्न स्वरूप 19.55 2.29 20.79 3.08 7.948

3. कोरोना के कारण 26.16 2.35 26.07 2.30 0.682

4. कोरोना के लक्षण 23.29 2.60 25.74 2.47 16.807

5. कोरोना संबंधी सावधानियां 27.30 1.19 27.26 1.86 0.462

6. कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका 28.53 1.08 28.76 1.42 3.219

कुल 144.54 7.77 149.14 7.29 10.563


कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता प्रमापनी से प्राप्त भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों के सभी आयामों को सारणी 4.11 में भूगोल विषय के छः आयामों के मध्यमानो का रेखाचित्र संख्या 4.4 में प्रदर्शित है-



रेखाचित्र संख्या-4.4

 

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के 6 आयामों की व्याख्या एवं विश्लेषण निम्नानुसार प्रस्तुत किया गया है - 

1. आयाम: कोरोना महामारी का परिचय

सारणी 4.12

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय का मध्यमान, प्रमाप विचलन और टी मूल्य

राजकीय विद्यालय

विद्यार्थी N=600 निजी विद्यालय विद्यार्थी N=600 टी-मूल्य

सार्थकता

0.05 विश्वास स्तर पर 

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

19.72 2.38 20.51 2.30 5.830 सार्थक


सारणी 4.12 के अनुसार भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय का मध्यमान 19.72 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय का मध्यमान 20.51 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय में राजकीय विद्यालय अधिक व निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की बहुत अधिक श्रेणी के पायी गयी है, अर्थात् विद्यार्थी उनमे कोरोना महामारी के बारे में बुनियादी जानकारी में राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों में अधिक व निजी विद्यालय के विद्यार्थियों में बहुत अधिक प्रदर्शित करता है।

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय के मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 2.38 तथा 2.30 है, तथा टी मूल्य 5.830 हैं जो कि - 

0.05 विश्वास स्तर पर: भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय के मध्यमानों का टी मूल्य 5.830 प्राप्त किया गया जो कि 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से अधिक है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय में सार्थक अंतर है।

2. आयाम: कोरोना के विभिन्न स्वरूप

सारणी 4.13

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप का मध्यमान, प्रमाप विचलन और टी मूल्य

राजकीय विद्यालय

विद्यार्थी N=600 निजी विद्यालय विद्यार्थी N=600 टी-मूल्य

सार्थकता

0.05 विश्वास स्तर पर 

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

19.55 2.29 20.79 3.08 7.948 सार्थक


सारणी 4.13 के अनुसार भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप का मध्यमान 19.55 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप का मध्यमान 20.79 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप की श्रेणी सामान्य पायी गयी है, अर्थात् विद्यार्थियों मे उनमे कोरोना वायरस के अलग-अलग वेरिएंट (जैसे अल्फा, डेल्टा, ओमिक्रॉन) और उनकी विशेषताएं, वेरिएंट्स के बीच अंतर और उनका प्रभाव (संक्रमण दर, गंभीरता) व वेरिएंट्स के उभरने के कारण जैसे- कि वायरस का म्यूटेशन की स्पष्ट और व्यापक समझ को प्रदर्शित करता है। भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप के मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 2.29 तथा 3.08 है तथा टी मूल्य 7.948 हैं जो कि - 

0.05 विश्वास स्तर पर: भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप के मध्यमानों का टी मूल्य 7.948 प्राप्त किया गया जो कि 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से अधिक है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप में सार्थक अंतर पाया गया है।

3. आयाम: कोरोना के कारण

सारणी 4.14

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण का मध्यमान, प्रमाप विचलन और टी मूल्य

राजकीय विद्यालय

विद्यार्थी N=600 निजी विद्यालय विद्यार्थी N=600 टी-मूल्य

सार्थकता

0.05 विश्वास स्तर पर 

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

26.16 2.35 26.07 2.30 0.682 असार्थक


सारणी 4.14 के अनुसार भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण का मध्यमान 26.16 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण का मध्यमान 26.07 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण में राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों में अधिक व निजी विद्यालय के विद्यार्थियों में बहुत अधिक श्रेणी के पायी गयी है, अर्थात् विद्यार्थियों मे कोरोना महामारी SARS-CoV-2 वायरस की उत्पत्ति, प्रारंभिक फैलाव और इसका संबंध चमगादड़ों या अन्य जानवरों से, वायरस के इंसान से इंसान में फैलने के तरीके की जागरूकता अधिक पायी गयी है। भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण के मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 2.35 तथा 2.30 है, तथा टी मूल्य 0.682 हैं जो कि - 

0.05 विश्वास स्तर पर: भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण के मध्यमानों का टी मूल्य 0.682 प्राप्त किया गया जो कि 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से कम है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण में सार्थक अंतर नही पाया गया है।

4. आयाम: कोरोना के लक्षण

सारणी 4.15

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण का मध्यमान, प्रमाप विचलन और टी मूल्य

राजकीय विद्यालय

विद्यार्थी N=600 निजी विद्यालय विद्यार्थी N=600 टी-मूल्य

सार्थकता

0.05 विश्वास स्तर पर 

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

23.29 2.60 25.74 2.47 16.807 सार्थक


सारणी 4.15 के अनुसार भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण का मध्यमान 23.29 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण का मध्यमान 25.74 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण अधिक श्रेणी के पाये गये है, अर्थात् विद्यार्थी कोरोना के लक्षण प्राथमिक लक्षण, अन्य सामान्य लक्षण, गंभीर लक्षण, लक्षणों का समय आदि कोरोना के लक्षणों से उत्पन्न समस्याओं और उनके समाधान के बीच संतुलन बनाने की कुशलता की जागरूकता पायी गयी है। भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण के मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 2.60 तथा 2.47 है, तथा टी मूल्य 16.807 हैं जो कि - 

0.05 विश्वास स्तर पर: भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण के मध्यमानों का टी मूल्य 16.807 प्राप्त किया गया जो कि 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से अधिक है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण में सार्थक अंतर पाया गया है।

5. आयाम: कोरोना संबंधी सावधानियां

सारणी 4.16

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां का मध्यमान, प्रमाप विचलन और टी मूल्य

राजकीय विद्यालय

विद्यार्थी N=600 निजी विद्यालय विद्यार्थी N=600 टी-मूल्य

सार्थकता

0.05 विश्वास स्तर पर 

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

27.30 1.19 27.26 1.86 0.462 असार्थक


सारणी 4.16 के अनुसार भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां का मध्यमान 27.30 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां का मध्यमान 27.26 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां बहुत अधिक श्रेणी के पाये गये है, अर्थात् विद्यार्थी कोरोना संबंधी सावधानियो जैसे- व्यक्तिगत स्वच्छता, मास्क का उपयोग, सामाजिक दूरी, सुरक्षित यात्रा के दौरान स्वास्थ्य दिशा-निर्देशों का पालन करना, कोविड-19 प्रोटोकॉल के तहत परिवहन का उपयोग, टीकाकरण आदि में बहुत अधिक जागरूक प्रदर्शित करते हैं। भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां के मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 1.19 तथा 1.86 है, तथा टी मूल्य 0.462 हैं जो कि - 

0.05 विश्वास स्तर पर: भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां के मध्यमानों का टी मूल्य 0.462 प्राप्त किया गया जो कि 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से कम है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां में सार्थक अंतर नही पाया गया है।





6. आयाम: कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका

सारणी 4.17

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका का मध्यमान, प्रमाप विचलन और टी मूल्य

राजकीय विद्यालय

विद्यार्थी N=600 निजी विद्यालय विद्यार्थी N=600 टी-मूल्य

सार्थकता

0.05 विश्वास स्तर पर

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

28.53 1.08 28.76 1.42 3.219 सार्थक


सारणी 4.17 के अनुसार भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका का मध्यमान 28.53 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका का मध्यमान 28.76 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका बहुत अधिक श्रेणी के पाये गये है, अर्थात् कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका जैसे- स्वयं जागरूक रहना, परिवार और समाज को जागरूक करना, स्वास्थ्य प्रोटोकॉल का पालन, ऑनलाइन शिक्षा को बढ़ावा आदि में भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता बहुत अधिक पाया गयी है। 

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका के मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 1.08 तथा 1.42 है, तथा टी मूल्य 3.219 हैं जो कि - 

0.05 विश्वास स्तर पर: भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका के मध्यमानों का टी मूल्य 3.219 प्राप्त किया गया जो कि 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से अधिक है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका में सार्थक अंतर पाया गया है।

7. कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता (समेकित)

सारणी 4.18

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता (समेकित) में मध्यमान, प्रमाप विचलन और टी मूल्य

राजकीय विद्यालय

विद्यार्थी N=600 निजी विद्यालय विद्यार्थी N=600 टी-मूल्य

सार्थकता

0.05 विश्वास स्तर पर

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

144.54 7.77 149.14 7.29 10.563 सार्थक

सारणी 4.18 के अनुसार भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता में मध्यमान 144.54 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता में मध्यमान 149.14 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता में बहुत अधिक श्रेणी के पाये गये है, अर्थात् विद्यार्थी महामारी के बारे में जानकारी रखते हैं बल्कि उन्होंने इसे अपनी सोच और व्यवहार में लागू भी किया। उनकी यह जागरूकता न केवल वर्तमान महामारी से निपटने में सहायक है बल्कि यह उन्हें भविष्य में भी जिम्मेदार नागरिक बनने में मदद करेगी। कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता (समेकित) का मध्यमान के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता बहुत अधिक पायी गयी है। भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 7.77 तथा 7.29 है, तथा टी मूल्य 10.563 हैं जो कि - 

0.05 विश्वास स्तर पर: भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति के मध्यमानों का टी मूल्य 10.563 प्राप्त किया गया जो कि 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से अधिक है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता में सार्थक अंतर पाया गया है।

शर्मा, आर., और अग्रवाल, टी. (2020),"शहरी और ग्रामीण भारत में COVID-19 जागरूकता अभियानों का प्रभाव" के अध्ययन में शहरी इलाकों में जागरूकता अभियानों की प्रभावशीलता अधिक थी जबकि ग्रामीण इलाकों में सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ थीं। भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के मध्यमान के अनुसार कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता में बहुत अधिक श्रेणी की पायी गयी है।

तृतीय वर्ग

4.5 भूगोल विषय के विद्यार्थियों का पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन

विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के मापन हेतु प्रवीण कुमार झा द्वारा निर्मित ‘‘पर्यावरण जागरूकता योग्यता प्रमापनी’’ (EAAM) का प्रयोग किया है। उपकरण का प्रयोग भूगोल विषय के विद्यार्थियों का पर्यावरण संरक्षण संबंधी जानकारी का मापन करने के लिए ‘‘पर्यावरण जागरूकता योग्यता प्रमापनी’’ उपकरण एक मानकीकृत माप है। जो कि भारतीय परिस्थितियों और संस्कृति के अनुकूल है। 

भूगोल विषय के विद्यार्थियों पर प्रशासित परीक्षण से प्राप्त तथ्यों की व्याख्या एवं विश्लेषण करने से पूर्व प्राप्त प्राप्तांकों के आधार पर सांख्यिकी तकनीक की सहायता से भूगोल विषय के विद्यार्थियों का पर्यावरण संरक्षण संबंधी जानकारी का मापन करने के लिए ‘‘पर्यावरण जागरूकता योग्यता प्रमापनी’’ परीक्षण से प्राप्त प्राप्तांकों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा टी मूल्य की गणना की गई जिसका श्रेणी विभाजन विवरणिका की सारणी 3.8 के अनुसार किया गया। 

प्राप्त टी मूल्य के आधार पर भूगोल विषय के विद्यार्थियों के ‘‘पर्यावरण जागरूकता योग्यता प्रमापनी’’ के प्राप्तांकों के मध्य अंतर की सार्थकता की जाँच की गई।

‘‘पर्यावरण जागरूकता योग्यता प्रमापनी’’ से प्राप्त प्राप्तांकों के द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा श्रेणी को ज्ञात किया गया है। 

सारणी 4.19 भूगोल विषय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का मध्यमान, प्रमाप विचलन ज्ञात किया गया। इनकी श्रेणी का निर्धारण सारणी 3.5 के आधार पर किया गया हैं।

सारणी 4.19

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा श्रेणी (N-1200)

पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता मध्यमान प्रमाप विचलन श्रेणी

81.11 8.22 सामान्य

पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता प्रमापनी से प्राप्त भूगोल विषय के विद्यार्थियों के मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा श्रेणी को सारणी 4.19 में दर्शाया गया है। इसका रेखाचित्र संख्या 4.5 में प्रदर्शित है।





रेखाचित्र संख्या-4.5

   

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता की व्याख्या एवं विश्लेषण निम्नानुसार प्रस्तुत किया गया है - 

सारणी 4.19 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के मध्यमान 81.11 है जो कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता की श्रेणी सामान्य प्रदर्शित करता है (सारणी 3.10 के अनुसार) तथा प्रमाप विचलन 822 है।

जो विद्यार्थी में सामान्य अंक प्राप्त करते है। उनमे पर्यावरण संरक्षण के बारे में पर्यावरण-अनुकूल आदतों को अपनाना, अपने कार्यों और निर्णयों में पर्यावरणीय प्रभाव को ध्यान में रखना, समाज में जागरूकता फैलाने के लिए अपने ज्ञान और अनुभव को साझा करना आदि की जानकारी सामान्य होने को प्रदर्शित करता है मध्यमान के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता सामान्य पायी गयी है। 

परिणाम की पुष्टि हेतु शोधकर्ता द्वारा भूगोल विषय के विद्यार्थियों के समूह में से 5 प्रतिशत विद्यार्थियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें उनसे पूछा गया कि- क्या केवल जागरूकता से पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान हो सकता है? तब 67 प्रतिशत विद्यार्थियों के उत्तर हॉ में थे, जो कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के सामान्य होने को प्रदर्शित करते हैं।

4.5.1 भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों पर प्रशासित ‘‘पर्यावरण जागरूकता योग्यता प्रमापनी’’ एक मानकीकृत परीक्षण से प्राप्त तथ्यों की व्याख्या एवं विश्लेषण करने से पूर्व प्राप्त प्राप्तांकों के आधार पर सांख्यिकी तकनीक की सहायता से भूगोल विषय के दोनों समूहों के परीक्षण से प्राप्त प्राप्तांकों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा टी मूल्य की गणना की गई। 


प्राप्त टी मूल्य के आधार पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों के पर्यावरण जागरूकता योग्यता प्रमापनी के प्राप्तांकों के मध्य अंतर की सार्थकता की जाँच की गई।

सारणी 4.20 पर्यावरण जागरूकता योग्यता प्रमापनी से प्राप्त प्राप्तांकों के द्वारा भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा टी-मूल्य को ज्ञात किया गया है। 

सारणी 4.20

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के आयामों का मध्यमान, प्रमाप विचलन तथा टी-मूल्य (N-600)

राजकीय विद्यालय

विद्यार्थी (N-600) निजी विद्यालय विद्यार्थी (N-600) टी-मूल्य

सार्थकता

0.05 विश्वास स्तर पर 

मध्यमान प्रमाप विचलन मध्यमान प्रमाप विचलन

74.57 6.00 87.66 3.65 45.586 सार्थक


पर्यावरण जागरूकता योग्यता प्रमापनी से प्राप्त भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों के सारणी-4.20 में भूगोल विषय के मध्यमानो का रेखाचित्र संख्या-4.6 में प्रदर्शित है।







रेखाचित्र संख्या-4.6

  

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता की व्याख्या एवं विश्लेषण निम्नानुसार प्रस्तुत किया गया है - 

सारणी 4.20 के अनुसार भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का मध्यमान 74.57 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का मध्यमान 87.66 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों सामान्य व निजी विद्यालय के विद्यार्थियों में अधिक श्रेणी के पायी गयी है अर्थात् विद्यार्थियों में पर्यावरण संरक्षण के बारे में पर्यावरण-अनुकूल आदतों को अपनाने, अपने कार्यों और निर्णयों में पर्यावरणीय प्रभाव को ध्यान में रखने, समाज में जागरूकता में राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों में सामान्य व निजी विद्यालय के विद्यार्थियों में अधिक जागरूकता प्रदर्शित करते है।

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 6.00 तथा 3.65 है, तथा टी मूल्य 45.586 हैं जो कि - 

0.05 विश्वास स्तर पर: भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के मध्यमानों का टी मूल्य 45.586 प्राप्त किया गया जो कि 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से अधिक है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता में सार्थक अंतर है।




4.5 उपसंहार

चतुर्थ अध्याय में शोधकर्ता द्वारा विश्लेषण, सम्पादन, वर्गीकरण, संकलन, सारणीयन, तथ्यों की व्याख्या एवं तथ्यों का वर्णन किया गया है। साथ ही अनुसन्धान द्वारा आंकड़ों का विवेचन तथा सारणी द्वारा उन्हें तुलनात्मक रूप से प्रदर्शित किया गया है।























पंचम अध्याय - सारांश‚ परिणाम‚ निष्कर्ष एवं सुझाव


5.1 प्रस्तावना

प्राकृतिक आपदाएँ जैसे- भूकंप, बाढ़, सूखा, तूफान और अन्य प्राकृतिक घटनाएँ, मानव जीवन के लिए अत्यधिक संकटपूर्ण होती हैं। ये घटनाएँ न केवल शारीरिक रूप से नुकसान पहुँचाती हैं बल्कि मानसिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी गंभीर प्रभाव डालती हैं। प्राकृतिक आपदाएँ मानव जीवन के सभी पहलुओं—स्वास्थ्य, सुरक्षा, आर्थ‍िक स्थिति और सामाजिक संरचना—को प्रभावित करती हैं।

प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाली क्षति से जीवन के आधारभूत ढाँचे में विघटन होता है। घरों, खेती, जल आपूर्ति, और बुनियादी ढाँचे की तबाही से लाखों लोग प्रभावित होते हैं। इसके साथ ही इन घटनाओं से पर्यावरणीय असंतुलन भी पैदा होता है, जो दीर्घकालिक समस्याएँ उत्पन्न करता है। भूकंप, बाढ़, या सुनामी जैसी घटनाएँ कई बार बड़े पैमाने पर जान-माल की हानि पहुँचाती हैं जिससे समाज में अस्थिरता पैदा होती है और पुनर्निर्माण में कई सालों का समय लगता है।

प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न होने वाले मानसिक दबाव और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ भी बड़ी चुनौती बन जाती हैं। लोग अपनी संपत्ति, प्रियजनों, और जीवन की सामान्य परिस्थितियों को खोने के बाद गहरे तनाव और अवसाद का सामना करते हैं। बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों के लिए इन आपदाओं का असर विशेष रूप से अधिक गंभीर होता है।

इन आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए समुचित तैयारी और जागरूकता आवश्यक है। आपातकालीन योजनाएँ, पुनर्निर्माण उपाय और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए वैश्विक प्रयास जरूरी हैं ताकि भविष्य में इन आपदाओं से होने वाली क्षति को कम किया जा सके।

प्राकृतिक आपदाएँ मानव जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं और हमें इस दिशा में समुचित उपायों की आवश्यकता है ताकि हम इन संकटों से बच सकें और जल्दी से जल्दी सामान्य जीवन की ओर लौट सकें।

कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी जिसने 2019 के अंत में अपनी शुरुआत की और 2020 में वैश्विक स्तर पर फैल गई एक सामाजिक और स्वास्थ्य इमरजेंसी के रूप में सामने आई। यह महामारी न केवल एक स्वास्थ्य संकट थी बल्कि इसने पूरी दुनिया के सामाजिक, आर्थ‍िक और मानसिक ढांचे को भी प्रभावित किया। कोरोनावायरस के फैलाव ने हमें यह समझने पर मजबूर किया कि स्वास्थ्य संकट केवल एक मेडिकल समस्या नहीं बल्कि यह सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी एक गंभीर चुनौती बन जाती है।

COVID-19 के फैलाव ने स्वास्थ्य प्रणालियों की सीमाओं को उजागर किया और यह दिखाया कि एक वैश्विक महामारी सिर्फ चिकित्सा उपायों से नहीं, बल्कि सामाजिक सहयोग और जिम्मेदारी से भी निपटी जा सकती है। सोशल डिस्टेसिंग, लॉकडाउन, मास्क पहनने और हाथ धोने जैसी सख्त नियमों ने लोगों के जीवन के कई पहलुओं को प्रभावित किया। इन उपायों ने जहाँ एक ओर वायरस के प्रसार को नियंत्रित करने में मदद की वहीं दूसरी ओर समाज में असमंजस, भय और मानसिक तनाव भी पैदा किया।

महामारी ने खासकर उन समुदायों को अधिक प्रभावित किया जो पहले ही गरीबी, असमानता और कमजोर स्वास्थ्य प्रणालियों का सामना कर रहे थे। स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी, चिकित्सा उपकरणों की अभाव और अस्पतालों पर बढ़ता दबाव, ये सब COVID-19 के फैलाव के दौरान गंभीर समस्याएँ बनीं। इसके अलावा, लॉकडाउन के कारण आर्थिक संकट, बेरोजगारी और खाद्य संकट जैसे मुद्दे भी उभरे जो सामाजिक असमानताओं को और बढ़ा रहे थे।

COVID-19 ने यह भी सिद्ध किया कि समाज में हर एक व्यक्ति की स्वास्थ्य और भलाई से जुड़ी जिम्मेदारी होती है। मास्क पहनना, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना और उचित स्वास्थ्य सावधानियों को अपनाना न केवल व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए बल्कि समाज के सामूहिक स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है।

इस महामारी ने यह सिखाया कि स्वास्थ्य आपात स्थितियों में सामाजिक समर्थन, मानवीय संवेदनाएँ और सामूहिक प्रयास बहुत मायने रखते हैं। यह एक सामाजिक स्वास्थ्य इमरजेंसी के रूप में उभरी जिसने सभी क्षेत्रों के बीच सहयोग और जिम्मेदारी की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया। कोविड-19 के फैलाव ने यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता को भी प्रकट किया कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों के लिए हम और अधिक तैयार रहें ताकि कोई भी महामारी अधिक विनाशकारी न हो।

पर्यावरण संरक्षण आज के समय की एक अत्यंत महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गई है। हमारे चारों ओर का पर्यावरण जिसमें हवा, पानी, मृदा, वनस्पतियाँ और जीव-जंतु शामिल हैं, मानव जीवन के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। इन संसाधनों का संतुलन बनाए रखना और उनका संरक्षण करना न केवल हमारी वर्तमान पीढ़ी के लिए बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आवश्यक है।

विकास की अंधी दौड़ में मानव ने प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया है, जिससे पर्यावरणीय असंतुलन पैदा हो गया है। वनों की अंधाधुंध कटाई, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों की कमी जैसे मुद्दे हमारे पर्यावरण के लिए गंभीर खतरे बने हुए हैं। वायु और जल प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग और वन्य जीवों की विलुप्ति जैसी समस्याएँ प्रदूषित पर्यावरण के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई हैं।

पर्यावरण संरक्षण का उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों का सही तरीके से उपयोग करना और उनकी नष्ट होने से बचाव करना है। इसका मतलब है कि हम जल, ऊर्जा, वनों और जैव विविधता जैसे संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करें और उनकी रक्षा के लिए कदम उठाएँ। यह न केवल हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है बल्कि यह वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है।

अगर हम पर्यावरण को बचाने के लिए सही कदम नहीं उठाते हैं तो इसके दीर्घकालिक परिणाम हमारे और आने वाली पीढ़ियों के लिए घातक हो सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की चरम परिस्थितियाँ, सूखा, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ सकती हैं। हमें पर्यावरण संरक्षण की दिशा में गंभीर कदम उठाने होंगे, जैसे- ऊर्जा का संरक्षण, पुनः उपयोग योग्य सामग्रियों का प्रयोग, वृक्षारोपण और प्रदूषण नियंत्रण।

पर्यावरण संरक्षण न केवल एक आवश्यकता है बल्कि यह हमारी जिम्मेदारी भी है। अगर हम इसे बचाए रखते हैं तो हम अपने जीवन स्तर को बेहतर बना सकते हैं और धरती पर रहने वाली सभी प्रजातियों के लिए एक स्थिर और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं।

5.2 सारांश

5.2.1 प्रस्तावना

प्राकृतिक आपदाएँ, जैसे भूकंप, बाढ़, सूखा और तूफान, पृथ्वी पर प्राकृतिक घटनाएँ हैं, जिनका मानव जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जन मानस को यह जानकारी होना आवश्यक है कि इन आपदाओं का कारण केवल प्राकृतिक प्रक्रियाएँ नहीं, बल्कि मानव गतिविधियाँ भी हैं जैसे- वनों की अंधाधुंध कटाई, जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकी तंत्र के साथ छेड़छाड़, इन सभी कारणों से प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता और आवृत्ति बढ़ सकती है। जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ़ का पिघलना, समुद्र स्तर का बढ़ना और मौसम की चरम स्थितियाँ जैसे- बर्फबारी और सूखा भी इन आपदाओं को और तीव्र बना रहे हैं। हम प्राकृतिक आपदाओं के कारणों को समझें और उनके प्रति जागरूक हों, ताकि इनसे बचाव और सामना करने के उपायों को अपनाया जा सके।

कोरोना महामारी ने न केवल स्वास्थ्य संकट उत्पन्न किया बल्कि पर्यावरण पर भी गहरा प्रभाव डाला। लॉकडाउन के दौरान मानव गतिविधियों में कमी आई, जिससे प्रदूषण के स्तर में अस्थायी गिरावट आई। वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण में कमी देखी गई और शहरी क्षेत्रों में वातावरण साफ हुआ। हालांकि, यह असर अस्थायी था, क्योंकि जैसे ही लॉकडाउन में ढील दी गई, प्रदूषण का स्तर फिर से बढ़ने लगा। इसके अलावा, कोरोना महामारी ने यह भी दिखाया कि जब मानव गतिविधियाँ कम होती हैं, तो प्रकृति खुद को पुनर्स्थापित कर सकती है, जो यह साबित करता है कि पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारी और जागरूकता कितनी महत्वपूर्ण है।

पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता इस समय और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। कोरोना महामारी ने यह स्पष्ट किया कि पर्यावरण और स्वास्थ्य आपस में जुड़े हुए हैं। अगर हम पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं, तो यह हमारे स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन हमारे जीवन के लिए खतरे की घंटी हैं। पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने के लिए हमें वृक्षारोपण, जल और ऊर्जा संरक्षण, और प्रदूषण नियंत्रण जैसे उपायों को गंभीरता से अपनाना होगा।

जन मानस को प्राकृतिक आपदाओं के कारणों, कोरोना महामारी के पर्यावरणीय प्रभावों, और पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूक करें। केवल तभी एक स्थिर, स्वस्थ और पर्यावरण-संवेदनशील समाज का निर्माण कर सकते हैं।

5.2.2 प्रस्तुत अनुसंधान का महत्व

अनुसंधान किसी भी क्षेत्र में नए ज्ञान की प्राप्ति, समस्याओं की पहचान और उनके समाधान के लिए एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यह न केवल नए तथ्यों और जानकारी को उजागर करता है बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए दिशा भी प्रदान करता है। जब हम बच्चों, खासकर उच्च माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों की बात करते हैं तो उनके बीच जागरूकता का स्तर और उसकी दिशा निर्धारित करने के लिए अनुसंधान और अध्ययन का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह अनुसंधान विद्यार्थियों की समझ को विस्तार से जानने में मदद करेगा और यह पहचानने में सहायता करेगा कि वे पर्यावरणीय संकटों, स्वास्थ्य संकटों और उनके समाधान के प्रति कितने जागरूक हैं।

भूगोल, एक ऐसा विषय है जो विद्यार्थियों को पृथ्वी और उसके पर्यावरण, मौसम, जलवायु, भौतिक संरचनाओं, मानव और पर्यावरण के बीच संबंध और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के बारे में जानकारी प्रदान करता है। यह विषय विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है जो अपनी समझ को धरती और इसके पर्यावरणीय परिवर्तनों से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। भूगोल के माध्यम से विद्यार्थी प्राकृतिक आपदाओं, जलवायु परिवर्तन, भूस्खलन, भूकंप, बाढ़, तूफान और अन्य आपदाओं के बारे में सिखते हैं, और वे इसके प्रभावों को समझने में सक्षम होते हैं।

कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण जैसे- वैश्विक मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने में भूगोल विषय का योगदान महत्वपूर्ण है। इस विषय के अध्ययन से बच्चों में इन समस्याओं के समाधान के प्रति संवेदनशीलता और समझ विकसित होती है। विद्यार्थियों के बीच जागरूकता का स्तर जानने के लिए इस तरह का अनुसंधान एक अच्छा उपाय साबित हो सकता है।

प्राकृतिक आपदाओं, जैसे बाढ़, भूकंप और तूफान का पृथ्वी पर गहरा प्रभाव पड़ता है। बच्चों को इन आपदाओं से जुड़े खतरों, उनसे निपटने के उपायों और उनके प्रभावों को समझाना बहुत महत्वपूर्ण है। इस अनुसंधान के माध्यम से यह अध्ययन किया जा सकता है कि भूगोल विषय के विद्यार्थी कितने अच्छे से प्राकृतिक आपदाओं के कारणों, प्रकारों और बचाव उपायों को समझते हैं। क्या वे जानते हैं कि आपदाओं के दौरान क्या करना चाहिए? क्या वे आपदा प्रबंधन और सुरक्षा उपायों के बारे में जागरूक हैं?

इस अध्ययन से यह भी स्पष्ट हो सकता है कि शिक्षा प्रणाली में इस विषय को कितनी गंभीरता से पढ़ाया जा रहा है और विद्यार्थियों को इसके बारे में जागरूक करने के लिए कौन से कदम उठाए जा रहे हैं।

कोरोना महामारी ने वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य संकट पैदा किया। यह संकट न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है बल्कि मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ऐसे में बच्चों के लिए यह समझना बेहद महत्वपूर्ण है कि महामारी क्या होती है? यह कैसे फैलती है? और इसके बचाव के उपाय क्या हैं? भूगोल के माध्यम से, विद्यार्थियों को महामारी के प्रसार के कारणों, इसके प्रभाव और समाज पर इसके असर के बारे में शिक्षा दी जा सकती है।

इस अनुसंधान में यह देखा जा सकता है कि क्या उच्च माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थी कोरोना महामारी के संबंध में उचित जानकारी रखते हैं? क्या वे महामारी के दौरान अपनी सुरक्षा के उपायों को जानते हैं जैसे- कि मास्क पहनना, हाथ धोना, और सामाजिक दूरी बनाए रखना? क्या वे यह समझते हैं? कि महामारी के प्रसार को रोकने में उनके व्यक्तिगत प्रयासों का कितना महत्व है?

आज के समय में पर्यावरण संकट एक गंभीर मुद्दा बन चुका है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, वनस्पति नाश और जल संकट जैसी समस्याएं न केवल भविष्य के लिए खतरे का कारण हैं बल्कि अब यह समस्याएं हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। उच्च माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। इस अध्ययन के द्वारा यह समझा जा सकता है कि क्या बच्चे पर्यावरण संरक्षण के उपायों को समझते हैं? क्या वे जलवायु परिवर्तन के कारणों और इसके प्रभावों के बारे में जानते हैं?

इसके अलावा, यह भी देखा जा सकता है कि क्या छात्र वृक्षारोपण, जल संरक्षण, ऊर्जा बचत और प्रदूषण नियंत्रण जैसी गतिविधियों में भाग लेते हैं। इस प्रकार के अनुसंधान से यह स्पष्ट हो सकता है कि बच्चों में पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति कितनी जागरूकता है और स्कूलों में इसे लेकर किस प्रकार की शिक्षा दी जा रही है।

इस तरह के अनुसंधान के महत्व को समझना आवश्यक है। जब हम बच्चों के बीच जागरूकता के स्तर का मूल्यांकन करते हैं तो हम यह जान सकते हैं कि उनकी शिक्षा प्रणाली में कौन से सुधार किए जाने की आवश्यकता है। इस प्रकार के अध्ययन से हम यह भी समझ सकते हैं कि वर्तमान पाठ्यक्रम और शैक्षिक गतिविधियाँ बच्चों को पर्यावरणीय, स्वास्थ्य और प्राकृतिक आपदाओं के मुद्दों के बारे में कितनी प्रभावी जानकारी प्रदान कर रही हैं।

अनुसंधान के द्वारा यह भी पता लगाया जा सकता है कि कौन से शिक्षक या स्कूल इस प्रकार की जागरूकता को बढ़ावा देने में प्रभावी हैं और कौन से क्षेत्रों में और सुधार की आवश्यकता है। यह अध्ययन शिक्षा नीति निर्माताओं, सरकारी संगठनों और स्कूल प्रशासन को विद्यार्थियों में जागरूकता फैलाने के लिए बेहतर रणनीतियाँ बनाने में मदद कर सकता है।

यह एक महत्वपूर्ण और आवश्यक अनुसंधान है जो न केवल बच्चों की जागरूकता की स्थिति का मूल्यांकन करता है बल्कि यह भी पहचानता है कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था और पाठ्यक्रम में किस प्रकार के सुधार की आवश्यकता है। इस अनुसंधान के माध्यम से बच्चों के बीच इन महत्वपूर्ण मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए सही दिशा-निर्देश तैयार किए जा सकते हैं ताकि भविष्य में हमारे समाज को इन वैश्विक समस्याओं से निपटने के लिए सशक्त और तैयार किया जा सके।  

5.2.3 समस्या कथन

वर्तमान समय में प्राकृतिक आपदाएं, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण जैसे वैश्विक मुद्दे बढ़ रहे हैं और इनका प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर पड़ रहा है, विशेष रूप से बच्चों और युवाओं पर। इन मुद्दों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं फिर भी यह स्पष्ट नहीं है कि विद्यालयों के विद्यार्थी प्राकृतिक आपदाएं, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण के बारे में कितना जानते हैं और उनका इन मुद्दों के प्रति दृष्टिकोण क्या है? अतः अनुसंधान की वर्तमान समस्या का कथन इस प्रकार है-

“भूगोल विषय के विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन।”

5.2.4 समस्या के उद्देश्य

प्रस्तुत अनुसंधान के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

23. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का विनिम्न चरों के आधार पर अध्ययन करना।

24. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का प्राकृतिक आपदाओं संबंधी जानकारी का अध्ययन करना।

25. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का कोरोना महामारी संबंधी जानकारी का अध्ययन करना।

26. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का पर्यावरण संरक्षण संबंधी जानकारी का अध्ययन करना।

27. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का प्राकृतिक आपदा के प्रति जागरूकता का अध्ययन करना।

28. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता का अध्ययन करना।

29. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन।

30. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का राजकीय एवं निजी विद्यालय के आधार पर तुलनात्मक अध्ययन करना।

31. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का राजकीय एवं निजी विद्यालय के आधार पर प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता का तुलनात्मक अध्ययन करना।

32. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का राजकीय एवं निजी विद्यालय के आधार पर कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता का तुलनात्मक अध्ययन करना।

33. भूगोल विषय के विद्यार्थियों का राजकीय एवं निजी विद्यालय के आधार पर पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का तुलनात्मक अध्ययन करना।

5.2.5 परिकल्पना

प्रस्तुत अनुसंधान की परिकल्पना निम्नलिखित हैं-

4. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का प्राकृतिक आपदा के प्रति जागरूकता में कोई सार्थक अन्तर नहीं होता हैं।

5. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता में कोई सार्थक अन्तर नहीं होता हैं।

6. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता में कोई सार्थक अन्तर नहीं होता हैं।

5.2.6 परिसीमन

प्रस्तुत शोध मे समय एवं साधनों को ध्यान मे रखते हुए निम्नलिखित सीमाए हैं-

राज्य ;  राजस्थान

जिले ; जोधपुर, पाली, बाडमेर, सिरोही, जैसलमेर, जालौर 

विद्यालय ;  सरकारी व निजी विद्यालय

विद्यालय स्तर ;  उच्च माध्यमिक

कक्षा स्तर                :  उच्च माध्यमिक

विषय ;  भूगोल

विद्यार्थी ;  छात्र- छात्रा दोनों 







5.2.7 न्यादर्श

इस अध्ययन के लिए निम्नलिखित प्रकार से न्यादर्श का चयन किया गया-

क्र.स. जिलें राजकीय निजी कुल

1 जोधपुर 100 100 200

2 पाली 100 100 200

3 बाड़मेर 100 100 200

4 सिरोही 100 100 200

5 जैसलमेर 100 100 200

6 जालौर 100 100 200

कुल 600 600 1200


5.2.8 अनुसंधान विधि

इस अनुसंधान कार्य में अपनायी गई सर्वेक्षण विधि विद्यार्थियों के बीच जागरूकता के स्तर का समग्र विश्लेषण करने के लिए उपयुक्त है। 

5.2.9 उपकरण

इस शोध में निम्नलिखित प्रमापीकृत एवं स्वनिर्मित उपकरणों का प्रयोग किया गया हैं-

अ. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी -  स्वनिर्मित परीक्षण

प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के मापन हेतु स्वनिर्मित उपकरण का प्रयोग विद्यार्थियों के प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता का मापन करने के लिए एक मानकीकृत माप है, जो कि भारतीय परिस्थितियों और संस्कृति के अनुकूल है। यह मापनी 15 से 18 आयु के विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के स्तर का मापन करने में सक्षम है। यह परीक्षण हिन्दी भाषा में दिया गया है। जिसमें 58 पद है जो कि दैनिक जीवन की विभिन्न व्यावहारिक परिस्थितियों से संबंधित है इस परीक्षण के प्राप्तांकों का अधिकतम प्रसार 174 अंकों तक है तथा न्यूनतम 35 अंक तक है। अधिकतम अंक प्राप्त करने का तात्पर्य है कि बालक में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता अधिक है और निम्नतम अंक प्राप्त करने का तात्पर्य है कि बालक में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता कम है।

ब. कोरोना महामारी जागरूकता प्रमापनी - स्वनिर्मित परीक्षण

कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के मापन हेतु स्वनिर्मित उपकरण का प्रयोग विद्यार्थियों के कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता का मापन करने के लिए एक मानकीकृत माप है। जो कि भारतीय परिस्थितियों और संस्कृति के अनुकूल है। यह मापनी 15 से 18 आयु के विद्यार्थियों में कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के स्तर का मापन करने में सक्षम है। यह परीक्षण हिन्दी भाषा में दिया गया है। जिसमें 57 पद है इस परीक्षण के प्राप्तांकों का अधिकतम प्रसार 171 अंकों तक है तथा न्यूनतम 35 अंक तक है। 

स. पर्यावरण जागरूकता योग्यता प्रमापनी - प्रमापीकृत परीक्षण

पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के मापन हेतु प्रवीण कुमार झा द्वारा निर्मित उपकरण Environmental Awareness Ability Measure (EAAM) का प्रयोग किया है। उपकरण का प्रयोग विद्यार्थियों के पर्यावरण के प्रति जागरूकता का मापन करने के लिए एक मानकीकृत माप है, जो कि भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल है। यह मापनी 14 से 21 आयु के विद्यार्थियों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता के स्तर का मापन करने में सक्षम है। इस मापनी के अन्तर्गत 51 प्रश्न दिये गये है। इस परीक्षण के प्राप्तांकों का अधिकतम प्रसार 102 अंकों तक है तथा न्यूनतम 00 अंक तक है। 

5.2.10 अनुसन्धान में प्रयुक्त सांख्यिकी

प्रस्तुत अनुसंधान में भूगोल विषय के विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के अध्ययन के परीक्षण से प्राप्त आकडों के विश्लेषण अर्थापन हेतु निम्नलिखित सांख्यिकी विधियों का प्रयोग किया गया हैं-

1. मध्यमान 

2. प्रमाप विचलन 

3. ‘टी’ परीक्षण

1. मध्यमान: - यह समान्तर माध्य या औसत होता है जो कि मूल प्राप्तांकों द्वारा ज्ञात किया जाता हैं। मध्यमान की गणना निम्न सूत्र द्वारा की गई हैं-

  

X      = मध्यमान (MEAN)

A.M. = कल्पित मध्यमान (Assumed mean)

Σfd    = कल्पित मध्यमान से विचलन का आवृतियों से गुणनफल का योग

C.I.   = वर्गान्तर का आकार (Class Interval)

परीक्षण से प्राप्त आकड़ों का मध्यमान उपरोक्त सूत्र से ज्ञात किया गया हैं।

2. प्रमाप विचलन: -

प्रस्तुत अनुसंधान में प्रमाप विचलन की गणना से मूल प्राप्तांको की दूरी या विचलन को ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया गया है प्रमाप विचलन ज्ञात करने का सूत्र निम्नलिखित है -

  

 = प्रमाप विचलन 

N = विद्यार्थियों की संख्या

CI = वर्गान्तर का आकार

Fd = कल्पित माध्य से आवृतियों का विचलन x आवृतियों का योग

Fd 2= विचलन का वर्ग x आवृतियों का योग

3. ‘t’ परीक्षण:-

प्रस्तुत अनुसंधान में अंको के मध्यमान के मध्य अन्तर की सार्थकता की जाँच करने हेतु ‘t’ परीक्षण का उपयोग किया गया है। जिसका सूत्र निम्नलिखित है-

  

‘t’ = टी मान

M1= प्रथम समूह का मध्यमान

M2= द्वितीय समूह का मध्यमान

SD1= प्रथम समूह का मानक विचलन

SD2= द्वितीय समूह का मानक विचलन

N1= प्रथम समूह के विद्यार्थियों की संख्या

N2= द्वितीय समूह के विद्यार्थियों की संख्या

5.3 परिणाम एवं निष्कर्ष

प्रस्तुत शोध में राजस्थान राज्य के जोधपुर, पाली, बाडमेर, सिरोही, जैसलमेर व जालौर के भूगोल विषय के विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के अध्ययन  के लिए 1200 विद्यार्थियों पर प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता प्रमापनी, कोरोना महामारी जागरूकता प्रमापनी व पर्यावरण जागरूकता योग्यता प्रमापनी के परीक्षण प्रशासित किये गये। इन परीक्षणों के अंकन एवं प्राप्तांकों की व्याख्या एवं विश्लेषण के आधार पर निम्नलिखित परिणाम प्राप्त हुए-



5.3.1 प्राकृतिक आपदाओं संबंधी जागरूकता से संबंधित परिणाम

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के 6 आयामों से संबंधित परिणाम निम्नानुसार प्रस्तुत किया गया है - 

1. आयाम: आपदा का परिचय

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयाम आपदा का परिचय का मध्यमान 22.35 तथा प्रमाप विचलन 1.40 है जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयाम आपदा का परिचय की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है।

2. आयाम: आपदा के प्रकार

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयाम आपदा के प्रकार का मध्यमान 25.14 तथा प्रमाप विचलन 1.95 है जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयाम आपदा के प्रकार की श्रेणी अधिक प्रदर्शित करता है।

3. आयाम: आपदाओं के कारण

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयाम आपदाओं के कारण का मध्यमान 25.35 तथा प्रमाप विचलन 2.24 है जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयाम आपदाओं के कारण की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है। 

4. आयाम : आपदाओं के प्रभाव

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयाम आपदाओं के प्रभाव का मध्यमान 24.64 तथा प्रमाप विचलन 2.32 है जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयाम आपदाओं के प्रभाव की श्रेणी अधिक प्रदर्शित करता है। 


5. आयाम: आपदा प्रबंधन

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयाम आपदा प्रबंधन का मध्यमान 25.89 तथा प्रमाप विचलन 3.05 है जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयाम आपदा प्रबंधन  की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है।

6. आयाम : आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयाम आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका का मध्यमान 27.76 तथा प्रमाप विचलन 2.38 है जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयाम आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है 

7. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता (समेकित)

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता का मध्यमान 151.11 तथा प्रमाप विचलन 10.17 है जो कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है 

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों के प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता:-

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के 6 आयामों की व्याख्या एवं विश्लेषण निम्नानुसार प्रस्तुत किया गया है - 

1. आयाम: आपदा का परिचय

भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा का परिचय का मध्यमान 22.20 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा का परिचय का मध्यमान 22.51 है। प्राप्त मध्यमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा का परिचय बहुत अधिक श्रेणी के पाये गये है। प्रमाप विचलन क्रमशः1.36 तथा 1.43 है तथा टी मूल्य 3.845 हैं। 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा का परिचय में सार्थक अंतर है।

2. आयाम: आपदा के प्रकार

भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा के प्रकार का मध्यमान 24.95 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा के प्रकार का मध्यमान 25.32 है। मध्यमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा के प्रकार अधिक श्रेणी के पाये गये है। मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 2.07 तथा 1.80 है तथा टी मूल्य 3.335 हैं। 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा के प्रकार में सार्थक अंतर पाया गया है।

3. आयाम: आपदाओं के कारण

भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के कारण का मध्यमान 25.04 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के कारण का मध्यमान 25.66 है। मध्यमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के कारण अधिक श्रेणी के पाये गये है। प्रमाप विचलन क्रमशः 2.14 तथा 2.30 है तथा टी मूल्य 4.806 हैं। 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के कारण में सार्थक अंतर पाया गया है।


4. आयाम: आपदाओं के प्रभाव

भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के प्रभाव का मध्यमान 24.33 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के प्रभाव का मध्यमान 24.94 है। मध्यमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के प्रभाव अधिक श्रेणी की पायी गयी है। प्रमाप विचलन क्रमशः 2.12 तथा 2.46 है तथा टी मूल्य 4.544 हैं। 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के प्रभाव में सार्थक अंतर पाया गया है।

5. आयाम: आपदा प्रबंधन

भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन का मध्यमान 25.29 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन का मध्यमान 26.48 है। मध्यमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन बहुत अधिक श्रेणी की पायी गयी है। प्रमाप विचलन क्रमशः 3.24 तथा 2.73 है तथा टी मूल्य 6.865 हैं।  0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में सार्थक अंतर पाया गया है।

6. आयाम: आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका

भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका का मध्यमान 27.44 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका का मध्यमान 28.07 है। मध्यमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका बहुत अधिक श्रेणी की पायी गयी है। मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 2.55 तथा 2.16 है तथा टी मूल्य 4.639 हैं। 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका में सार्थक अंतर पाया गया है।

7. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता (समेकित)

भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता में मध्यमान 149.25 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता में मध्यमान 152.97 है। मध्यमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता में बहुत अधिक श्रेणी की पायी गयी है। मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 9.86 तथा 10.14 है तथा टी मूल्य 6.447 हैं। 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से अधिक है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता में सार्थक अंतर पाया गया है।

5.3.2 कोरोना महामारी संबंधी जागरूकता से संबंधित परिणाम

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के 6 आयामों की व्याख्या एवं विश्लेषण निम्नानुसार प्रस्तुत किया गया है - 

1. आयाम: कोरोना महामारी का परिचय

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय का मध्यमान 20.12 तथा प्रमाप विचलन 2.37 है, जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय की श्रेणी अधिक प्रदर्शित करता है।


2. आयाम: कोरोना के विभिन्न स्वरूप

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप का मध्यमान 20.17 तथा प्रमाप विचलन 2.78 है, जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप की श्रेणी सामान्य प्रदर्शित करता है। 

3. आयाम: कोरोना के कारण

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण का मध्यमान 26.12 तथा प्रमाप विचलन 2.33 है जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है।

4. आयाम: कोरोना के लक्षण

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण का मध्यमान 24.51 तथा प्रमाप विचलन 2.82 है जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण की श्रेणी अधिक प्रदर्शित करता है।

5. आयाम: कोरोना संबंधी सावधानियां

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां का मध्यमान 27.28 तथा प्रमाप विचलन 1.56 है जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है। 

6. आयाम: कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका में विद्यार्थियों की भूमिका का मध्यमान 28.65 तथा प्रमाप विचलन 1.27 है जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका में विद्यार्थियों की भूमिका की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है। 

7. कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता (समेकित)

सारणी 4.10 के अनुसार भूगोल विषय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता का मध्यमान 146.84 तथा प्रमाप विचलन 7.87 है जो कि कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता की श्रेणी बहुत अधिक प्रदर्शित करता है।


भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों के कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता:-

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के 6 आयामों की व्याख्या एवं विश्लेषण निम्नानुसार प्रस्तुत किया गया है - 

1. आयाम: कोरोना महामारी का परिचय

भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय का मध्यमान 19.72 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय का मध्यमान 20.51 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय में राजकीय विद्यालय अधिक व निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की बहुत अधिक श्रेणी के पायी गयी है। मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 2.38 तथा 2.30 तथा टी मूल्य 5.830 हैं। 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय में सार्थक अंतर है।


2. आयाम: कोरोना के विभिन्न स्वरूप

भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप का मध्यमान 19.55 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप का मध्यमान 20.79 है। मध्यमान के अनुसार कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप की श्रेणी सामान्य पायी गयी मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 2.29 तथा 3.08 तथा टी मूल्य 7.948 हैं। 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप में सार्थक अंतर पाया गया है।

3. आयाम: कोरोना के कारण

भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण का मध्यमान 26.16 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण का मध्यमान 26.07 है। 

प्राप्त मध्यमान के अनुसार कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण में राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों में अधिक व निजी विद्यालय के विद्यार्थियों में बहुत अधिक श्रेणी के पायी गयी है। मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 2.35 तथा 2.30 तथा टी मूल्य 0.682 हैं। 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण में सार्थक अंतर नही पाया गया है।

4. आयाम: कोरोना के लक्षण

भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण का मध्यमान 23.29 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण का मध्यमान 25.74 है। मध्यमान के अनुसार कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण अधिक श्रेणी के पाये गये है। मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 2.60 तथा 2.47 तथा टी मूल्य 16.807 हैं। 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण में सार्थक अंतर पाया गया है।

5. आयाम: कोरोना संबंधी सावधानियां

भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां का मध्यमान 27.30 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां का मध्यमान 27.26 है। मध्यमान के अनुसार कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां बहुत अधिक श्रेणी के पाये गये है। मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 1.19 तथा 1.86 तथा टी मूल्य 0.462 हैं। 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां में सार्थक अंतर नही पाया गया है।

6. आयाम: कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका

भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका का मध्यमान 28.53 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका का मध्यमान 28.76 है। मध्यमान के अनुसार कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका बहुत अधिक श्रेणी के पाये गये मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 1.08 तथा 1.42 तथा टी मूल्य 3.219 हैं। 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका में सार्थक अंतर पाया गया है।

7. कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता (समेकित)

भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता में मध्यमान 144.54 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता में मध्यमान 149.14 है। मध्यमान के अनुसार कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता में बहुत अधिक श्रेणी के पाये गये है। मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 7.77 तथा 7.29 तथा टी मूल्य 10.563 हैं। 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता में सार्थक अंतर पाया गया है।

5.3.3 पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता से संबंधित परिणाम

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता से संबंधित परिणाम निम्नानुसार प्रस्तुत किया गया है - 

भूगोल विषय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता के मध्यमान 81.11 तथा प्रमाप विचलन 822 है जो कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता की श्रेणी सामान्य प्रदर्शित करता है 

• भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों के पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता:-

भूगोल विषय के राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का मध्यमान 74.57 तथा निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का मध्यमान 87.66 है। मध्यमान के अनुसार पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता राजकीय विद्यालय के विद्यार्थियों सामान्य व निजी विद्यालय के विद्यार्थियों में अधिक श्रेणी की पायी गयी है। मध्यमानों का प्रमाप विचलन क्रमशः 6.00 तथा 3.65 है तथा टी मूल्य 45.586 हैं। 0.05 विश्वास स्तर के मूल्य 1.96 से अधिक है अतः 0.05 विश्वास स्तर पर भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता में सार्थक अंतर है।

5.3.4 परिकल्पनाओं से संबंधित निष्कर्ष

प्रस्तुत शोध में तीन परिकल्पनाओं का निर्माण किया गया था। प्राप्त तथ्यों के विश्लेषण, व्याख्या एवं प्राप्त परिणामों के आधार पर परिकल्पनाओं से संबंधित निष्कर्षों को निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है -

1. प्रथम परिकल्पना से संबंधित निष्कर्ष:

1. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का प्राकृतिक आपदा के प्रति जागरूकता में कोई सार्थक अन्तर नहीं होता हैं।

परिणामों के आधार पर यह निष्कर्ष प्राप्त हुआ हैं कि-

1. आयाम: आपदा का परिचय

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा का परिचय में सार्थक अंतर पाया गया है।

2. आयाम: आपदा के प्रकार

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा के प्रकार में सार्थक अंतर पाया गया है।




3. आयाम: आपदाओं के कारण

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के कारण में सार्थक अंतर पाया गया है।

4. आयाम: आपदाओं के प्रभाव

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदाओं के प्रभाव में सार्थक अंतर पाया गया है।

5. आयाम: आपदा प्रबंधन

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में सार्थक अंतर पाया गया है।

6. आयाम: आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता के आयामः आपदा प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका में सार्थक अंतर पाया गया है।

7. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता (समेकित)

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता (समेकित) में सार्थक अंतर पाया गया है।

अतः यह परिकल्पना से अस्वीकृत की जाती है।

2. द्वितीय परिकल्पना से संबंधित निष्कर्ष:

2. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता में कोई सार्थक अन्तर नहीं होता हैं।

परिणामों के आधार पर यह निष्कर्ष प्राप्त हुआ हैं कि-


1. आयाम: कोरोना महामारी का परिचय

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना महामारी का परिचय में सार्थक अंतर है।

2. आयाम: कोरोना के विभिन्न स्वरूप

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के विभिन्न स्वरूप में सार्थक अंतर पाया गया है।

3. आयाम: कोरोना के कारण

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के कारण में सार्थक अंतर नही पाया गया है।

4. आयाम: कोरोना के लक्षण

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना के लक्षण में सार्थक अंतर पाया गया है।

5. आयाम: कोरोना संबंधी सावधानियां

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना संबंधी सावधानियां में सार्थक अंतर नही पाया गया है।

6. आयाम: कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता के आयामः कोरोना प्रबंधन में विद्यार्थियों की भूमिका में सार्थक अंतर पाया गया है।

7. कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता (समेकित)

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता में सार्थक अंतर पाया गया है।

अतः यह परिकल्पना आंशिक रूप से स्वीकृत की जाती है।

3. तृतीय परिकल्पना से संबंधित निष्कर्ष:

3. राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों का पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता में कोई सार्थक अन्तर नहीं होता हैं।

भूगोल विषय के राजकीय एवं निजी विद्यालय के विद्यार्थियों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता में सार्थक अंतर है।

अतः यह परिकल्पना से अस्वीकृत की जाती है।

5.4 प्रस्तुत शोध का शैक्षिक निहितार्थ

इस शोध का उद्देश्य भूगोल विषय के विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, कोरोना महामारी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन करना है। इस अध्ययन से प्राप्त निष्कर्षों का शैक्षिक क्षेत्र में गहरा प्रभाव पड़ सकता है।  

5.4.1. शैक्षिक पाठ्यक्रम पर प्रभाव  

1. समय-समय पर पाठ्यक्रम का अद्यतन:  

• प्राकृतिक आपदाओं, महामारी और पर्यावरणीय संकटों की नवीनतम जानकारी को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।  

• आधुनिक तकनीकी उपकरणों जैसे GIS, रिमोट सेंसिंग और जलवायु परिवर्तन मॉडलिंग का समावेश।  

2. व्यावहारिक शिक्षा (प्रैक्टिकल लर्निंग):  

• विद्यार्थियों के लिए फील्ड वर्क, आपदा पूर्वानुमान कार्यशालाएं और पर्यावरण संरक्षण परियोजनाओं का आयोजन।  

• विद्यार्थियों को आपदा प्रबंधन, महामारी से निपटने के उपाय और सतत विकास लक्ष्यों पर व्यावहारिक ज्ञान देना।  

3. इंटरडिसिप्लिनरी दृष्टिकोण:  

• भूगोल को स्वास्थ्य विज्ञान, पर्यावरण अध्ययन और आपदा प्रबंधन के साथ जोड़कर बहुआयामी दृष्टिकोण विकसित करना।  

• विभिन्न विषयों के समावेश से विद्यार्थियों को व्यापक ज्ञान मिलेगा।  

5.4.2. विद्यार्थियों में जागरूकता वृद्धि

1. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता:  

• विद्यार्थियों में भूकंप, बाढ़, चक्रवात, सूखा जैसी आपदाओं के कारणों और निवारण के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाना।  

• विद्यार्थियों को आपदा प्रबंधन योजनाओं, सुरक्षित आवासीय संरचनाओं और राहत कार्यों में भागीदारी के लिए प्रेरित करना।  

2. कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता:  

• विद्यार्थियों को स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों (जैसे मास्क पहनना, सामाजिक दूरी बनाए रखना, टीकाकरण) की महत्ता समझाना।  

• महामारी के दौरान मानसिक स्वास्थ्य, पोषण और व्यक्तिगत स्वच्छता को बढ़ावा देना।  

3. पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता: 

• जल संरक्षण, ऊर्जा बचत, अपशिष्ट प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण के महत्व को समझाना।  

• विद्यार्थियों को पर्यावरणीय गतिविधियों (जैसे वृक्षारोपण, प्लास्टिक मुक्त अभियान) में शामिल करना।  

5.4.3. शिक्षण विधियों में सुधार  

1. डिजिटल लर्निंग का उपयोग:  

• ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म्स, वर्चुअल सिमुलेशन और ऑनलाइन वेबिनार के माध्यम से जागरूकता बढ़ाना।  

• प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरणीय परिवर्तनों को समझाने के लिए मल्टीमीडिया टूल्स और वर्चुअल फील्ड ट्रिप का उपयोग।  

2. भागीदारी पर आधारित शिक्षा:

• विद्यार्थियों को परियोजनाओं, समूह चर्चाओं और आपदा प्रबंधन योजनाओं में भाग लेने के लिए प्रेरित करना।  

• स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर कार्य करने के लिए प्रोत्साहन देना।  

3.3. समस्या-समाधान आधारित शिक्षण:  

• विद्यार्थियों को स्थानीय स्तर की समस्याओं के समाधान के लिए शोध और नवाचार करने के लिए प्रेरित करना।  

• सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को पाठ्यक्रम में शामिल करके व्यावहारिक सोच विकसित करना।  

5.4.4. सामाजिक और नैतिक विकास  

1. सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना:

• विद्यार्थियों को प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरणीय चुनौतियों में सामाजिक जिम्मेदारी निभाने के लिए प्रेरित करना।  

• आपदाग्रस्त क्षेत्रों में स्वयंसेवा, राहत अभियानों में भागीदारी और जागरूकता अभियानों में योगदान।  

2.. नैतिक मूल्यों का विकास: 

• विद्यार्थियों में संवेदनशीलता, करुणा और सहयोग की भावना विकसित करना।  

• प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान और स्थायी जीवनशैली अपनाने के प्रति प्रेरित करना।  


5.4.5. नीतिगत सुझाव और भविष्य की संभावनाएं  

1. शैक्षिक नीति निर्माण:  

• सरकार और शैक्षिक संस्थानों को पाठ्यक्रम में आपदा प्रबंधन और पर्यावरण अध्ययन को अनिवार्य बनाने की सलाह।  

• स्कूलों और कॉलेजों में आपदा पूर्व चेतावनी और जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन।  

2. शोध एवं विकास:

• भूगोल विषय के अंतर्गत शोध गतिविधियों को बढ़ावा देकर प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरणीय संकटों के बेहतर समाधान खोजना।  

• शिक्षण संस्थानों में अनुसंधान प्रयोगशालाओं और डेटा विश्लेषण इकाइयों की स्थापना।  

3. अंतरराष्ट्रीय सहयोग:

• पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन में अंतरराष्ट्रीय संगठनों (जैसे UNDP, WHO, UNESCO) के साथ साझेदारी।  

• विद्यार्थियों को वैश्विक चुनौतियों से अवगत कराना और उनके समाधान के लिए प्रेरित करना।  

5.4.6. आपदा प्रबंधन और सतत विकास लक्ष्य (SDGs)  

1. आपदा प्रबंधन रणनीतियों का प्रशिक्षण:  

• विद्यार्थियों को सुरक्षित स्थानों की पहचान, बचाव उपकरणों का उपयोग और आपातकालीन परिस्थितियों में कार्य करने का प्रशिक्षण।  

• स्कूलों और कॉलेजों में मॉक ड्रिल एवं आपातकालीन प्रतिक्रिया योजनाओं का अभ्यास।  

2. सतत विकास लक्ष्यों की पूर्ति:  

• भूगोल विषय विद्यार्थियों को सतत विकास लक्ष्यों जैसे जलवायु कार्रवाई, स्थायी शहर, स्वच्छ जल और सतत ऊर्जा पर जागरूक करता है।  

• हरित पहल (Green Initiatives) के तहत स्थानीय स्तर पर कार्यान्वयन को बढ़ावा देना।  

5.4.7. विद्यार्थियों के कैरियर विकास में योगदान  

1. रोजगार के अवसर:  

• भूगोल शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों को पर्यावरण सलाहकार, जलवायु वैज्ञानिक, आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ, शहरी योजनाकार और GIS विशेषज्ञ बनने के लिए प्रेरित करना।  

2. स्वरोजगार के अवसर:

• विद्यार्थियों को हरित व्यवसाय (Green Entrepreneurship) में शामिल होने और पर्यावरणीय उत्पादों एवं सेवाओं की ओर आकर्षित करना।  

यह शोध भूगोल शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों में प्राकृतिक आपदाओं, महामारी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने की महत्ता को उजागर करता है। इससे न केवल विद्यार्थियों का बौद्धिक विकास होगा बल्कि वे समाज में सक्रिय और जागरूक नागरिक बनकर योगदान दे सकेंगे। शैक्षिक प्रणाली में उपयुक्त सुधार कर इस दिशा में प्रभावी बदलाव लाया जा सकता है।

5.5 सुझाव

5.5.1 विद्यार्थियों के लिए सुझाव

प्राकृतिक आपदा

1. विद्यार्थियों को सबसे पहले प्राकृतिक आपदाओं के विभिन्न प्रकार जैसे बाढ़, भूकंप, सुनामी, चक्रवात, सूखा, भूस्खलन आदि के बारे में जानना चाहिए। 

• आपदा प्रबंधन से संबंधित सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।

• साक्षात्कार और केस स्टडी के माध्यम से आपदाओं के बारे में गहरी जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।

2. विद्यार्थियों को यह समझना चाहिए कि प्राकृतिक आपदाओं से पहले, दौरान और बाद में क्या सुरक्षा उपाय अपनाए जाने चाहिए। 

• आपदा प्रबंधन योजना के लिए विद्यालय स्तर पर सिमुलेशन या मॉक ड्रिल आयोजित करना चाहिए।

• अपनी प्राथमिक चिकित्सा ज्ञान को बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए।

• सुरक्षा उपकरण (जैसे आपातकालीन बैग, टॉर्च, बैटरी, पानी, दवाएं आदि) के उपयोग के बारे में जानना चाहिए। ।

3. आपके क्षेत्र में स्थानीय सरकारों और संस्थाओं ने आपदा प्रबंधन के लिए कौन सी योजनाएँ बनाई गयी हैं? विद्यार्थियों को यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि उनकी स्कूल या समुदाय में आपदा प्रबंधन योजना क्या है?

• अपने क्षेत्र के आपदा प्रबंधन अधिकारियों से मिलकर जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।

• स्कूल या कॉलेज में आपदा प्रबंधन से संबंधित कार्यशालाएँ आयोजित करने में भाग लेना चाहिए। ।

4. जलवायु परिवर्तन से प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि हो रही है जैसे- समुद्र स्तर में वृद्धि, अधिक बर्फबारी, सूखा और अति वर्षा। विद्यार्थियों को जलवायु परिवर्तन और इसके प्रभावों के बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।

• जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर प्रोजेक्ट तैयार करने चाहिए।

• इस विषय पर वैज्ञानिक लेख पढ़ना और चर्चा करनी चाहिए।

5. विद्यार्थियों को प्राकृतिक आपदाओं के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए अभियान चलाने चाहिए। इसके लिए स्कूल या कॉलेज में पोस्टर, सेमिनार, पब्लिक स्पीकिंग आदि के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा सकता है।

• स्कूल में आपदा प्रबंधन पर पोस्टर प्रतियोगिता आयोजित करनी चाहिए।

• सोशल मीडिया का उपयोग करके आपदाओं के प्रति जागरूकता फैलानी चाहिए।

• आपदा के समय में प्राथमिक मदद के बारे में विद्यार्थियों को शिक्षा देने के लिए कार्यशाला आयोजित करनी चाहिए।

6. विद्यार्थियों को आपदा के समय उपयोगी वस्त्र, खाद्य सामग्री, पानी, मेडिकल किट, बैटरी, कंबल आदि की सूची बनानी चाहिए और आपातकालीन स्थिति में उनका उपयोग कैसे करना है, इसके बारे में जानना चाहिए।

• अपने घर और स्कूल में आपातकालीन सामग्री का एक बैग तैयार करना चाहिए।

• आपदा के समय में आवश्यक वस्तुओं का चयन और उनका संग्रह कैसे करें, इसके बारे में अध्ययन करना चाहिए।

7. आजकल तकनीक का उपयोग आपदाओं की जानकारी प्राप्त करने और आपदा प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। विद्यार्थियों को यह समझना चाहिए कि मोबाइल एप्स, वेब पोर्टल्स और अन्य तकनीकी उपकरणों का कैसे उपयोग किया जा सकता है।

• आपदा संबंधित ऐप्स डाउनलोड करें और उनका उपयोग सीखना चाहिए।

• आपदाओं के दौरान सोशल मीडिया का सही तरीके से उपयोग करने के बारे में जानना चाहिए।

8. आपदाओं के दौरान या आपदा के बाद समाज सेवा और स्वयंसेवी कार्य करने की महत्वता को समझें। विद्यार्थियों को समाज में आपदा पीड़ितों की मदद करने के अवसरों का पता लगाना चाहिए।

• किसी आपदा राहत कार्य में भाग लेना चाहिए।

• स्थानीय आपदा राहत टीम के साथ मिलकर कार्य करना चाहिए।

9. विद्यार्थियों को आपदा प्रबंधन पर लेख लिखने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए ताकि वे आपदाओं से निपटने की बेहतर रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित कर सकें।

• इस विषय पर निबंध प्रतियोगिता में भाग लेना चाहिए।

कोरोना महामारी

10. विद्यार्थियों को सबसे पहले कोरोना वायरस के बारे में बुनियादी जानकारी दी जानी चाहिए। 

• COVID-19 के प्रसार के तरीके, लक्षण, और इसके इलाज पर जानकारी।

• कोविड-19 के संक्रमण के विभिन्न प्रकार और उनका प्रभाव समझें जैसे- सामान्य, गंभीर, और गंभीर मामलों में अंतर।

• महामारी के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव के बारे।

11. कोरोना वायरस से बचाव के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता और सुरक्षा उपायों का पालन करना आवश्यक है। 

• हाथ धोने की सही तकनीक और इसके महत्व पर जानकारी प्राप्त करना।

• मास्क पहनने के सही तरीके और इसके प्रभाव को समझना।

• सोशल डिस्टेंसिंग के महत्व को समझना और इसे अपनी दिनचर्या में अपनाना।

• अगर लक्षण हों, तो टेस्ट करवाने और खुद को आइसोलेट करने के बारे में जागरूकता बढ़ाना।

12. कोरोना महामारी से निपटने के लिए वैक्सीनेशन एक प्रमुख उपाय था। विद्यार्थियों को वैक्सीनेशन के बारे में सही जानकारी देना, इसके लाभ, और इसके महत्व को समझाना आवश्यक है। 

• COVID-19 वैक्सीनेशन के प्रकार, प्रक्रिया, और इसके सुरक्षा उपायों के बारे में जानकारी प्राप्त करें।

• वैक्सीनेशन से जुड़े मिथक और गलतफहमियों को दूर करने के लिए शोध करना।

• कोविड-19 के इलाज और उपचार विधियों के बारे में जानना।

13. कोरोना महामारी ने मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डाला है। लॉकडाउन, सामाजिक दूरी और अनिश्चितता के कारण विद्यार्थियों में मानसिक तनाव, चिंता, और अवसाद के मामले बढ़े।

• मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए ध्यान, योग, श्वास क्रियाओं के बारे में पढ़ना।

• तनाव और चिंता से निपटने के तरीके सीखना (जैसे- सकारात्मक सोच, संवाद और शारीरिक गतिविधियाँ)।

• अगर मानसिक तनाव महसूस हो तो परामर्शदाता से संपर्क करने के बारे में सोचना।

14. कोरोना महामारी के दौरान स्कूलों और कॉलेजों ने ऑनलाइन शिक्षा का रुख किया जाना चाहिए। विद्यार्थियों को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और ऑनलाइन संसाधनों के इस्तेमाल की सही विधि और सुरक्षा को लेकर जागरूक किया जाना चाहिए।

• ऑनलाइन कक्षाओं के लिए तकनीकी उपकरणों (लैपटॉप, स्मार्टफोन, इंटरनेट आदि) के सही उपयोग के बारे में जानकारी।

• ऑनलाइन सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और डिजिटल साक्षरता के बारे में जागरूक रहना।

• डिजिटल शिक्षा के दौरान समय प्रबंधन और ध्यान केंद्रित करने के तरीके सीखना।

15. विद्यार्थियों को यह सिखाना चाहिए कि वे अपनी पढ़ाई के अलावा अपने परिवार और समुदाय में कोरोना महामारी से संबंधित जागरूकता फैलाने में मदद कर सकते हैं। 

• परिवार और दोस्तों को सोशल मीडिया के माध्यम से मास्क पहनने, हाथ धोने और कोविड-19 के बारे में सही जानकारी देना।

• स्थानीय संगठनों और समाजों के साथ मिलकर जागरूकता अभियान चलाने के लिए प्रेरित हों।

• बच्चों और बुजुर्गों के लिए विशेष सावधानियाँ और उन्हें सही जानकारी देने के तरीके सीखने चाहिए।

16. कोरोना महामारी के दौरान सकारात्मक सोच और सामूहिक जिम्मेदारी महत्वपूर्ण रही। 

• सकारात्मक सोच और मानसिक सशक्तिकरण के बारे में पढ़ें।

• समाज सेवा और स्वयंसेवक कार्यों में हिस्सा लेना चाहिए (जैसे राहत सामग्री वितरण, जागरूकता फैलाना)।

• दूसरों के प्रति सहानुभूति और सामाजिक जिम्मेदारी को बढ़ावा देना चाहिए।

17. विद्यार्थियों को कोविड-19 पर शोध कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। यह उन्हें महामारी के बारे में गहरी जानकारी प्रदान करेगा व महामारी से जुड़े विभिन्न पहलुओं जैसे महामारी विज्ञान, उपचार और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर अपने विचार व्यक्त कर सकेंगे।

• कोविड-19 के प्रभावों और उसके प्रबंधन पर आधारित प्रोजेक्ट्स तैयार करना।

• विद्यार्थियों को विभिन्न महामारी से संबंधित वैज्ञानिक शोध और डेटा का विश्लेषण करने के लिए प्रेरित करना।

• कोविड-19 के कारण स्वास्थ्य, समाज और अर्थव्यवस्था पर अध्ययन करना।

18. कोरोना महामारी से संबंधित सही जानकारी प्राप्त करने के लिए विद्यार्थियों को विभिन्न विश्वसनीय स्रोतों (जैसे WHO, CDC, भारत सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय) का उपयोग करना सिखाना चाहिए। 

• विद्यार्थियों को विश्वसनीय वेबसाइट्स, न्यूज चैनल्स और सरकारी स्रोतों से जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षित करना।

• सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों और गलत जानकारियों से बचने के उपायों के बारे में समझाना।

• कोरोना वायरस के बारे में सही जानकारी प्राप्त करने के लिए संबंधित स्वास्थ्य संगठनों के आधिकारिक चैनल्स का उपयोग करना।

19. कोरोना महामारी ने हमें यह सिखाया कि भविष्य में किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए तैयार रहना आवश्यक है।

• महामारी के बाद सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों पर अध्ययन करना।

• भविष्य में किसी अन्य महामारी या संकट के लिए तैयारी और सतर्कता के उपायों पर विचार करना।

• भविष्य के लिए शिक्षा, कामकाजी शैली और जीवनशैली में आए बदलावों के बारे में सोचना।

पर्यावरण संरक्षण

20. प्रत्येक विद्यार्थी को साल में कम से कम एक पौधा लगाने और उसकी देखभाल करने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

• विद्यालय में वृक्षारोपण कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी करें।

• ‘हर छात्र एक पौधा’ अभियान को अपनाएं और अपने आस-पास हरियाली बढ़ाएं।

21. पानी और बिजली की बचत करने की आदत डालें। 

• नल बंद करना, अनावश्यक लाइट्स और पंखे बंद करना एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण आदत है।

• घर और विद्यालय में ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों (जैसे सौर ऊर्जा) के बारे में जानें और उन्हें अपनाने की सलाह देना।

22. सिंगल यूज़ प्लास्टिक (Single-use plastic) का उपयोग नही करना।

• कपड़े या जूट के बैग का उपयोग करें और प्लास्टिक की बोतलों के स्थान पर स्टील या कांच की बोतलें इस्तेमाल करना।

• विद्यालय और घर में प्लास्टिक मुक्त अभियान चलाना।

23. विद्यालय और आस-पास के क्षेत्रों को साफ-सुथरा रखना।

• कचरे को उचित डिब्बे में डालें और कचरे को गीला और सूखा कचरा अलग-अलग करना सीखना।

• सफाई अभियान (Cleanliness Drive) में भाग लें और अपने साथियों को भी प्रेरित करना।

24. पुरानी किताबें, कागज, प्लास्टिक और कपड़े पुनः उपयोग करना या रीसायकल करना।

• घर पर और विद्यालय में कागज की बर्बादी कम करें और दोनों तरफ प्रिंट करने की आदत डालना।

• पुराने खिलौनों और किताबों को जरूरतमंद बच्चों को दान करना।

25. विद्यालय में विज्ञान प्रदर्शनी, निबंध प्रतियोगिता और पोस्टर प्रतियोगिता में भाग लेकर पर्यावरण संरक्षण के संदेश फैलाना।

• जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और प्रदूषण जैसे विषयों पर प्रोजेक्ट बनाएं और समाधान सुझाना।

26. विश्व पर्यावरण दिवस’, ‘पृथ्वी दिवस’ और ‘वन महोत्सव’ जैसे अवसरों को विद्यालय में मनाना।

• इन अवसरों पर विभिन्न गतिविधियाँ करें जैसे – वृक्षारोपण, सफाई अभियान और पर्यावरणीय नुक्कड़ नाटक।

27. विद्यालय में यदि ‘पर्यावरण क्लब’ है तो उसका सदस्य बनें और उसकी गतिविधियों में भाग लेना।

• पर्यावरणीय कार्यक्रमों और अभियानों का आयोजन करें और अन्य विद्यार्थियों को भी इसमें शामिल करना।

28. विद्यालय के बाहर भी पर्यावरण जागरूकता फैलाना।

• अपने घर, मौहल्ले और समाज में पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में चर्चा करें और लोगों को प्रेरित करना।

• स्थानीय सफाई अभियान, वृक्षारोपण कार्यक्रम और जागरूकता रैलियों में भाग लना।

29. ई-वेस्ट (E-waste) को सही तरीके से फेंकें और रीसाइक्लिंग केंद्रों में जमा करना।

पुराने मोबाइल, बैटरियों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का निपटान सुरक्षित रूप से करे।

30. जल, वन और खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों का महत्व समझें और उनका संरक्षण करें।

• जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की रक्षा करें और जैव विविधता बनाए रखने में योगदान दें।

31. पर्यावरण से जुड़ी पुस्तकें पढ़ें और डॉक्यूमेंट्री देखें ताकि पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़े।

32. अपने परिवार और मित्रों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना चाहिए।

उन्हें भी वृक्षारोपण और जल संरक्षण जैसी गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

5.5.2 अध्यापकों के लिए सुझाव

प्राकृतिक आपदा

1. अध्यापकों को प्राकृतिक आपदाओं के विभिन्न प्रकार (जैसे भूकंप, बाढ़, सुनामी, चक्रवात, सूखा, भूस्खलन आदि) के बारे में गहन जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। 

• आपदाओं के प्रकार, कारण, और प्रभावों पर पाठ्यक्रम तैयार करना चाहिए।

• अध्यापकों के लिए विशेष कार्यशालाएँ और प्रशिक्षण आयोजित करना चाहिए।

• प्रासंगिक किताबों, लेखों और रिसर्च पेपरों का अध्ययन करना चाहिए।

2. अध्यापक विद्यालय में आपदा प्रबंधन और आपदा सुरक्षा की जागरूकता बढ़ाने के लिए नियमित रूप से कार्यशालाएँ, सेमिनार और मॉक ड्रिल्स आयोजित कर सकते हैं। इससे विद्यार्थियों को आपदा के दौरान क्या करना चाहिए? इसके बारे में स्पष्ट जानकारी मिलती है।

• स्कूल स्तर पर नियमित आपदा सुरक्षा अभ्यास (मॉक ड्रिल) आयोजित करना चाहिए।

• आपदा के दौरान विद्यार्थियों को प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी देनी चाहिए।

• विद्यालय में आपदा प्रबंधन के लिए एक टीम तैयार करनी चाहिए।

3. अध्यापक विद्यार्थियों को यह समझाने में मदद कर सकते हैं कि प्राकृतिक आपदाओं के समय सुरक्षा उपाय क्या होने चाहिए? जैसे आपदा से पहले सतर्कता, आपदा के दौरान प्राथमिक सुरक्षा और आपदा के बाद पुनर्निर्माण कार्य।

• विद्यार्थियों को आपदा के दौरान सुरक्षित रहने के उपाय समझना।

• आपदा सुरक्षा और प्राथमिक चिकित्सा के बारे में सरल और स्पष्ट जानकारी देना।

• शिक्षा में दृश्य और श्रव्य सामग्री (जैसे वीडियो, पोस्टर, आदि) का उपयोग करना चाहिए।

4. डिजिटल माध्यम और सोशल मीडिया का उपयोग करते हुए आपदा प्रबंधन के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सकती है। आजकल कई मोबाइल ऐप्स, वेबसाइट्स और सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स के माध्यम से आपदा संबंधित जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

• आपदा प्रबंधन से संबंधित एप्लिकेशन और वेबसाइट्स का परिचय विद्यार्थियों को देना।

• आपदा के दौरान सोशल मीडिया का सही तरीके से उपयोग करने के बारे में चर्चा करनी चाहिए।

• ऑनलाइन संसाधनों का उपयोग करके आपदा पर आधारित प्रोजेक्ट्स तैयार करने के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित करना चाहिए।

5. जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय असंतुलन और प्राकृतिक आपदाओं के आपसी संबंध को समझाना भी जरूरी है। अध्यापक विद्यार्थियों को यह बताएं कि कैसे जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय गतिविधियाँ प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ने का कारण बन रही हैं।

• जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण पर पाठ्यक्रम तैयार करना चाहिए।

• विद्यार्थियों को पर्यावरणीय प्रभावों पर शोध करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

• आपदा के कारण पर्यावरणीय बदलावों पर चर्चाएं आयोजित करना चाहिए।

6. प्रत्येक क्षेत्र और शहर में आपदा प्रबंधन के लिए अलग-अलग योजनाएं होती हैं। अध्यापक स्थानीय आपदा प्रबंधन योजनाओं को समझाकर विद्यार्थियों को यह सिखा सकते हैं कि उनका समुदाय किस तरह से आपदा के समय तैयार रहता है।

• स्थानीय प्रशासन या आपदा प्रबंधन विभाग के साथ मिलकर कार्यक्रम आयोजित करना चाहिए।

• विद्यार्थियों को स्थानीय आपदा प्रबंधन योजनाओं के बारे में जानकारी देनी चाहिए।

• आपदा प्रबंधन टीम से साक्षात्कार आयोजित करें और विद्यार्थियों को उनसे मार्गदर्शन दिलवाना।

7. अध्यापक खुद एक उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं और विद्यार्थियों को आपदा प्रबंधन के महत्व के बारे में जागरूक कर सकते हैं। जागरूकता फैलाने के लिए, वे पंपलेट, पोस्टर, निबंध, और चित्रकला प्रतियोगिताएँ आयोजित कर सकते हैं।

• जागरूकता फैलाने के लिए स्कूल स्तर पर प्रतियोगिताएं आयोजित करना (जैसे- पोस्टर, निबंध आदि)।

• आपदा प्रबंधन पर सेमिनार या व्याख्यान आयोजित करना चाहिए।

• विद्यार्थियों को सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफार्म्स का उपयोग करके आपदा जागरूकता फैलाने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

8. प्राकृतिक आपदाएँ न केवल शारीरिक नुकसान पहुंचाती हैं बल्कि मानसिक और भावनात्मक संकट भी उत्पन्न कर सकती हैं। अध्यापक को विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी प्रयास करना चाहिए। आपदा के समय मानसिक स्वास्थ्य समर्थन महत्वपूर्ण है।

• विद्यार्थियों को आपदा के बाद मानसिक और भावनात्मक समर्थन देने के लिए काउंसलिंग से जुड़ा प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए।

• आपदा के बाद विद्यार्थियों को मानसिक तनाव से निपटने के लिए कार्यक्रम आयोजित करना चाहिए।

9. अध्यापक विद्यार्थियों को आपदा राहत कार्यों में भाग लेने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। यह न केवल उनके सामाजिक दायित्व को समझाने का एक तरीका है बल्कि वे आपदा के समय के अनुभव को भी सीधे तौर पर देख सकते हैं।

• आपदा राहत कार्यों में स्कूल के विद्यार्थियों को स्वयंसेवक के रूप में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

• विद्यार्थियों को स्थानीय राहत कार्यों और सामाजिक सेवा कार्यक्रमों से जोड़ना।

10. अध्यापक विद्यार्थियों को आपदा प्रबंधन पर आधारित शोध कार्य करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। यह न केवल उन्हें समस्या-समाधान की सोच विकसित करने में मदद करेगा बल्कि आपदा प्रबंधन की विभिन्न पहलुओं पर गहरी समझ भी प्रदान करेगा।

• आपदा प्रबंधन पर शोध परियोजनाएँ और केस स्टडी तैयार करने के लिए विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करना चाहिए।

• विद्यार्थियों को आपके द्वारा तैयार किए गए संसाधनों का उपयोग करने के लिए मार्गदर्शन देना चाहिए।

कोरोना महामारी 

11. स्वास्थ्य एवं सुरक्षा प्रोटोकॉल की शिक्षा देना चाहिए।

• विद्यार्थियों को मास्क पहनने, हाथ धोने और सामाजिक दूरी बनाए रखने की महत्ता समझाना। 

• क्लास में नियमित रूप से स्वच्छता और सफाई पर ध्यान देना।

• WHO और स्वास्थ्य संगठनों द्वारा जारी गाइडलाइन्स की जानकारी देना।

12. ऑनलाइन शिक्षा के दौरान स्वास्थ्य पर ध्यान दें-

• ऑनलाइन क्लास के दौरान विद्यार्थियों को नियमित ब्रेक लेने और आँखों की देखभाल के लिए प्रेरित करना।

• वर्चुअल गतिविधियों में व्यायाम, ध्यान और योग जैसे स्वास्थ्यकर प्रथाओं को शामिल करना।

13. मानसिक स्वास्थ्य का समर्थन-

• विद्यार्थियों के साथ उनकी भावनाओं पर खुलकर बात करें और किसी भी प्रकार की चिंता या तनाव को कम करने के उपाय सुझाना।

• काउंसलिंग सेशन्स और ग्रुप डिस्कशन आयोजित करें जहां छात्र अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकें।

14. सटीक जानकारी साझा करना-

• महामारी से संबंधित अफवाहों से बचने के लिए अध्यापकों को विश्वसनीय स्रोतों से ही जानकारी लेनी चाहिए और विद्यार्थियों के साथ साझा करनी चाहिए।

• कोरोना वायरस के लक्षण, बचाव और उपचार के बारे में स्पष्ट जानकारी देना।

15. समुदाय और अभिभावकों के साथ सहयोग-

• अभिभावकों के साथ मिलकर जागरूकता अभियान चलाना।

• समुदाय स्तर पर स्वास्थ्य और सुरक्षा उपायों की जानकारी दें और विद्यार्थियों को परिवार में इसका पालन करने के लिए प्रेरित करना।

16. अभिनव शिक्षण विधियां अपनाना-

• विद्यार्थियों को महामारी से जुड़ी जागरूकता बढ़ाने के लिए परियोजना कार्य (प्रोजेक्ट वर्क) देने का सुझाव देना।

• विद्यार्थियों को पोस्टर बनाने, जागरूकता वीडियो बनाने और छोटे नाटक प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित करना।

17. टीकाकरण के लिए जागरूकता-

• टीकाकरण के महत्व पर चर्चा करें और विद्यार्थियों के माध्यम से उनके परिवारों में इस विषय पर जागरूकता फैलाना।

18. आपातकालीन तैयारी सिखाना-

• विद्यार्थियों को सिखाएं कि किसी भी स्वास्थ्य आपातकालीन स्थिति में क्या करना चाहिए।

• स्कूल में एक हेल्थ क्लब या सुरक्षा टीम बनाएं जो स्वास्थ्य संबंधी जानकारी पर कार्य करना।

पर्यावरण संरक्षण 

19. पर्यावरण शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना-

• नियमित शिक्षण के दौरान पर्यावरण संरक्षण के विषयों को जोड़ना।

• विज्ञान, भूगोल और सामाजिक विज्ञान की कक्षाओं में जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और टिकाऊ विकास जैसे विषयों को शामिल करना।

• परियोजना कार्य, निबंध लेखन और पोस्टर निर्माण जैसे रचनात्मक कार्यों के माध्यम से विद्यार्थियों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाना।

20. प्रायोगिक गतिविधियों का आयोजन करना-

• विद्यालय परिसर में वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित करें और विद्यार्थियों को पौधारोपण के महत्व के बारे में समझाना।

• वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting), खाद (Composting) और ऊर्जा संरक्षण से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर विद्यार्थियों को कार्य करने के लिए प्रेरित करना।

• स्थानीय स्तर पर स्वच्छता अभियान और पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) गतिविधियों का आयोजन करना चाहिए।

21. प्रेरक उदाहरण बनें-

• अध्यापक स्वयं पर्यावरण संरक्षण की आदतें अपनाएं, जैसे कि प्लास्टिक का कम उपयोग करना, ऊर्जा और जल की बचत करना।

• विद्यार्थियों को अपने कार्यों और आदतों से प्रेरित करें ताकि वे भी प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनना।

22. विशेष दिवस मनाएं-

• विद्यालय में ‘विश्व पर्यावरण दिवस’, ‘पृथ्वी दिवस’ और ‘वन महोत्सव’ जैसे कार्यक्रमों का आयोजन करना चाहिए।

• इन अवसरों पर पोस्टर, निबंध प्रतियोगिता, भाषण और नाटक के माध्यम से विद्यार्थियों में जागरूकता फैलाना।

23. क्लब और समितियां बनाना-

• विद्यालय में ‘पर्यावरण क्लब’ की स्थापना करें और विद्यार्थियों को इसका सक्रिय सदस्य बनाना।

• क्लब के माध्यम से विभिन्न पर्यावरणीय गतिविधियों जैसे वृक्षारोपण, कचरा प्रबंधन और पानी बचाओ अभियानों का आयोजन करना चाहिए।

24. पर्यावरणीय यात्राएं आयोजित करना-

• विद्यार्थियों को प्रकृति संरक्षण क्षेत्रों, राष्ट्रीय उद्यानों और स्थानीय पारिस्थितिकी स्थलों की यात्रा पर ले जाना।

• इस दौरान उन्हें पर्यावरण के विभिन्न पहलुओं के बारे में जानकारी दें और प्रकृति के महत्व को समझाना।

25. स्थानीय समुदाय से जुड़ाव-

• स्थानीय पर्यावरण संरक्षण संगठनों और सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर कार्य करें।

• विद्यार्थियों और समुदाय को मिलाकर सामूहिक वृक्षारोपण और सफाई अभियान चलाएं।

26. विद्यार्थियों को नेतृत्व की भूमिका देना-

• विद्यार्थियों को विभिन्न परियोजनाओं में नेतृत्व की भूमिका दें जैसे – स्कूल गार्डन का प्रबंधन, वृक्षारोपण अभियान की निगरानी और स्वच्छता परियोजनाओं का संचालन।

• इससे वे जिम्मेदारी का अनुभव करेंगे और नेतृत्व क्षमता का विकास होगा।

27. तकनीक का उपयोग करना-

• पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी डॉक्यूमेंट्री, वीडियो और ऑनलाइन पाठ्यक्रमों का उपयोग करना।

• विद्यार्थियों को इंटरनेट के माध्यम से पर्यावरणीय मुद्दों पर शोध करने के लिए प्रेरित करें।

28. हरित जीवनशैली सिखाना-

• विद्यार्थियों को ऊर्जा बचत, जल संरक्षण और कचरा प्रबंधन की आदतें सिखाएं।

• ‘Bring Your Own Bottle’ और ‘Say No to Plastic’ जैसे अभियानों को बढ़ावा देना।

29. प्रोजेक्ट और गतिविधियां-

• विद्यार्थियों को प्लास्टिक से कला निर्माण (Recycled Art), ग्रीन प्रोजेक्ट्स और जैविक खाद निर्माण जैसी गतिविधियों में शामिल करें।

• उन्हें ऐसी गतिविधियों में व्यस्त रखें जो उन्हें पर्यावरण के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनाना।

30. प्रशिक्षण और कार्यशालाएं (Workshops)-

• अध्यापकों के लिए समय-समय पर पर्यावरण संरक्षण पर कार्यशालाएं आयोजित की जाएं।

• अध्यापक स्वयं नए-नए पर्यावरणीय मुद्दों के बारे में जागरूक रहें और उसे विद्यार्थियों तक पहुंचाएं।

31. स्थायी विकास की अवधारणा सिखाना-

• विद्यार्थियों को सतत विकास (Sustainable Development) के महत्व के बारे में शिक्षित करना।

• उन्हें ऐसे प्रोजेक्ट पर कार्य करने के लिए प्रेरित करें जो दीर्घकालिक पर्यावरणीय सुधार लाते हों।

32. नवाचार और क्रिएटिव सोच को बढ़ावा देना-

• विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करें कि वे पर्यावरण संरक्षण के नए और अनूठे समाधान खोजें।

• विज्ञान प्रदर्शनियों में पर्यावरणीय प्रोजेक्ट्स प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित करें।


5.5.3 अभिभावकों के लिए सुझाव

प्राकृतिक आपदा

1. अभिभावकों को अपने परिवार के लिए एक स्पष्ट आपदा सुरक्षा योजना तैयार करनी चाहिए। इसमें घर में सुरक्षित स्थानों का चयन, आपातकालीन संपर्क नंबर, प्राथमिक चिकित्सा किट, जल, भोजन और अन्य आवश्यक सामान का संग्रह शामिल होना चाहिए। 

• परिवार के सभी सदस्य के लिए एक आपातकालीन संपर्क सूची बनाना।

• आपदा के दौरान सुरक्षित स्थानों का चयन करें (जैसे भूकंप के दौरान खुले मैदान या बाढ़ के दौरान ऊंचे स्थान)।

• आपातकालीन बैग तैयार रखें जिसमें पानी, दवाइयाँ, टॉर्च, पंखा, नकद और अन्य आवश्यक सामान हों।

2. अभिभावकों को यह समझना चाहिए कि विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं (जैसे भूकंप, बाढ़, चक्रवात, सुनामी, सूखा आदि) के बारे में जानकारी होना जरूरी है। बच्चों को आपदा के विभिन्न कारणों, प्रभावों और उनसे बचाव के उपायों के बारे में भी सिखाना चाहिए।

• बच्चों के साथ मिलकर आपदा से जुड़ी किताबें और वीडियो देखें।

• बच्चों को आपदा के समय क्या करना चाहिए इसके बारे में सिखाना।

• परिवार के सभी सदस्यों के साथ आपदा प्रबंधन पर चर्चा करना।

3. प्राकृतिक आपदाओं का बच्चों पर मानसिक और भावनात्मक प्रभाव भी हो सकता है। अभिभावकों को यह जानना चाहिए कि वे आपदा के समय बच्चों को मानसिक सहयोग कैसे प्रदान कर सकते हैं और उनका भय या चिंता कम कर सकते हैं।

• बच्चों को आपदा के बारे में सकारात्मक तरीके से समझाएं और उन्हें आश्वस्त करें कि परिवार और समुदाय मदद करेगा।

• बच्चों से उनके डर और चिंताओं के बारे में बात करें और उन्हें भावनात्मक रूप से सहारा देना चाहिए।

• आपदा के बाद बच्चों को मानसिक सहयोग और शांति देने के लिए परिवार में संवाद बनाए रखना चाहिए।

4. अभिभावकों को प्राथमिक चिकित्सा (first Aid) और बुनियादी बचाव कौशल जैसे CPR, घाव की देखभाल, जलमग्नता से बचाव आदि सीखने चाहिए। इससे न केवल वे अपनी परिवार की सुरक्षा में मदद कर सकते हैं बल्कि वे समुदाय में भी मदद करने के लिए तैयार हो सकते हैं।

• स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों या रेड क्रॉस जैसे संगठनों से प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षण प्राप्त करें।

• परिवार में प्राथमिक चिकित्सा किट रखें और सभी सदस्यों को इसका सही उपयोग सिखाना चाहिए।

• आपदा के दौरान बुनियादी बचाव उपायों पर ध्यान देना (जैसे घबराहट से बचना, प्राथमिक चिकित्सा का उपयोग आदि) ।

5. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता और आवृत्ति पर हो सकता है। अभिभावकों को यह समझना चाहिए कि जलवायु परिवर्तन से संबंधित कार्यों में वे कैसे योगदान दे सकते हैं? जैसे- ऊर्जा की बचत, जल का संरक्षण और कचरा प्रबंधन आदि।

• परिवार के सभी सदस्यों को जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के बारे में जागरूक करना चाहिए।

• घर में ऊर्जा बचाने और जल का संरक्षण करने के उपायों को अपनाना चाहिए।

• कचरा प्रबंधन और पुनर्चक्रण (recycling) की आदत डालनी चाहिए।

6. अभिभावक न केवल घर पर बल्कि समाज में भी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे अपने बच्चों को आपदा प्रबंधन के बारे में सीखने के लिए प्रेरित कर सकते हैं और समुदाय में इस दिशा में कार्य करने के लिए तैयार कर सकते हैं।

• बच्चों को आपदा प्रबंधन पर स्कूल या सामुदायिक कार्यशालाओं में भाग लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

• समाज में आपदा प्रबंधन से संबंधित जागरूकता फैलाने के लिए पोस्टर, निबंध प्रतियोगिता या अभियान चलाएं।

• पड़ोसियों के साथ मिलकर आपदा सुरक्षा योजना तैयार करना और साझा करना।

7. अभिभावकों को स्वयंसेवक कार्यों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। यह न केवल समाज की मदद करता है बल्कि यह बच्चों को जिम्मेदारी, सहानुभूति और समुदाय के प्रति जागरूकता बढ़ाने में मदद करता है।

• आपदा राहत कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लें।

• बच्चों को स्वयंसेवी कार्यों में शामिल करें और उन्हें समाज सेवा का महत्व समझाएं।

• आपदा के बाद राहत सामग्री वितरण या पुनर्निर्माण कार्यों में सहयोग करना चाहिए।

8. जब आपदा आती है, तो यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि बच्चों के लिए एक सुरक्षित स्थान हो जहां वे सुरक्षित रह सकें। अभिभावक बच्चों को सुरक्षित स्थानों के बारे में अवगत करवा सकते हैं और आपदा के दौरान उन्हें वहां ले जाने की योजना बना सकते हैं।

• घर में आपदा के दौरान सुरक्षित स्थानों का चयन करें (जैसे भूकंप में खुले स्थान या बाढ़ के दौरान ऊंचे स्थान)।

• बच्चों को आपदा के दौरान सुरक्षित स्थानों पर जाने की प्रक्रिया समझाएं।

• सुरक्षा किट और आपातकालीन बैग तैयार रखें और बच्चों को इसका उपयोग करने के बारे में जानकारी दें।

9. अभिभावकों को यह समझना चाहिए कि सोशल मीडिया और तकनीक का उपयोग आपदा के समय कैसे किया जा सकता है, जैसे कि आपदा चेतावनी, राहत कार्य, और आपातकालीन सूचना के लिए।

• आपदा चेतावनी और आपातकालीन सेवाओं के लिए स्थानीय प्रशासन और हेल्पलाइन नंबरों को अपने फोन में सेव करें।

• बच्चों को यह सिखाएं कि सोशल मीडिया का सही तरीके से उपयोग कैसे करें, खासकर आपदा के दौरान।

10. प्राकृतिक आपदाओं के बाद बच्चों को मानसिक रूप से समायोजित करने के लिए अभिभावकों को आवश्यक कदम उठाने चाहिए। बच्चों को आपदा के बाद की स्थिति को समझने, नकारात्मक भावनाओं को संभालने और राहत कार्यों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

• बच्चों से आपदा के बाद की स्थिति और उनके अनुभवों के बारे में बात करनी चाहिए।

• बच्चों को नकारात्मक भावनाओं से निपटने के लिए सहजता और सहानुभूति दिखाना।

• बच्चों को पुनर्निर्माण और राहत कार्यों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

कोरोना महामारी

11. स्वास्थ्य और सुरक्षा नियमों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए।

• बच्चों को मास्क पहनने, हाथ धोने और सामाजिक दूरी बनाए रखने की आदत डालना।

• जब भी आवश्यक हो, घर के बाहर जाने पर प्रोटोकॉल का पालन करें और बच्चों को भी इसकी आदत लगवानी चाहिए। ।

• घर लौटने के बाद हाथों और वस्त्रों की सफाई सुनिश्चित करना चाहिए।

12. बच्चों को सही जानकारी देना-

• बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार महामारी के बारे में सरल और सटीक जानकारी देना।

• डराने के बजाय उन्हें सुरक्षा उपायों के महत्व को समझाना।

• अफवाहों से बचें और हमेशा विश्वसनीय स्रोतों से ही जानकारी प्राप्त करना चाहिए।

13. मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना-

• बच्चों के साथ नियमित संवाद बनाए रखें ताकि वे अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त कर सकें।

• बच्चों की चिंता और तनाव को कम करने के लिए परिवार में सकारात्मक माहौल बनाए रखें।

• खेल, कला और संगीत जैसी गतिविधियों को प्रोत्साहित करें ताकि बच्चों को मानसिक राहत मिले।

14. ऑनलाइन शिक्षा और गतिविधियों का समर्थन करें-

• बच्चों की ऑनलाइन शिक्षा में सहयोग करें और उनके शेड्यूल का ध्यान रखना।

• स्क्रीन टाइम को सीमित करें और नियमित ब्रेक लेने की आदत डालना।

• बच्चों को डिजिटल सुरक्षा और इंटरनेट के सही उपयोग की जानकारी देना।

15. टीकाकरण के प्रति जागरूक रहना-

• बच्चों की उम्र के अनुसार उपलब्ध टीकों के बारे में जानकारी रखें और समय पर टीकाकरण करवाना।

• यदि बच्चों का टीकाकरण होना बाकी है, तो स्वास्थ्य अधिकारियों से संपर्क करना और प्रक्रिया पूरी करवानी चाहिए।

16. आपातकालीन तैयारी करना-

• घर में प्राथमिक चिकित्सा किट और आवश्यक दवाएं उपलब्ध रखना।

• बच्चों को सिखाएं कि आपात स्थिति में क्या करना चाहिए और हेल्पलाइन नंबरों की जानकारी देना।

17. स्वस्थ जीवनशैली को अपनाएं-

• बच्चों को पौष्टिक भोजन दें और उनकी शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा देना।

• प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए उचित आहार और व्यायाम को जीवनशैली का हिस्सा बनाना।

18. स्कूल और समुदाय से जुड़े रहना-

• स्कूल से मिलने वाली स्वास्थ्य संबंधी जानकारी पर ध्यान दें और उसका पालन करना चाहिए।

• अन्य अभिभावकों और समुदाय के सदस्यों के साथ मिलकर जागरूकता अभियान चलाना।

19. बच्चों के प्रश्नों का उत्तर देना-

• यदि बच्चे महामारी को लेकर प्रश्न पूछते हैं, तो धैर्यपूर्वक उत्तर देना।

• उन्हें प्रेरित करें कि वे भी जागरूकता फैलाएं और दूसरों की मदद करनी चाहिए।

पर्यावरण संरक्षण 

20. स्वयं एक उदाहरण प्रस्तुत करना

• बच्चे अपने अभिभावकों से सीखते हैं। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में खुद सकारात्मक कदम उठाकर बच्चों को प्रेरित करना चाहिए।

• प्लास्टिक का कम उपयोग करें, ऊर्जा बचाएं, और जल संरक्षण की आदत को अपनाना।

21. घर में वृक्षारोपण करना-

• अपने घर, बालकनी या छत पर पौधे लगाएं और बच्चों को उनके देखभाल की जिम्मेदारी देना।

• बच्चों को पेड़-पौधों की देखभाल और उनके महत्व के बारे में समझाना।

22. पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) को बढ़ावा देना-

• घर में पुनर्चक्रण की व्यवस्था करें और बच्चों को सिखाएं कि कैसे कागज, प्लास्टिक और जैविक कचरे को अलग-अलग किया जाता है?

• पुराने कपड़े, किताबें और खिलौनों का दान करने की आदत डालना।

23. जल और ऊर्जा संरक्षण की आदत डालना-

• बच्चों को सिखाएं कि नल का पानी व्यर्थ न बहाएं और बिजली बचाने के लिए उपयोग के बाद लाइट्स और पंखे बंद करना चाहिए।

• परिवार के साथ मिलकर वर्षा जल संचयन या सौर ऊर्जा जैसे प्रोजेक्ट अपनाना।

24. प्लास्टिक का उपयोग कम करना-

• बच्चों को सिखाएं कि प्लास्टिक का उपयोग कम करें और कपड़े या जूट के बैग का उपयोग करना चाहिए।

• पानी की बोतल और टिफिन बॉक्स प्लास्टिक के बजाय स्टील या कांच के उपयोग करना चाहिए।

25. स्वच्छता और सफाई पर ध्यान देना-

• बच्चों को घर और आसपास के क्षेत्र को साफ रखने की आदत डालना।

• परिवार के साथ सफाई अभियान में भाग लें और बच्चों को समाज के प्रति जिम्मेदार बनाना।

26. पर्यावरण दिवस मनाना-

• 'विश्व पर्यावरण दिवस', 'पृथ्वी दिवस' या 'वन महोत्सव' जैसे विशेष दिनों को घर पर मनाना।

• इस दिन बच्चों के साथ वृक्षारोपण करें या पर्यावरण से जुड़ी फिल्में और डॉक्यूमेंट्री देखना।

27. प्रकृति से जुड़ने के अवसर देना-

• बच्चों को नेचर ट्रिप या पिकनिक के दौरान प्राकृतिक स्थलों पर ले जाएं और उन्हें पर्यावरण का महत्व समझाएं।

• पार्क, झील या जंगलों में भ्रमण कराएं और प्रकृति से जुड़ने का मौका देना।

28. पढ़ाई और गतिविधियों में पर्यावरण को शामिल करना-

• बच्चों को पर्यावरण से जुड़ी किताबें, लेख और कहानियाँ पढ़ने को प्रेरित करना चाहिए।

• स्कूल प्रोजेक्ट में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विषयों को प्राथमिकता देना।

29. स्थानीय समुदाय से जुड़ना-

• स्थानीय सफाई अभियान, वृक्षारोपण और अन्य पर्यावरणीय गतिविधियों में भाग लेना।

• बच्चों को भी ऐसे आयोजनों में शामिल करना ताकि वे पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी महसूस करें।

30. इलेक्ट्रॉनिक कचरा प्रबंधन-

• बच्चों को सिखाएं कि पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को फेंकने के बजाय ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग केंद्रों में जमा करना।

• बैटरियों और अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स का सुरक्षित निपटान करना सिखाएं।

31. पुनः उपयोग (Re-use) और मरम्मत (Repair) की आदत डालना-

• बच्चों को सिखाएं कि वस्त्र, खिलौने और अन्य सामान को फेंकने की बजाय मरम्मत करें और पुनः उपयोग करना चाहिए।

• DIY (Do it yourself) परियोजनाओं में बच्चों की भागीदारी कराएं ताकि वे पुराने सामान को फिर से उपयोग करना सीखें।

32. पारिवारिक नियम बनाना-

• परिवार में ‘हरियाली अभियान’, ‘नो प्लास्टिक डे’ या ‘ग्रीन संडे’ जैसे नियम बनाएं।

• बच्चों के साथ मिलकर हर सप्ताह पर्यावरण से जुड़ी गतिविधि करें।

33. जीवनशैली में सादगी अपनाना-

• फिजूलखर्ची से बचें और बच्चों को भी सिखाएं कि प्राकृतिक संसाधनों का आदर करना चाहिए।

• मितव्ययिता और सादगी को जीवनशैली का हिस्सा बनाना।

5.5.4 विद्यालय के लिए सुझाव

प्राकृतिक आपदा

1. विद्यालयों में प्राकृतिक आपदाओं से संबंधित एक सशक्त पाठ्यक्रम तैयार किया जा सकता है जिसमें आपदाओं के प्रकार, उनके कारण, प्रभाव और उनसे बचाव के उपायों के बारे में विस्तृत जानकारी दी जाए। यह पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को आपदा प्रबंधन के बुनियादी सिद्धांतों से परिचित कराएगा और उन्हें आपदा के दौरान सही कदम उठाने की तैयारी में मदद करेगा।

• आपदा के प्रकारों (भूकंप, बाढ़, सुनामी, चक्रवात, सूखा, भूस्खलन आदि) के बारे में विस्तृत अध्ययन करना चाहिए।

• आपदा प्रबंधन के बुनियादी सिद्धांतों और उपकरणों के बारे में जानकारी दें (जैसे प्राथमिक चिकित्सा, आपातकालीन किट, आदि)।

• पर्यावरणीय कारणों से होने वाली आपदाओं (जैसे जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग) पर भी विशेष ध्यान देना।

2. विद्यालयों में नियमित रूप से आपदा सुरक्षा मॉक ड्रिल्स आयोजित की जानी चाहिए, ताकि विद्यार्थियों और शिक्षकों को आपदा के दौरान सही तरीके से प्रतिक्रिया देने का अभ्यास हो सके। यह न केवल आपदा के समय सही प्रतिक्रिया सुनिश्चित करेगा, बल्कि विद्यार्थियों को मानसिक रूप से भी तैयार करेगा।

• भूकंप, बाढ़, आग जैसी आपदाओं के लिए नियमित मॉक ड्रिल आयोजित करना चाहिए।

• आपदा प्रबंधन से संबंधित अभ्यास करना जैसे- कि प्राथमिक चिकित्सा, निकासी मार्गों का उपयोग, सुरक्षित स्थानों का चयन आदि।

• विद्यार्थियों और शिक्षकों को आपदा के समय मदद और प्रतिक्रिया देने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए।

3. विद्यालय में आपदा सुरक्षा और जागरूकता फैलाने के लिए नियमित रूप से कार्यशालाएँ और अभियान चलाए जा सकते हैं। इनमें विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों को शामिल किया जा सकता है। यह जागरूकता न केवल बच्चों के बीच, बल्कि उनके परिवारों में भी फैलेगी।

• आपदा प्रबंधन पर कार्यशालाएँ आयोजित करें, जिसमें विशेषज्ञों, आपदा प्रबंधन अधिकारियों या स्वयंसेवकों को बुलाया जाए।

• विद्यार्थियों द्वारा पोस्टर, निबंध और चित्रकला प्रतियोगिताएँ आयोजित करें ताकि वे आपदा सुरक्षा के महत्व को समझें और जागरूकता फैलाने में मदद करें।

• विद्यालय स्तर पर जागरूकता अभियान आयोजित करना, जिसमें आपदा सुरक्षा की जानकारी को स्कूल की दीवारों पर पोस्टर और सूचना के रूप में प्रदर्शित किया जाना चाहिए।

4. विद्यालय में एक आपदा प्रबंधन क्लब या समिति बनाई जा सकती है, जिसमें विद्यार्थी और शिक्षक आपदा के समय की तैयारी, शिक्षा और सुरक्षा उपायों पर काम करना। इस समिति का उद्देश्य विद्यालय के विद्यार्थियों, शिक्षकों और कर्मचारियों को आपदा सुरक्षा और प्रबंधन के बारे में प्रशिक्षित करना होगा।

• आपदा प्रबंधन क्लब में विद्यार्थियों को प्रशिक्षित करना और उन्हें आपदा सुरक्षा उपायों के बारे में जानकारी देना।

• क्लब के सदस्यों को आपदा के समय राहत कार्यों में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

• विद्यालय की आपदा प्रबंधन योजना में सुधार के लिए क्लब की बैठकें आयोजित करनी चाहिए।

5. विद्यालय को एक विस्तृत आपातकालीन योजना तैयार करनी चाहिए, जिसमें आपदा के समय स्कूल के भीतर और बाहर सुरक्षा उपायों का विवरण हो। इसमें विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित निकासी मार्ग, आपातकालीन संपर्क नंबर, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र और अन्य आवश्यक सूचनाएँ शामिल होनी चाहिए।

• विद्यालय के प्रत्येक वर्ग के लिए एक सुरक्षा योजना तैयार करना, जिसमें सुरक्षित मार्ग, समुचित निकासी और आपातकालीन संपर्क नंबर शामिल हों।

• विद्यालय में हर छात्र के लिए एक प्राथमिक चिकित्सा किट रखना।

• आपातकालीन स्थिति में विद्यार्थियों को सूचित करने के लिए स्कूल में अलार्म या संदेश प्रणाली स्थापित करनी चाहिए।

6. विद्यालय में विशेषज्ञों और आपदा प्रबंधन अधिकारियों को बुलाकर गेस्ट लेक्चर आयोजित किए जा सकते हैं, ताकि विद्यार्थी आपदा प्रबंधन की रणनीतियों और वास्तविक जीवन में लागू होने वाले सुरक्षा उपायों को जान सकें।

• आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों, नागरिक सुरक्षा अधिकारियों, और पर्यावरण वैज्ञानिकों से गेस्ट लेक्चर आयोजित करना चाहिए।

• इन विशेषज्ञों से आपदाओं के कारणों, परिणामों और राहत कार्यों के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करना चाहिए।

• विद्यार्थियों को आपदा प्रबंधन से जुड़े करियर विकल्पों के बारे में जानकारी देना।

7. तकनीकी उपकरणों का उपयोग करके आपदा जागरूकता और आपदा प्रबंधन की शिक्षा को और प्रभावी बनाया जा सकता है। विद्यालय में डिजिटल प्लेटफार्म्स, ऐप्स, वीडियो और सिमुलेशन का उपयोग किया जा सकता है।

• आपदा प्रबंधन से संबंधित मोबाइल ऐप्स और ऑनलाइन संसाधनों का उपयोग करना चाहिए।

• आपदा प्रबंधन पर आधारित वीडियो, डॉक्यूमेंट्री, और एनिमेशन शॉर्ट फिल्में विद्यार्थियों को दिखाना।

• विद्यार्थियों को आपदा के दौरान सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफार्म्स के सही उपयोग के बारे में सिखाना।

8. विद्यालय के सभी कर्मचारियों (शिक्षकों, स्टाफ, सुरक्षा कर्मियों आदि) को आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित करेगा कि आपदा के समय विद्यालय के सभी सदस्य सुरक्षित और सक्षम तरीके से प्रतिक्रिया दे सकें।

• विद्यालय के कर्मचारियों के लिए नियमित आपदा प्रबंधन और प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षण सत्र आयोजित करना।

• आपदा के समय सुरक्षा उपायों और निकासी प्रक्रियाओं पर कर्मचारियों को विस्तृत जानकारी देना।

• आपदा प्रबंधन पर कर्मचारियों के लिए एक ऑपरेशनल गाइड बनाएं, जिससे वे आपदा के दौरान त्वरित और सही निर्णय ले सकें।

9. विद्यालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आपदा के दौरान विद्यार्थियों की मानसिक और शारीरिक सुरक्षा भी सुनिश्चित हो, इसके लिए मनोवैज्ञानिक समर्थन और बच्चों को तनाव से उबारने के उपायों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

• विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें, खासकर आपदा के बाद।

• स्कूल में काउंसलिंग सेवाएँ उपलब्ध कराएं ताकि बच्चों को आपदा के प्रभाव से निपटने में मदद मिल सके।

• विद्यार्थियों को शारीरिक स्वास्थ्य और तनाव प्रबंधन के बारे में जानकारी देना।

10. विद्यालय के विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों के साथ मिलकर समुदाय में जागरूकता फैलाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। इस तरह के कार्यक्रमों में विद्यालय को एक नेतृत्व भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा।

• समुदाय के लिए आपदा प्रबंधन पर सेमिनार और कार्यशालाएँ आयोजित करना।

• बच्चों को समुदाय में आपदा सुरक्षा जागरूकता फैलाने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

• विद्यालय द्वारा बनाए गए जागरूकता पोस्टर्स और सामग्री का उपयोग स्थानीय समुदाय में किया जा सकता है।

कोरोना महामारी

11. स्वास्थ्य और सुरक्षा के नियम लागू करना-

• विद्यालय परिसर में प्रवेश के समय सभी के तापमान की जांच की जानी चाहिए।

• हैंड सैनिटाइजर और हाथ धोने की सुविधा विद्यालय के प्रत्येक कोने में उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

• मास्क पहनना अनिवार्य किया जाए और सामाजिक दूरी बनाए रखने के नियमों का पालन हो।

12. जागरूकता अभियान चलाना-

• विद्यालय में पोस्टर, बैनर और डिजिटल बोर्ड के माध्यम से कोरोना से बचाव के उपायों की जानकारी दी जानी चाहिए।

• विद्यार्थियों को नियमित रूप से कोरोना के बारे में जानकारी दी जाए और उन्हें जागरूक रहने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

• सुबह की प्रार्थना सभा (वर्चुअल या फिजिकल) में महामारी संबंधी अपडेट साझा करें।

13. ऑनलाइन और हाइब्रिड शिक्षा प्रणाली अपनाना-

• यदि परिस्थितियां अनुकूल न हों तो ऑनलाइन शिक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

• स्कूलों में छोटे बैच में कक्षाएं आयोजित की जाएं ताकि भीड़भाड़ से बचा जा सके।

• जिन विद्यार्थियों के पास ऑनलाइन शिक्षा का साधन न हो, उनके लिए विशेष व्यवस्था की जानी चाहिए।

14. विद्यार्थियों और अभिभावकों को शामिल करना-

• विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को महामारी से बचाव के तरीकों के बारे में नियमित रूप से जानकारी दी जानी चाहिए।

• अभिभावकों के साथ ऑनलाइन बैठक आयोजित कर स्वास्थ्य और सुरक्षा नीतियों की जानकारी साझा करें।

15. स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना-

• विद्यालय में स्वास्थ्य केंद्र स्थापित किया जाए और नियमित स्वास्थ्य जांच की सुविधा हो।

• विद्यालय में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी या नर्स की नियुक्ति की जानी चाहिए।

• आपात स्थिति में स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों से संपर्क के लिए हेल्पलाइन नंबर उपलब्ध कराएं।

16. मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना-

• विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए काउंसलिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

• शिक्षकों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी ट्रेनिंग दी जाए ताकि वे विद्यार्थियों की भावनात्मक जरूरतों को समझ सकें।

• तनाव कम करने के लिए खेलकूद और योग जैसी गतिविधियों का आयोजन किया जाना चाहिए।

17. टीकाकरण जागरूकता कार्यक्रम-

• विद्यार्थियों, शिक्षकों और कर्मचारियों के टीकाकरण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

• टीकाकरण शिविर आयोजित कर विद्यालय समुदाय को टीकाकरण के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए।

18. आपातकालीन योजना तैयार करना-

• विद्यालय में कोरोना के किसी भी संभावित मामले से निपटने के लिए एक आपातकालीन योजना तैयार की जानी चाहिए।

• किसी छात्र या शिक्षक में लक्षण दिखने पर उसे तुरंत अलग रखा जाए और उचित चिकित्सा सहायता दी जानी चाहिए।

19. स्वच्छता और सफाई का ध्यान रखना-

• विद्यालय परिसर को नियमित रूप से सैनिटाइज किया जाना चाहिए।

• कक्षाएं, शौचालय, पुस्तकालय और अन्य क्षेत्रों को स्वच्छ रखने के लिए विशेष व्यवस्था की जाए।

20. समुदाय के साथ समन्वय करना-

• स्थानीय प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और अन्य संगठनों के साथ मिलकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करें।

• विद्यार्थियों के माध्यम से उनके परिवारों और समुदाय में जागरूकता फैलाने की पहल की जानी चाहिए।

पर्यावरण संरक्षण

21. पर्यावरण क्लब की स्थापना करना-

• विद्यालय में एक 'पर्यावरण क्लब' बनाया जाए, जिसमें छात्र, शिक्षक और कर्मचारी मिलकर पर्यावरण संरक्षण गतिविधियों में भाग लेना।

• क्लब के माध्यम से वृक्षारोपण, सफाई अभियान और प्लास्टिक मुक्त परिसर जैसी गतिविधियां चलाई जाएं।

22. वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित करना-

• विद्यालय परिसर में वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किया जाए और प्रत्येक छात्र को कम से कम एक पौधा लगाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

• विद्यार्थियों को ‘मेरा वृक्ष, मेरी जिम्मेदारी’ की भावना से पौधों की देखभाल की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए।

23. स्वच्छता अभियान चलाना-

• विद्यालय परिसर और आसपास के क्षेत्रों में स्वच्छता अभियान चलाकर विद्यार्थियों को सफाई का महत्व समझाया जाना चाहिए।

• 'स्वच्छ भारत अभियान' जैसे राष्ट्रीय अभियानों से विद्यार्थियों को जोड़ा जाना चाहिए।

24. पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) परियोजनाएं लागू करना-

• विद्यालय में पुनर्चक्रण (recycling) केंद्र स्थापित करें जहां कागज, प्लास्टिक और अन्य रीसाइक्लेबल वस्तुओं को एकत्र किया जाना चाहिए।

• विद्यार्थियों को कचरे के उचित निपटान और पुनर्चक्रण के महत्व के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए।

25. जल और ऊर्जा संरक्षण पर ध्यान देना-

• विद्यालय में जल और ऊर्जा संरक्षण के उपाय अपनाएं, जैसे – पानी की बर्बादी रोकना, LED बल्बों का उपयोग करना और वर्षा जल संचयन प्रणाली (Rainwater Harvesting) स्थापित करना।

• विद्यार्थियों को बिजली और पानी बचाने की आदतें सिखाई जाएं, जैसे – नल बंद करना, लाइट्स और पंखे बंद करना।

26. पर्यावरण दिवस और अन्य जागरूकता दिवस मनाएं-

• विद्यालय में 'विश्व पर्यावरण दिवस', 'पृथ्वी दिवस', 'वन महोत्सव' आदि विशेष दिनों को मनाया जाना चाहिए।

• इन अवसरों पर निबंध लेखन, चित्रकला प्रतियोगिता, वाद-विवाद और नाटक जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाना चाहिए।

27. प्रोजेक्ट आधारित शिक्षण-

• विद्यार्थियों को पर्यावरण से संबंधित प्रोजेक्ट कार्य दिए जाएं जैसे– जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता, वनों की कटाई, प्लास्टिक प्रदूषण आदि विषयों पर अध्ययन।

• फील्ड ट्रिप और प्रकृति भ्रमण आयोजित किए जाएं ताकि छात्र प्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण के महत्व को समझ सकें।

28. प्लास्टिक मुक्त विद्यालय अभियान-

• विद्यालय परिसर को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए 'Say No to Plastic' अभियान चलाया जाना चाहिए।

• विद्यार्थियों को सिंगल यूज प्लास्टिक के विकल्प के रूप में कपड़े या जूट के बैग का उपयोग करने के लिए प्रेरित करना।

29. समुदाय सहभागिता और जागरूकता अभियान-

• विद्यालय के छात्र समुदाय में जाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश फैलाना।

• स्थानीय स्तर पर सफाई अभियान, जल संरक्षण और वृक्षारोपण के कार्य किए जाना चाहिए।

30. पाठ्यक्रम में पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा देना-

• विद्यालय के पाठ्यक्रम में पर्यावरण शिक्षा को विशेष रूप से शामिल किया जाना चाहिए।

• विद्यार्थियों को पर्यावरण विज्ञान, सतत विकास और जैव विविधता के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए।

31. वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करना-

• विद्यालय में सौर ऊर्जा (Solar Energy) के उपयोग को बढ़ावा दें।

• विद्यार्थियों को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के महत्व के बारे में व्यावहारिक जानकारी दी जानी चाहिए।

32. मॉडल और प्रदर्शनी का आयोजन करना-

• विद्यार्थियों द्वारा बनाए गए पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मॉडल और पोस्टरों की प्रदर्शनी लगाई जाना चाहिए।

• इस प्रकार के आयोजनों से विद्यार्थियों में रचनात्मकता और जागरूकता दोनों बढ़ती है।

5.5.5 भावी शोध हेतु सुझाव

भविष्य शोध के लिए शीर्षक सुझाव-

1. विद्यालयों में प्राकृतिक आपदा प्रबंधन: विद्यार्थियों की जागरूकता और तैयारी का मूल्यांकन।

2. प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सुरक्षा उपाय: विद्यार्थियों के दृष्टिकोण और व्यवहार का अध्ययन।

3. ग्रामीण और शहरी विद्यार्थियों में आपदा प्रबंधन जागरूकता की तुलनात्मक अध्ययन।

4. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति प्राथमिक विद्यालय के विद्यार्थियों में जागरूकता बढ़ाने की रणनीतियाँ।

5. विद्यालयों में भूकंप, बाढ़ और चक्रवात संबंधी जागरूकता कार्यक्रमों की प्रभावशीलता का विश्लेषण।

6. प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए विद्यार्थियों में व्यवहार परिवर्तन: एक प्रायोगिक अध्ययन।

7. आपदा शिक्षा और विद्यार्थियों का मानसिक स्वास्थ्य: महामारी और प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव का अध्ययन।

8. आपदा जोखिम न्यूनीकरण में विद्यार्थियों की भागीदारी और नेतृत्व क्षमता का विकास।

9. विद्यालय पाठ्यक्रम में आपदा प्रबंधन शिक्षा को एकीकृत करने की आवश्यकता और प्रभाव।

10. प्राकृतिक आपदाओं के प्रति विद्यार्थियों की तत्परता और जागरूकता का अध्ययन: केस स्टडी आधारित शोध।

11. आपदा प्रबंधन कार्यशालाओं का विद्यालयों में विद्यार्थियों पर प्रभाव: एक समीक्षात्मक अध्ययन।

12. आपदा प्रबंधन योजनाओं में विद्यार्थियों की भागीदारी और जागरूकता: स्थानीय स्तर पर एक व्यवहारिक अध्ययन।

13. प्राकृतिक आपदाओं के समय विद्यालयों की भूमिका और विद्यार्थियों की जागरूकता में वृद्धि के उपाय।

14. आपदा से बचाव के लिए विद्यार्थियों के नेतृत्व में किए गए सामुदायिक कार्यक्रमों का अध्ययन।

15. प्राकृतिक आपदा जोखिम न्यूनीकरण के प्रति विद्यार्थियों की जागरूकता और स्वैच्छिक भागीदारी का अध्ययन।

16. शोध शीर्षक में स्थान विशेष (क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर), आयु वर्ग और विशिष्ट आपदा (जैसे भूकंप, बाढ़, चक्रवात) को जोड़कर शीर्षक को अधिक केंद्रित बनाया जा सकता है।

17. विद्यालय स्तर (प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च माध्यमिक) के अनुसार शोध का शीर्षक तैयार करें।

18. आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए विद्यार्थियों द्वारा की गई गतिविधियों को केंद्र में रखते हुए शोध करें।

19. विद्यालयों में कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता और स्वच्छता प्रथाओं का प्रभाव।

20. कोविड-19 के दौरान विद्यार्थियों की स्वास्थ्य जागरूकता: एक व्यवहारिक अध्ययन।

21. कोरोना महामारी के समय विद्यार्थियों में मानसिक स्वास्थ्य और जागरूकता का आकलन।

22. महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा: विद्यार्थियों की प्रतिक्रिया और अनुभव।

23. विद्यालयों में कोविड-19 नियमों के प्रति जागरूकता और पालन का अध्ययन।

24. कोविड-19 के प्रति प्राथमिक और माध्यमिक विद्यार्थियों की जागरूकता में अंतर: एक तुलनात्मक अध्ययन।

25. कोरोना महामारी के दौरान विद्यार्थियों में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की आदतें: एक सर्वेक्षण अध्ययन।

26. विद्यालयों में कोविड-19 टीकाकरण अभियान की प्रभावशीलता और विद्यार्थियों का दृष्टिकोण

27. कोरोना महामारी के दौरान विद्यार्थियों में सामाजिक दूरी और स्वच्छता उपायों का पालन।

28. महामारी के दौरान विद्यार्थियों में जागरूकता बढ़ाने के लिए डिजिटल मीडिया का प्रभाव।

29. कोविड-19 महामारी के बाद विद्यार्थियों में स्वास्थ्य और स्वच्छता संबंधी आदतों में बदलाव।

30. महामारी के समय विद्यार्थियों और अभिभावकों के बीच स्वास्थ्य जागरूकता का तुलनात्मक अध्ययन।

31. विद्यालयों में कोरोना महामारी के प्रति जागरूकता अभियान की प्रभावशीलता का मूल्यांकन।

32. महामारी के दौरान विद्यार्थियों की जीवनशैली और स्वास्थ्य व्यवहार में आए परिवर्तन।

33. विद्यार्थियों में कोविड-19 सुरक्षा उपायों का पालन और महामारी के प्रति दृष्टिकोण: एक केस स्टडी।

34. कोरोना महामारी के समय विद्यार्थियों में सामाजिक उत्तरदायित्व और सामुदायिक भागीदारी।

35. महामारी के बाद शिक्षा प्रणाली में स्वास्थ्य जागरूकता को स्थायी रूप से शामिल करने की आवश्यकता।

36. कोविड-19 महामारी के दौरान ग्रामीण और शहरी विद्यार्थियों की जागरूकता में भिन्नता।

37. महामारी के दौरान विद्यार्थियों में स्वास्थ्य जागरूकता के विकास में शिक्षकों की भूमिका।

38. कोविड-19 के प्रति विद्यार्थियों के व्यवहार परिवर्तन और उसकी स्थायित्वता का अध्ययन।

39. विद्यालयों में विद्यार्थियों के बीच पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अध्ययन।

40. पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रमों का विद्यार्थियों के पर्यावरणीय व्यवहार पर प्रभाव: एक केस स्टडी।

41. प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में पर्यावरण संरक्षण जागरूकता की तुलनात्मक समीक्षा।

42. विद्यार्थियों में प्लास्टिक उपयोग में कमी लाने के प्रति जागरूकता अभियान की प्रभावशीलता।

43. विद्यालय परिसर में हरित पहल (Green Initiatives) और विद्यार्थियों की भागीदारी का मूल्यांकन।

44. पर्यावरण संरक्षण में विद्यार्थियों की भूमिका और सामुदायिक सहभागिता।

45. स्थानीय स्तर पर पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति विद्यार्थियों की जागरूकता: एक व्यवहारिक अध्ययन।

46. पर्यावरण संरक्षण के लिए विद्यार्थियों में वृक्षारोपण और जल संरक्षण की आदतों का विकास।

47. विद्यार्थियों द्वारा अपशिष्ट प्रबंधन और पुनर्चक्रण (Recycling) की आदतों का अध्ययन।

48. विद्यार्थियों में पर्यावरणीय संकट (जैसे जलवायु परिवर्तन) के प्रति जागरूकता का मूल्यांकन।

49. विद्यालयों में 'स्वच्छ भारत' और 'ग्रीन इंडिया' अभियानों का प्रभाव: विद्यार्थियों के दृष्टिकोण से।

50. विद्यार्थियों द्वारा सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की समझ और उनकी भागीदारी का अध्ययन।

51. विद्यार्थियों में ई-कचरा (E-Waste) प्रबंधन के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता।

52. विद्यालयों में सौर ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों के प्रति विद्यार्थियों की जागरूकता का अध्ययन।

53. पर्यावरण संरक्षण विषयक पाठ्यक्रमों का विद्यार्थियों के व्यवहार और दृष्टिकोण पर प्रभाव का अध्ययन।

54. विद्यार्थियों में जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के प्रभावी उपाय।

55. विद्यार्थियों में जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन के प्रति जागरूकता: एक व्यवहारिक अध्ययन।

56. विद्यार्थियों के माध्यम से परिवार और समाज में पर्यावरण संरक्षण की जागरूकता फैलाने की रणनीतियाँ।

57. पर्यावरणीय अभियानों में विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी और नेतृत्व क्षमता का विकास।

58. विद्यालयों में पर्यावरण क्लबों की स्थापना और उनके द्वारा चलाए गए कार्यक्रमों का प्रभाव।


5.6 उपसंहार

पंचम अध्याय में शोधकर्ता द्वारा प्रस्तावना, सम्पूर्ण शोध का सारांश, भावी अध्यापकों की अन्धविश्वासों के प्रति अभिवृत्ति से सम्बन्धित परिणामों का तथा परिकल्पनाओ से सम्बन्धित निष्कर्षों का वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त प्रस्तुत शोध के शैक्षिक निहितार्थ की विवेचना करते हुए शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं भावी शोध हेतु सुझाव प्रस्तुत किये गये है।



























सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

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